सेवानिवृत्त कर्मयोगियों को दें भरपूर श्रद्धा, सम्मान और सुविधाएँ …

सेवानिवृत्त कर्मयोगियों को दें भरपूर श्रद्धा, सम्मान और सुविधाएँ …

सम्मानजनक पारिश्रमिक के हकदार हैं ये अनुभवी विशेषज्ञ

जीवन के कितने ही दशकों तक समर्पित और नैष्ठिक सेवाएं देने के बाद ज्ञान और अनुभवों के सुमेरू पर्वत के रूप में अपनी पहचान बनाने वाले बुजुर्गों को सेवानिवृत्ति के उपरान्त संविदा पर सहायक कर्मचारियों, चौकीदारों और कम्प्यूटर ऑपरेटरों आदि की तरह लगाना उनका सरासर और घोर अपमान है।

एक तरफ ज्ञान और अनुभवों का बहुत बड़ा खजाना, और दूसरी तरफ सम्पूर्ण समर्पण भाव, माधुर्य और सेवा भावना की विलक्षणताओं का परिचय देते हुए आकाओं एवं उच्चाधिकारियों के अत्यन्त प्रिय पात्र और विश्वस्त बनकर हर परिस्थिति में साथ रहने और हर प्रकार के कर्म में साथ देने वाले इन बुजुर्गों को सेवानिवृत्त मानना ही अपनी गलत सोच है।

जरा उनकी सेवाओं की ओर देखें और यह महसूस करें कि उनके कारण से आज हमारा कुनबा और कबीला हर मामले में कितनी ऊँचाइयों को पाता जा रहा है और इन्हीं महानुभावों के अन्यतम, विलक्षण और अद्भुत कर्मयोग की बदौलत हम सभी लोग नौकरी में आसानी से हर काम कर पा रहे हैं, सुख-चैन और समृद्धि भरी तथा तनावों से मुक्त जिन्दगी जी पा रहे हैं।

हममें से हर कोई इन ज्ञानी और अनुभवी विशेषज्ञों की किसी न किसी रूप में कृपा, दया और अनुकम्पा का अनुभव हमेशा करता ही रहा है, जिसे हम शायद ही कभी भुला पाएं।

कहा गया है – न सा सभा यत्र न सन्ति वृद्धाः।  वह समुदाय या संस्थान किस काम का, जिसमें वृद्धजन न हों।

दीर्घकालीन सेवाओं और समर्पण भाव से किये गए कर्मयोग का ही परिणाम है कि सेवानिवृत्ति के बाद भी तमाम प्रकार के बाड़ों और गलियारों में काम करने का ज़ज़्बा उनमें कूट-कूट भरा हुआ है।

ज्ञान और अनुभव जब परिपक्व हो जाते हैं तब वे आयु को भी मात कर जाते हैं।

क्यों न सेवाओं में पृथक से एक कैडर बनाया जाए जिसमेंं केवल और केवल सेवानिवृत्तों को ही शामिल किया जाए और उनके ज्ञान, अनुभवों, दक्षता और की गई उत्कृष्ट एवं उल्लेखनीय सेवाओं के बदले पेंशन के साथ ही कम से कम छह अंकों में सम्मानजक पारिश्रमिक की व्यवस्था की जाए, ताकि उन्हें यथोचित श्रद्धा, आदर-सम्मान प्राप्त हो सके।  इस कैडर में शामिल महानुभावों की भूमिका निर्देशन प्रदान करने और अपने ज्ञान-अनुभवों से लाभान्वित करने की होनी चाहिए।

संविदा पर इन्हें लगाना सेवानिवृत्तों का घोर अपमान है जो यह प्रकट करता है कि उनके ज्ञान, अनुभवों और विलक्षण दक्षताओं की बेकद्री की जा रही है।

जहाँ-जहाँ से जो-जो लोग सेवानिवृत्त हों, यदि उनकी पुनः इच्छाएं जागृत हों तो स्वतः मार्गदर्शक मण्डल में आ जाएं और उन्हें सम्मानजनक पारिश्रमिक और सभी प्रकार की सुविधाओं का लाभ मिलना चाहिए।

इससे सेवानिवृत्तों में भेदभाव भी समाप्त होगा और उन्हें अपनी सेवाओं पर गर्व भी बना रह सकेगा।

अभी हो यह रहा है कि सेवानिवृत्तों में से कुछ को ही वापस सेवाओं का मौका मिल रहा है।

इससे यह गलत संदेश जा रहा है कि जो लोग वापस लौट कर बाड़ों-गलियारों में नहीं आए हैं, वे योग्य नहीं हैं या अपात्र हैं। और इसी कारण उन्हें पुनः अवसर नहीं दिया गया है।

हालांकि बहुत सारे स्वाभिमानी, संस्कारी और आदर्श व्यक्तित्व हैं, जो वानप्रस्थाश्रम का आनंद लेते हुए अपना अधिकांश समय घर-परिवार, कुटुम्ब और सामाजिक सेवा कार्यों में व्यतीत करते हुए धर्म-ध्यान और साधना में रत हैं और जीवन के उत्तरार्ध में मोक्ष या ईश्वर प्राप्ति के मार्ग पर हैं।

जीवन के सत्य को समझने वाले ऎसे लोग दुबारा लौटने की मनोवृत्ति से परे रहते हैं लेकिन खूब सारे सेवानिवृत्तों के लिए कर्म ही पूजा है।  और इसलिए आजीवन सेवा के कर्मयोग को साकार करते हुए मनुष्य जन्म को सार्थक करने का उनका लक्ष्य स्तुत्य और सराहनीय है।

समाज और देश के लिए काम करने वाले इन्हीं नैष्ठिक महानुभावों के समर्पित कर्मयोग के कारण ही आज हमारा देश तरक्की के रास्ते पर तेजी से बढ़ता जा रहा है। और अपने-अपने बाड़े ओजोन परत को भेदकर लोकप्रियता के सातवें आसमान को छूने लगे हैं।

सभी प्रकार के सेवानिवृत्तों के प्रति हमें इस धारणा को एकदम मन से निकाल देना चाहिए कि आयु किसी भी कर्म के निर्वाह में अड़चन हो सकती है। कई सेवाएं ऎसी हैं जिनमें लगातार दशकों तक काम करते हुए यौवन और इंसानी ऊर्जा शक्ति में उत्तरोत्तर बढ़ोतरी होती रहती है।

यों भी देखा यही जा रहा है कि नई पीढ़ी के लोग न सीखना चाहते हैं, न इन बुजुर्ग सेवाव्रतियों के नक्शेकदम पर चलकर कुछ करना चाहते हैं। इसलिए समाज और देश के लिए ज्ञानी और अनुभवियों की कमी महसूस की जा रही है।  सेवानिवृत्तों के लिए पृथक से सेवा प्रबन्धन हो जाने पर यह कमी दूर हो सकेगी और सामाजिक विकास एवं राष्ट्रीय उत्थान को सम्बल प्राप्त होगा।

यह अच्छी बात नहीं है कि हम युवाओं में बेरोजगारी और दूसरे कारण गिनाते हुए हमारे विलक्षण  प्रतिभा सम्पन्न मेधा-प्रज्ञायुक्त बुजुर्गों या उन्हें दुबारा किसी न किसी बहाने सेवा में रखने वाले कद्रदानों को दोष दें। ये बुजुर्ग हमारे देश की वो धरोहर हैं जिनके पास सब कुछ है, जो देश और इंसानों के लिए जरूरी है।

इनके पास दीर्घकालीन सेवाओं का व्यवहारिक ज्ञान है, अनुभवों के भण्डार हैं, सेवा-चाकरी और समर्पण भाव के सारे रामबाण नुस्खे हैं, अपने आकाओं और उच्चपदस्थों को खुश करने और उनकी मृत्यु न होने तक खुश रखने के सारे अनुभूत फण्डे हैं।

हमारा फर्ज है कि इन लोगों के मरने से पहले तक के सारे धर्म-कर्म और फर्ज अच्छी तरह निभाएँ और मरने के बाद भी इन्हें अमर मानकर उत्तरक्रिया से लेकर सभी प्रकार के फर्ज का निर्वाह श्रद्धा और आस्था से करें।

भज गोविन्दम् भज गोविन्दम् भज गोविन्दम् …………।

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