भगवान को नहीं चाहिए पैसा

ईश्वर सर्वोपरि सत्ता है जिसकी कृपा से दृष्टि से लेकर सृष्टि तक का अस्तित्व है। ईश्वरीय सत्ता में प्रगाढ़ विश्वास करने वाले लोग इसे अच्छी तरह समझते हैं जबकि बाहरी मन से ईश्वर की बात करने वाले कई जन्मों में भी समझ पाने लायक नहीं हो पाते। अपने सुख-दुःखों और ऎषणाओं से भगवान का कोई संबंध नहीं है बल्कि इनका संबंध हमारे पाप-पुण्यों से है जिनकी गणना के अनुरूप हमें दुःख और सुखों की प्राप्ति होती रहती है। ईश्वर की कृपा का यह अर्थ कदापि नहीं है कि हमें जीवन में हर क्षण सुखानुभूति ही होती रहे और दुःख आए ही नहीं।

ईश्वर की कृपा का सीधा संबंध हमें सुखों और दुःखों दोनों ही स्थितियों में आनंद से और आनंद के साथ उन क्षणों को भुगत लेने से है। ईश्वर की सच्ची कृपा तो तब प्राप्त होती है जब पुराने पाप और पुण्य कर्मों की बदौलत हमें प्राप्त दुःख और सुख सारे ही जितना हो सकें, जल्द से जल्द भुगत कर जीवन यात्रा में इनकी शून्यता की स्थिति आ जाए। इन संचित कर्मों का पूर्ण फल भोग लेने के उपरान्त ही भगवान की कृपा का प्रत्यक्ष और पूर्ण अनुभव होता है और यहीं से शुरू हो पाती है जीव और शिव की यात्रा। ईश्वर की कृपा का मतलब है हमारे जीवन की प्रत्येक घटना में भगवान के सान्निध्य का अनुभव।

यह हो जाए तब हर घटना अविस्मरणीय आनंद से भर जाती है। दुःखों का भान ही नहीं होता और सुखों का अभिमान नहीं।  दोनों ही स्थितियों में समत्व का अहसास कराती है ईश्वर की निकटता। फिर न कहीं बुरा होता है और न कहीं अच्छा। जो होता है, हो रहा है वह सब होने के लिए हो रहा है और इन सभी स्थितियों में चरम आनंद की प्राप्ति होती है जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता।

आजकल अर्थप्रधानता के लपेटे में भगवान को भी लिया जाने लगा है। भगवान हर कण-कण में है, उसे न तो विशाल महल चाहिए और न ही कोई आलीशान मन्दिर। बावजूद हर कहीं देवस्थानों के निर्माण और विकास-विस्तार का भूत सवार है। जीवंत देवता के रूप में हमारे आस-पास विद्यमान प्राणियों की उपेक्षा की जा रही है, रोजाना लाखों लोग भूखे सोते हैं, पहनने को कपड़े नहीं हैं, रहने को छत नहीं, जीने को स्वाभिमानी जिन्दगी नहीं। दूसरी और हम हैं कि भगवान के नाम पर अरबों रुपया पानी की तरह बहा रहे हैं। ईश्वर को आरसीसी, इर्ंटों और पाषाणों के कैदखानों में नज़रबंद करने का शगल बहुत पुराने समय से चला आ रहा है। हमारे यहां कब कमी रही है देवालयों की। चलती-फिरती देहों में देवालय तलाशने की बजाय जड़ तत्वों में मन, तन और धन सब कुछ स्वाहा हो रहा है। जो भगवान सभी को सब कुछ देता है उसके आगे हम लोग पैसा फेंक कर अहसान जता रहे हैं। इस तरह मन्दिरों में पैसा चढ़ाना भगवान का घोर अपमान है। जो प्रभु सभी को रुपया-पैसा और सम्पत्ति प्रदान करता है उसे पैसा देना उसका अपमान नहीं तो और क्या है?

हमारे देश में आजकल टेम्पल-इण्डस्ट्री चल रही है जिसके बूते धर्म के नाम पर असंख्यों बाबे-पुजारी कमा खा रहे हैं। इनका न भगवान से कोई लेना-देना है, न धरम से। मन्दिरों की मार्केटिंग होने लगी है, विज्ञापन बाजारों में मन्दिरों का प्रभुत्व बढ़ता जा रहा है। बिना किसी लागत पूंजी में लाखों-करोड़ों के वारे न्यारे करने वाली इससे अच्छी प्रतिष्ठादाता इण्डस्ट्री और कौनसी हो सकती है इस जमाने में। जरूरतमन्द व्यक्ति को उसकी जरूरत की वस्तु प्रदान कर देना अथवा उसमें सहयोग करना ही भगवान की सबसे बड़ी भक्ति है। आज लोग दान-धर्म की परिभाषाएँ गलत समझ बैठे हैं। ढोंगियों ने धर्म के नाम पर लूट मचा रखी है। हर देवता और मन्दिरों को वारों, तिथियों और त्योहार-पर्वों से जोड़ कर धर्म की गाय को सौ-सौ हाथों दूहने का धंधा परवान पर है।

शनि मन्दिर का ही नहीं, पूरे देश के मन्दिरों का यही हाल है। हालात ये हैं कि मन्दिरों के नाम पर देश की बड़े पैमाने पर पूंजी डेड-स्टोर हो रही है और ये समाज के किसी काम नहीं आ रही है। शनि महाराज के भण्डारे की बजाय जरूरतमन्द गरीबों को अपने हाथ से अन्नदान करना शनि की सर्वोपरि उपासना है। कई जगह शनि महाराज को तेल चढ़ा रहे हैं जबकि इसके मूल में यह था कि शनिवार के दिन स्वयं के शरीर पर तेल की मालिश करने से शरीरस्थ शनि प्रसन्न होता है और अपना शारीरिक सौष्ठव बढ़ता है। इस बात को उलट कर उस्ताद लोगों ने अपने हित साधने के लिए शनि को तेल चढ़ाने की बात फैला दी है। इससे हर शनिवार को काफी संख्या में तेल जमा हो जाता है जिसे बाजार में ये लोग बेच खाते हैं। ऎसे धंधेबाजों को न भगवान से भय है, न धर्म से। हो भी क्यों? जब तक देश में भोले-भाले, नासमण्, मूर्ख और अंधविश्वासी लोग हैं, तब तक शातिर ठगों का धंधा चलता रहेगा। धर्म को धंधा बनाने वाले लोगों ने धर्म का जितना अपमान  किया है उतना पिछली सदियों में भी किसी ने नहीं किया।  ऎसे माहौल में धर्म के मूल मर्म को समझने और मूर्ख लोगों को समझाने के लिए बहुत कुछ किए जाने की जरूरत है।