अपनों को दें भरपूर प्यार

अपनों को दें भरपूर प्यार

प्यार शब्द हमेशा से चर्चाओं में रहा है। बच्चों से लेकर बूढ़ों तक के लिए यह शब्द गुदगुदाहट और रोमांच जगाने के लिए काफी है।  बात केवल स्त्री और पुरुष के बीच प्यार भरे रिश्तों की नहीं है, बल्कि यह जगत के तमाम जीवों और सृष्टि के प्रत्येक तत्व से प्रेम की है।

केवल जीवन्त से ही नहीं बल्कि जड़ तत्वों के प्रति भी उतना ही प्यार जरूरी है।  रस, रूप, गंध, शब्द और स्पर्शादि पंच तन्मात्राओं का सीधा संबंध प्यार से है और इनकी भरपूर प्राप्ति यदि हो जाए तभी प्यार  और जीवन परिपूर्णता को प्राप्त कर सकता है। इसके बिना किसी का, और कैसा भी प्यार न परिपक्व हो सकता है और न ही सफलता पा सकता है।

प्रेम या प्यार अपने आप में वह परिपूर्ण शब्द है जो सात्ति्वक भावनाओं और जीवन व्यवहार का वो सनातन आदर्श सूत्र है जिसमें मानवीय संवदेनाएं, दया, करुणा, पारस्परिक विकास, सहोदरी भावनाएं, एक-दूसरे के लिए जीने और हमेशा काम आते हुए आत्मीय माधुर्य का दरिया उमड़ाने वाली तमाम स्थितियां साकार होती हैं और इसके आगे और कुछ शेष नहीं है। यहीं आकर जीवन की परिपूर्णता और आत्मविकास की राह खुलती है।

मूलतः प्रेम जीवात्मा के भीतर की ब्रह्माण्डाकार वृत्ति को जागृत कर सभी के प्रति करुणामूलक प्रेम का संचार करता है और यह उस स्थिति में पहुँचाता है जहाँ सच्चिदानन्द के आगे कुछ नहीं है तथा सभी के प्रति समत्व और तत्वमसि बोध का प्राकट्य होता है।

प्रेम किन्हीं दो विपरीत ध्रुवों या लिंगों का आकर्षण मात्र नहीं होता बल्कि प्रेम सार्वजनीन होता है। यह सांसारिक मायाजाल की तीव्रतर भीषण गर्मी और रेतीली तेज आँधियों के बीच हवा का शीतल झोंका भी है और प्यासे कण्ठों और जमीन के लिए बरसाती पानी भी, जिसका समान वितरण सभी पर होता है और इसमें कहीं कोई भेदभाव नहीं रहता।

प्रेम का अर्थ यही है कि यह व्यापक और अपरिमित होता है और किसी व्यक्ति, वस्तु या स्थान से बंधा नहीं होता। यह वैश्विक धरातल रखता है और पूरा विश्व उसका अपना आत्मीय कुटुम्ब ही होता है।

प्रेम की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि यह जहाँ और जिसमें होता है वहाँ राग-द्वेष, ईष्र्या, संकीर्णता, अपने-पराये और स्वार्थ का कोई कतरा रह नहीं सकता। आज जिसे हम प्यार या प्रेम कहकर अपने आपको प्रेमीले मान बैठे हैं, पारस्परिक प्रेम दर्शा कर खुशफहमी पाले हुए हैं, एक-दूजे के लिए जीने-मरने की कसमों और वादों में डूब रहे हैं, गोलगप्पों से लेकर रेस्तराओं और होटलों में तरह-तरह के खान-पान का मजा ले रहे हैं,  नदी-नालों, झील-समन्दर के किनारों, वनों, दर्शनीय स्थलों और धर्म धामों में एकान्तिक मुलाकातों के दौर का मजा ले रहे हैं या सफर का आनंद पा रहे हैं।

यह सब प्यार नहीं दिखावा है।  और तो और शादी-शुदा जोड़े भी जब दुपहिया वाहनों पर सैर करते हैं तब उनके संस्पर्श और हाव-भाव को देख कर ऎसा लगता है कि जैसे प्यार और दाम्पत्य की खुमारी उन्हीं पर चढ़ रही हो। इनके हाथों का संचरण देख कर महसूस होता है कि प्रगाढ़ दाम्पत्य प्रेम में डूबे हुए इन लोगोंं को घर में ऎसा कोई अवसर नहीं मिल पा रहा होगा कि वे प्यार जता सकें, इसीलिए उन्हें प्यार की अभिव्यक्ति के लिए सार्वजनीन संचरण स्थलों का सहारा लेना पड़ा है।

प्रेम का संबंध केवल स्त्री और पुरुष के बीच ही नहीं होता बल्कि हर जीवात्मा के लिए यह जरूरी है कि प्रेममूलक दृष्टि और कल्याणकारी दिशा हो।  पर ऎसा होता नहीं।  प्रेम को हमने संकीर्णता में बांध दिया है।

प्रेम का अर्थ हम आपस में किसी न किसी संबंध में बंधे हुए या अब तक नहीं बंध पाए पुरुष और स्ति्रयों के मध्य के सेतु के रूप में ही लेते हैं। इससे भी परे एक प्रजाति ऎसी है जिसके लिए नाजायज संबंध को भी प्रेम मान लिया गया है।

प्रेम कई मामलों में एकतरफा होता है और कुछ अर्थ में बहुआयामी। अधिकांश मामलों में प्रेम को हथियार बनाकर लोग भावुकता भुनाते हैं और संवेदनशील लड़के-लड़कियों और पुरुष-स्ति्रयों को भरमाकर या बहला-फुसला कर अपने जाल में फंसा लेते हैं।

समझदार लोग तो समय रहते सतर्क हो जाते हैं किन्तु प्रेम शब्द के दुरुपयोग में माहिर लोग अपने उल्लू सीधे करते हुए देह से लेकर सम्पत्ति, जमीन-जायदाद और धन-दौलत आदि सब कुछ हथियाते रहते हैं।

आजकल काफी संख्या में ऎसे स्त्री-पुरुषों ने प्रेम को धंधा बना लिया है।  मेहनत से दूर भागने वाले, अपराधी किस्म के लोगों के लिए प्रेम बिना पूंजी का धंधा बन चला है जहाँ वे प्रेम जाल में फंसाने और लूटने का काम करने लगे हैं।

दाम्पत्य संबंधों से लेकर घर-परिवार और समाज तथा परिवेश तक में आजकल प्रेम के नाम पर लोग आत्मीयता की तलाश में भटकने लगे हैं और जहाँ उन्हें थोड़ा सा बहलाने वाला प्रेम मिल जाता है, वहाँ चहकते हुए बहक जाते हैं और अपने जीवन के लक्ष्य को त्याग कर ऎसे अंधकार से घिर जाते हैं जहाँ प्रेम के नाम पर क्षरण, मानसिक, शारीरिक और आर्थिक शोषण, समय की बरबादी तथा अन्त में नैराश्यपूर्ण जीवन का समय से पूर्व अन्त हो जाने के सिवा और कुछ हाथ नहीें आता।

आखिर घर, भरा-पूरा परिवार, विस्तृत समाज और क्षेत्र में सम्पर्कितों और शुभचिन्तकों की भारी तादाद के बावजूद हम प्रेम की तलाश में बाहर की ओर क्यों भटकते हैं, यह आज का यक्ष प्रश्न है।

हर जीवात्मा अपनों से प्यार, स्नेह, श्रद्धा और आशीर्वाद तथा मदद का भूखा होता है और उसे यह अपेक्षा रहती है कि घर के लोग उसे प्यार दें। और जब यह प्यार नहीं मिलता तब लड़की हो या लड़का, बड़ा आदमी हो छोटा, युवती हो या प्रौढ़ा, सभी के जीवन में बहुत बड़ा अभाव महसूस होता है और इस अभाव को प्यार ही दूर कर सकता है।

और जब यह प्यार घर में, अपनों से नहीं मिलता तब उसकी बाहर की ओर तलाश पहले चोरी-छिपे और बाद में जाहिर तौर पर सामने आती है और इसी मनोवृत्ति से जायज-नाजायज संबंधों, प्रेम के नाम पर बहक जाने और मर्यादाओं को तिलांजलि देने की शुरूआत होने लगती है।

विवाह संबंधों में बंधे दम्पत्तियों के मध्य भी उसी प्यार की दरकार होती है किन्तु कोई सा एक पक्ष प्रेम लुटाने में कंजूसी बरतता है अथवा जानबूझकर उपेक्षा करता है तब यह स्वाभाविक ही है कि प्रेम का अभाव भुगतने वाला पक्ष कुछ समय तक तो मर्यादाओं में बंधा रहेगा किन्तु जहां मौका मिलेगा, अनुकूलताओं का अहसास होगा, वहाँ अन्यत्र संबंधों की तलाशी के सारे मार्ग खुले रहेंगे।

बात केवल पति-पत्नी के प्यार की ही नहीं, हमारे बच्चे भी हमसे माता और पिता का भरपूर प्यार चाहते हैं और हमारे माता-पिता भी चाहते हैं कि उनके प्रति हमारा श्रद्धा सिक्त प्यार हमेशा उमड़ता रहे। इसी तरह हमसे जुड़े और बंधे हुए सभी लोग चाहते हैं कि उन्हें पूरा का पूरा प्यार मिले।

जब अपनों को हम पूरा प्यार नहीं दे पाते, तब वे परायों में उस प्यार की तलाश करते हैं। दुनिया के तमाम अवैध संबंधों, लव जेहाद, लूट जेहाद और प्यार के नाम पर घटित होने वाले सभी प्रकार के अपराधों का मूल कारण यही है।

प्रेम की कीमत उन बच्चों से पूछें, जिन्हें माता-पिता का प्यार नहीं मिला। उन विधवाओं से पूछें जिन्हें पति का प्यार नहीं मिल पाया और उन लोगों से पूछें जिन्हें अपने से बड़े-बुजुर्गों का न सान्निध्य मिल पाया और न ही उनका प्यार।

संयुक्त परिवारों की प्रथा खत्म होने के बाद स्थितियां और अधिक घातक और विषैली होने लगी हैं। वक्त की मांग है कि प्रेम के महत्व को समझें और अपनों को भरपूर प्यार दें वरना वे भी एक दिन परायों से प्यार पाने की तलाश में भटकने लगेंगे और ऎसे मुकाम पर जा पहुंचेंगे जहाँ प्यार का अर्थ ही कुछ दूसरा होगा।

आज के प्रेम विहीन माहौल में हम ईश्वर से भी दूर होते जा रहे हैं।  तीन सौ वर्ष पूर्व संत मावजी महाराज ने कहा था – प्रेम तु ही ने प्रेम स्वामी, प्रेम त्यां परमेश्वरो।