मुक्ति पाएं मनहूस लोगों से

भगवान ने सभी लोगों को बराबरी की प्रोग्रामिंग के साथ धरती पर भेजा हुआ है और इस दृष्टि से प्रत्येक मनुष्य बराबर है, चाहे वह किसी भी रंग, लिंग, वर्ग, भाषा, धर्म और क्षेत्र का क्यों न हो।  सभी को समान दर्जा प्राप्त है।

भगवान के वहां से जैसा भेजा गया है, ठीक वैसा ही रहकर वह उम्र के पड़ावों और जीवन को जीता रहे तो उसमें ईश्वरीय तत्वों और शुचिता का अंत तक समोवश बना रह सकता है। किन्तु ऎसा वह कर नहीं पाता।

इसका मूल कारण यही है कि इंसान का अपने आप पर विश्वास नहीं होता, ईश्वर पर विश्वास या श्रद्धा की बात तो बहुत दूर है। जिसे अपने आप पर विश्वास नहीं होता, उसे न तो भगवान पर भरोसा हो सकता है, न ही पृथ्वी के समस्त देहधारियों के प्रति।

और यही कारण है कि विश्वासहीनता के दौर से गुजरते हुए इंसान अपने मौलिक तत्वों, भीतर समाहित ऊर्जा और ईश्वरीय क्षमताओं को भुला कर परिवेशीय सांठ-गांठ, समझौतों और सांसारिक समीकरणों को बिठाने मेें खुद का नहीं रहता, पराया होता चला जाता है।

अपने भीतर जितना अधिक अपनापन या स्वत्व होगा, उतना इंसान खुद के बूते पर संसार को हिलाने की ताकत रख सकता है लेकिन जितना अधिक दूसरों पर निर्भर होता है, उतना अधिक वह स्वत्व खोकर परायेपन को प्राप्त हो जाता है।

उसका सब कुछ उन सभी परायों पर निर्भर करता है जिन्हें वह गॉड फादर या गॉड मदर मानता है। जब तक अपने पर भरोसा रहता है तब तक खुद ही सक्षम बना रहता है, जब दूसरों पर आश्रित हो जाता है तब खुद का भी नहीं रहता।

कभी बिजूकों की तरह बना रहकर हवाओं के इशारों पर पूरी लचक रखता हुआ कसरत करता रहता है और कभी कठपुतलों या कठपुतलियों की तरह वह गीत-संगीत के साथ मनोरंजन करता रहता है।

कभी उसका उपयोग बन्दर-भालुओं की तरह तमाशे दिखाने में होता है, कभी जमूरों या तमाशबीनों की तरह व्यवहार करता हुआ अपने आपको बस्तियों के बीच पाकर मदमस्त होकर तालियां बजाता रहता है।

इस संसार में आने के बाद जो इंसान पराश्रित, भ्रष्ट, रिश्वतखोर, व्यभिचारी, शोषक और अन्यायी हो जाता है तब धर्म उसका साथ छोड़ देता है और तब वह इंसान भीतर-बाहर सब तरफ से अभिशप्त हो जाता है।

 

ऎसा अहंकारी इंसान अपने आपको सर्वज्ञ, संप्रभु और सर्वोत्तम मानता-मनवाता हुआ ऎसा हो जाता है कि जैसे उसके सिवा दुनिया में कोई और हो नहीं। ऎसे लोगों के बारे मेें कहा जाता है कि ये ईश्वर की निगाह में राक्षसी हो जाते हैं और अभिशप्त होने के कारण अपशकुनी हो जाते हैं।

ऎसे अपशकुनी लोग जहाँ जिस स्थान पर रहते या काम करते हैं, जिस कुर्सी या गादी पर बैठते हैं वह स्थान भ्रष्ट हो जाता है तथा ऎसे लोगों के कारण वह पूरा का पूरा बाड़ा या स्थान प्रदूषित हो जाता है। इनके रहते हुए उन स्थानों पर अंधेरों और गहरे होने का आभास होता है तथा पूरा का पूरा आभामण्डल दूषित रहता है।

ऎसे दुष्टों का काला और मलीन आभामण्डल कई मीटर तक पसरा रहता है तथा इस कारण से नकारात्मक ऊर्जाओं और दुष्ट आत्माओं का डेरा भी इनके प्रति आकर्षित होता रहता है। यही कारण है कि बहुत से लोगों के बारे में साफ-साफ कहा जाता है कि ये जहाँ होते हैं वहाँ दुर्र्भाग्य डेरा जमा लेता है।

इनके क्रूर स्वभाव, दुव्र्यवहार, दुश्चरित्र और कुकर्मों के कारण आस-पास के लोग दुःखी होते हैं। ये लोग जहाँ होते हैं वहाँ अंधकार और दुर्भाग्य का साया इस कदर पसर जाता है कि किसी की काम करने की इच्छा नहीं होती, हर कोई तनावग्रस्त और परेशान रहता है, किसी कर्म का अच्छा फल प्राप्त नहीं होता।

जिस संस्थान या बाड़े में ऎसे अभिशप्त एक-दो लोग ही होते हैं वे संस्थान श्मशान या खण्डहर बनने की ओर अग्रसर होते रहते हैं। इन अपशकुनी लोगों के शकुन लेना, इनसे चर्चा करना और इनसे किसी भी प्रकार का व्यवहार करना अपने दुर्भाग्य को आमंत्रित करने जैसा ही है।

ऎसे खूब सारे लोग हैं जिन्हें अभिशप्त और अपशकुनी कहा जाता है और इन मनहूस लोगों के कारण खूब सारे लोग हैरान-परेशान रहने लगे हैं। ऎसे लोगों को स्थान विशेष से हटाकर हाशिये पर रखने या इनका खात्मा करने के सिवा और कोई चारा नहीं है।

इनके खात्मे से ही माहौल सुधर सकता है और फिर से उजाले का अहसास किया जा सकता है। समाज और देश को बचाना चाहें तो सबसे पहले ऎसे अभिशप्त लोगों को सामाजिक प्रवाह से दूर करने की जरूरत है क्योंकि जब तक ऎसे अपशकुनी और दुर्भाग्यशाली लोग रहेंगे, तब तक अंधकार, अन्याय और अत्याचार ही पसरा रहेगा। युगधर्म यही है कि हम सभी लोग मिलकर इन मनहूसों को ठिकाने लगाएं और आसुरी माहौल का खात्मा करें।

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