आगे बढ़ें अपनी काबिलियत से, औरों की निन्दा के सहारे नहीं

आगे बढ़ें अपनी काबिलियत से, औरों की निन्दा के सहारे नहीं

आगे बढ़ना हम सभी चाहते हैं। अनपढ़ हो या पढ़ा-लिखा, हुनरमन्द हो या ढपोड़शंख, सभी के भीतर महत्वाकांक्षा से लेकर उच्चाकांक्षाओं का ज्वार हर क्षण लहराता रहता है।  कुछेक ही होंगे तो स्थितप्रज्ञ और आत्म आनंद से भरे-पूरे होने की वजह से मस्त, शान्त और अपने ही हाल में जीने वाले हों,  अन्यथा संसार में हर तरफ प्रतिस्पर्धा, कुछ न कुछ पा जाने और अपने नाम कर लेने की जबर्दस्त लूट-मार मची है।

अपने आप को आम से ख़ास तथा वीआईपी-वीवीआईपी मानने-मनवाने के लिए खूब सारे रास्ते हैं। एक रास्ता शुचिता, कर्म और निष्ठाओं भरा है जिसमें कड़ी मेहनत, समय और ऊर्जा लगती है किन्तु इसका सुफल ठोस, श्रेयदायी और कालजयी होता है।

इस मार्ग को  वे ही मनस्वी और कर्मशील लोग अपना सकते हैं जो पवित्र बुद्धि, निर्मल चित्त वाले, लक्ष्य के प्रति ईमानदार, धीर-गंभीर और संयम रखने वाले हों। जबकि दूसरी ओर शोर्ट कट को अपनाते हुए अपने लक्ष्यों में सफल हो जाने की तमन्ना रखने वालों की भरमार है। आजकल सब तरफ शोर्टकटिया लोगों की भरमार है। और इनके सफलता पाने के रास्ते भी विचित्र हैं।

इस प्रजाति के सभी लोग चाहते हैं कि दुनिया की सारी प्रतिष्ठा, पद, वैभव और सम्मान उन्हें ही प्राप्त होते रहें और वह भी कम से कम मेहनत में या कि बिना कोई मेहनत किए। इसके लिए ये लोग कुटिलताओं, चतुराई और धूर्तता भरे कामों को अपनाते हैं या फिर अपने स्वाभिमान, आत्म सम्मान और प्रतिष्ठा को तिलांजलि देकर अपने स्वभाव को ऎसा बना लेते हैं कि जैसे किसी के पालतु पशु हों, मूक-बधिर और जड़मति हों या फिर जरखरीद गुलाम।

इसी किस्म के लोग अपनी सारी मर्यादाओं  को तोड़ कर अपने क्षुद्र स्वार्थों की अँधी दौड़ में निकल पड़ते हैं। इन्ही लोगों की भीड़ में से पराश्रित भीड़ प्रसूत हो जाती है जिसे हर जगह विशिष्ट प्रकार का आतिथ्य, खान-पान, एयरकण्डीशण्ड आवास और वाहन, आदर-सम्मान, श्रद्धा और तमाम प्रकार के संसाधन मुफ्त में चाहिए होते हैं।

इसी भीड़ का एक हिस्सा झूठन और खुरचन खाने और मुफतिया रस पीने में इतना अधिक मग्न हो जाता है कि उसे पता नहीं रहता कि वह वही इंसान हैं जिसे सामाजिक प्राणी कहा गया है और जिसके पुरखे इतने पराक्रमी हुआ करते थे कि उनके शौर्य और विलक्षण कर्तृत्व की गूंज आज तक भी है।

हम अपनी अपेक्षाओं और अपने भीतर विद्यमान ज्ञान, प्रतिभा और अनुभवों की तुलना करें तो हम पाएंगे कि हम सभी लोग अपनी हैसियत से अधिक को पाने के लिए उतावले बने रहते हैं और जितना कुछ पा रहे हैं वह भी अपनी औकात से कहीं ज्यादा है।

इंसान की इससे भी बड़ी एक और बीमारी है जिसकी चपेट में एक बार कोई भी आ जाए तो मरते दम तक नही छूट पाती। इस बीमारी से पीड़ित इंसान हर वक्त इसी कोशिश में लगा रहता है कि वह बड़े, प्रभावशाली, धन-दौलत और शक्तियों से सम्पन्न महान और लाभ दे सकने वाले लोगों के साथ और आस-पास बना रहे।

बड़े लोगों की भी यही कमजोरी है कि उन्हें अपने आस-पास ऎसी भीड़ हमेशा  चाहिए जो कि  इनकी हाँ में हाँ करती रहे, इनकी झूठी महिमा का गान करती रहे और इन महान लोगों को हमेशा भ्रमों के  भँवर में फंसाये रहे ताकि ये बड़े लोग आत्ममुग्ध होकर अपनी ही अपनी चलाते रहें।

लत पड़ जाने पर एक स्थिति ऎसी आती है कि ये लोग बाहरी दुनिया की हलचलों, प्रतिक्रियाओं आदि से इस कदर बेखबर हो जाते हैं कि इन्हें अपने आस-पास और सामने दिखाई देने वाली भीड़ हमेशा प्रशंसकों, शुभचिन्तकों और अनुचरों की ही प्रतीत होती रहे।

यह स्थिति घोर संवेदनहीनता को जन्म देती है और इससे हर तरफ एकतरफा संवाद ही चलना शुरू हो जाता है। दुनिया में हर बार जब भी अराजकता का इतिहास बना है तब ऎसी ही संवादहीनता के साथ असत्याश्रयी माहौल जिम्मेदार रहा है।

बुद्धिजीवियों की बहुत बड़ी भीड़ तो बड़े लोगों के साथ रहकर इसी मुगालते में जी रही है कि वे ही चला रहे हैं इन बड़े लोगों को, वरना उन भौंदुओं में कहाँ इतनी अक्ल है कि अपने बूते चल सकें और दूसरों को चला सकें।

इन्हीं हालातों का फायदा उठा कर साथ वाले और आस-पास घेरे रहने वाले अपनी कारगुजारियां करते रहते हैं। बड़े लोगों और उनके अनुचरों का फर्ज निभा रही भीड़ के हिस्सेदारों का परस्पर साहचर्य लंगड़े और अंधे की दोस्ती जैसा हो जाता है। एक-दूसरे पर आश्रित होकर जीने की विवशता पाल लेने वाले लोगों के लिए यह दोस्ती तोड़ना आत्मघाती ही है।

बहुत से लोग अपने आपको गौरवशाली, विशिष्ट और स्वनामधन्य मानने लग गए हैं जब से किसी न किसी बड़े के साथ हो गए हैं। कई तो बड़ी हस्तियों के साथ ऎसे चिपके रहने लगे हैं जैसे कि साथ आए नाई-भिश्ती, धोबी, मेहतर, नीम-हकीम हों या फिर उनके सुरक्षागार्ड अथवा सेवादार। कई तो अपने आपको इनकी रसोई और हरम का हिस्सा मानकर भी फूले नहीं समाते।

सामीप्य का अवसर पाकर ये लोग कान भरने से लगाकर कान फूँकने तक की सारी करामातों में माहिर हो जाते हैं। खूब सारे प्रतिभाहीन, नाकारा और धूर्त लोग बड़े-बड़े सोंफा-कुर्सीधारियों और जाजमबाजों के साथ रहकर अपनी छवि चमकाने में सफल हो जाया करते हैं और इसके लिए अपने सिवा सभी दूसरे लोगों के बारे में अंटशंट और चिकनी चुपड़ी बातें करते हुए निन्दा में रमे रहते हैं।

जो इंसान काबिल नहीं होता, उसकी मजबूरी है कि वह दूसरों की बुराइयां करता रहे और अपनी तारीफ के पुल बांधते रहे। जो जितना अधिक कमजोर और भिखारी मनोवृत्ति का होता है वह दूसरों की उतनी ही अधिक बुराई करने वाला होगा क्योंकि जिसकी खुद की दुकान खाली होती है वह दूसरी दुकानों के बारे में अच्छा कभी नहीं कह सकता।

खूब सारे लोग आज ऎसे ही हैं जो दूसरों की बुराई, निन्दा और झूठी बातें कहकर ही टिके हुए हैं। इस किस्म के लोग अपने स्वार्थ के लिए कभी भी कुछ भी कर सकते हैं इसलिए इनसे सावधान रहने की जरूरत है।

हमारे दुर्भाग्य से वर्तमान में ऎसे ही लोग हर जगह पसरे हुए हैं। मजा तो तब है कि हम अपनी काबिलियत से आगे बढ़ने की कोशिश करें, दूसरों की निन्दा-बुराई कर या उनके विरूद्ध धर्महीन षड़यंत्रों के बूते नहीं।