अपनों को दें भरपूर प्यार

आजकल सभी लोगों को दूर के ढोल, पहाड़ और लोग सुहावने और सुकूनदायी लगते हैं। और यही कारण है कि आदमी अपने आस-पास के सुकून और आत्मशांति की उपेक्षा करता हुआ कस्तुरी मृग की तरह यहाँ-वहाँ आत्मीयता, पारिवारिक टच और सुकून पाने के लिए भटकता रहता है।

आमतौर पर आदमी का दोहरा व्यवहार पूरी जिन्दगी झलकता रहता है और यह मरते दम तक बरकरार रहता है। बात चाहे घर-परिवार की हो, कर्म क्षेत्र की अथवा कहीं ओर की। कुछ बिरले ही लोग ऎसे होते हैं जिनके लिए समत्व भाव और सम दृष्टि हमेशा बनी रहती है और ऎसे लोग वे ही हो सकते हैं जिनकी कथनी और करनी, वाणी और आचरण में सम्पूर्ण साम्य हो तथा चरित्र, व्यवहार और जीवनचर्या शुद्ध-बुद्ध हो।

वरना भविष्य की चिंता करने वाले, भ्रष्ट, बेईमान और स्वार्थी लोगों की जिन्दगी पग-पग पर दोहरे-तिहरे व्यवहारों, कुटिलताओं और पाखण्डों से भरी रहती है। यह सारा आडम्बर उनकी जिन्दगी और कार्यशैली से साफ तौर पर झलकता भी है।

भले ही ये लोग कितना ही बनने और सँवरने की कोशिश क्यों न कर लें। चेहरा हमेशा दिल की बात बता ही देता है चाहे कितना ही छुपाने की हम कोशिश क्यों न करें। आँखों की पुतलियाँ सच को हमेशा साफ-साफ बयाँ कर ही दिया करती हैं।

जीवन की सच्चाई और आनंद इसी में है कि जो हैं वही बने रहें और हमारा पूरा व्यवहार सर्वस्पर्शी और आह्लाद देने वाला हो। ‘घर का जोगी जोगना….’ अथवा ‘ घर की मुर्गी …’ जैसी कहावतों की बुनियाद पर जीने वाले लोग अपने जीवन के उत्तराद्र्ध तक पहुँचते-पहुँचते भी कोई ठौर नहीं पा सकते हैं जो कि उन्हें चाहिए होता है।

आज बहुसंख्य लोगों की स्थिति तकरीबन ऎसी ही हो गई है जिनके लिए बाहरी और पराये लोग ही सब कुछ हैं, और घर वाले तथा परिजन या कुटुम्बी गौण। हमारी सामाजिक व्यवस्थाओं और कौटुम्बिक स्निग्ध संबंध सेतुओं में आयी गिरावट के कारण ही हम अपने लोगोें के बीच रहते हुए भी असुरक्षित व अविकसित महसूस करने लगे हैं और दूसरों पर निर्भरता बढ़ती जा रही है।

सुरक्षा, संरक्षा और विकास की सभी संभावनाओं भरे स्वस्थ माहौल के बावजूद हमारी तलाश के पैमाने बदल गए हैं। इसका मूल कारण यह है कि हमारा पूरा जीवन स्वार्थ और आत्मकेन्दि्रत बुराइयों को अपना चुका है जहाँ हमारे लिए वे सारे नाते-रिश्ते बेमानी हैं जिनसे हमारे हित नहीं सधते हैं।

हित सधते भी हैं तो हमें लगता है कि अनचाहे ही सुकून का बँटवारा हो सकता है। इसी ऊहापोह और अंधे स्वार्थों के मोह से घिरे हम लोगों के लिए वो तमाम रास्ते अच्छे लगने लगे हैं जिनकी जानकारी हमारे घर-परिवार के लोगों और आत्मीयों को नहीं हुआ करती।

हम इसी डर से वे सारे काम चुपचाप करने लगते हैं जिनका हमारी समृद्धि या कि भोग-विलास के संसाधनों से संबंध होता है। और यही वह प्रमुख वजह है जिसके कारण हम घर-परिवार वालों, कुटुम्बियों और अपने आत्मीय लोगों के प्रति बेपरवाह रहते हुए उन लोगों को ज्यादा तवज्जो देते हैं जिन लोगों से हमारा किसी भी प्रकार का उचित-अनुचित स्वार्थ पूरा होता हो, हमारे करमों को ढंकने के लिए आवरण मिलते हों अथवा अपने अपराधों को दबाए रखने का हौसला।

व्यक्तिगत जिन्दगी से लेकर सामाजिक जिन्दगी तक हम देखें तो साफ पता चलेगा कि हम लोग खुद के घरवालों व कुटुम्बियों की उपेक्षा का कोई मौका नहीं छोड़ते। चाहे वे अपने माता-पिता, भाई-बहन हों या कोई निकट के संबंधी।

दूसरी ओर जमाने भर में अपनी छवि को शुभ्र बनाए रखने तथा औरों का स्नेहपात्र, कृपापात्र या प्रेमपात्र बने रहने के फेर में हम उन तमाम रास्तों का सहारा लेते हैं जिनसे आदमी के व्यक्तित्व के बारे में भ्रम बना रहता है। ज्यादा नहीं तो कम से कम उस समय तक, जब तक कि अपने स्वार्थ पूरे न हो जाएं।

स्वार्थ पूरे होने के बाद भले ही ये संबंध टूट जाएं, किसे क्या पड़ी है। काम हुआ और संबंध स्वाहा। चिंतनीय बात यह है कि जितनी मेहनत हम परायों को अपना बनाने के लिए करते हैं उसकी दस फीसदी भी मेहनत हम अपने लोगों पर खर्च करें या संबंधों का आडम्बर त्याग दें, तो हमारा जीवन और परिवेश कितना अधिक महकने लग जाएगा, इसकी कल्पना तक सुकून देने वाली है।

आज हमारे लिए परिवारजन और आत्मीय लोग हीन हो गए हैं, उनके प्रति न हमारी श्रद्धा रही है न आदर। और न ही हम उनके सुख-दुःख में भागीदारी निभाने का कोई माद्दा ही रखते हैं। यह ध्यान रखें कि जो व्यक्ति अपने घर-परिवार का नहीं है, अपने माता-पिता का नहीं है, भाई-बहनों और सगे-संबंधियों का नहीं है, वह किसी और का कभी नहीं हो सकता क्योेंकि संबंधों की कमजोर नींव पर न भीतरी संबंध टिके रह सकते हैं, न बाहरी रिश्ते।

कई लोग हम ऎसे देखते हैं जो माता-पिता की जिन्दगी भर उपेक्षा करते रहते हैं। न उनकी सेवा का भाव होता है, न श्रद्धा और आदर का भाव। बीमारी और बुजुर्गियत से घिरे माँ-बाप और बुजुगोर्ं की सेवा तक से घृणा करने वाली ऎसी कई हस्तियाँ हमारे आस-पास भी हैं जो बाहर तो खूब लोकप्रिय हैं मगर उनके माता-पिता के लिए ये लोग उनके जीवन की ऎसी सबसे बड़ी गलती के रूप में स्वीकारे जाते हैं, जिसका प्रायश्चित तक संभव नहीं होता।

कई लोग ऎसे हैं जो बाहर की झूठन चाटने में कभी पीछे नहीं रहते लेकिन माता-पिता के घर का पानी पीने से इन्हें परहेज है। दुर्भाग्य यह कि बाहर तो सच्चे मातृभक्त और पितृभक्त होने के बड़े-बड़े दावे करते हैं, अपने प्रकाशन उनके नाम समर्पित करते हैं लेकिन माता-पिता की मौत के बाद उनके नाम से होने वाले भोज व क्रियाकर्म तक से दूर रहते हैं।

ऎसे लोगों को क्या कहा जाए। माता-पिता की गलती, अनचाही संतान, सायास किया गया अपराध या भगवान की गलती। या फिर यह माना जाए कि असुरों के वहाँ पैदा होने वाले लोग आसुरी लोकों की बजाय धरती पर पैदा हो गए हैं। मिथ्या लोकप्रियता पाने के लिए ऎसे लोग कुछ भी कर सकते हैं। जो लोग माता-पिता के नहीं हो सकते, वे किसके हो सकते हैं? ऎसे लोगों से मानवीय व्यवहार की उम्मीद करना न सिर्फ बेमानी बल्कि मूर्खता भी है।

जीवन निर्माण की बुनियाद है घर-परिवार, यही हमारी वह प्राथमिक पाठशाला है जिसके बूते हम जमाने भर में अपने कर्म, फर्ज और धर्म की छाप छोड़ सकते हैं। इस बुनियाद के कमजोर होते हुए न हम अपना व्यक्तित्व संवार सकते हैं, न जमाने का भला कर सकते हैं।

इसलिए जीवन में जो कुछ हो गया, उसकी चिंता छोड़ें और अपने लोगों के प्रति संवेदनशील रहें, उनके प्रति अपने गुरुतर दायित्वों को समझें, निभाएं तथा सबके अपने बन कर रहें, इसी में व्यक्तित्व की पूर्णता और सार्थकता है।

अपने भीतर उमड़ रहे प्रेम के ज्वार पर लगाए गए सारे दकियानुसी पहरे तोड़ें और अपने लोगों को प्रेम दें, सद्भावना रखें तथा संवेदनशीलता के साथ आत्मीय भागीदारी निभाएं। अपने घर-परिवार और कुटुम्ब के प्रति संवेदनशीलता और माधुर्य आ जाने पर जमाना अपने आप अपना होने लगता है। जो लोग ऎसा करते हैं उनके लिए वर्तमान जीवन तो स्वर्ग जैसा आनंद प्रदान करता ही है, उनके आगे वाले जन्म भी सुधर जाते हैं।

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