यों पाएं आशातीत सफलता

यों पाएं आशातीत सफलता

सांसारिक कर्म और फल प्रत्यक्ष होते हैं जबकि आध्यात्मिक कर्म का फल अप्रत्यक्ष होता है इसलिए सांसारिकों के जीवन की पहली प्राथमिकता सांसारिक कर्म, दैहिक आनन्द और भोग होती है।

प्रत्येक प्राणी अपने समग्र जीवन में सम्पूर्ण सफलता और समृद्धि चाहता है और सारे कर्म इसीलिए करता है। और ऎसे में वह पुरुषार्थ चतुष्टय के दो आधारों काम और अर्थ के प्रति अधिक ध्यान देता है जबकि धर्म और मोक्ष के प्रति या तो उदासीन बना रहता है अथवा इन्हें अपने जीवन में अधिक तवज्जो नहीं देता।

वर्तमान प्रतिस्पर्धा के दौर में वह यह समझता है कि संसार और देह, परिवार तथा समाज ये सभी काम और अर्थ प्रधान हैं इसलिए जीवन का अधिकांश हिस्सा हर इंसान इन्हीं दो में खपा देता है और धर्म तथा मोक्ष की सूझा उसे तब पड़ने लगती है जब वह काम और अर्थ को पाने तथा उपभोग करने लायक नहीं रहता।

और सच तो यह है कि इस अवस्था में आ जाने के बाद इंसान न धर्म कर सकता है, और न ही मोक्ष के लिए जरूरी प्रयत्न।  धर्म और मोक्ष के लायक नहीं रहने वाले लोग काम और अर्थ से ही तृप्त हो जाएं, ऎसा कदापि संभव है ही नहीं।

क्योंकि जिस अर्थ में धर्म मय व्यवहार और लक्ष्य न हो, वह इंसान को किसी भी प्रकार का सुख नहीं दे सकता। धर्महीन इंसान और धर्म से विमुख होकर कमाया हुए धन सुख-संतोष और सुकून नहीं दे सकता, केवल इतना भर संतोष जरूर कर सकता है कि उसके पास खूब धन-दौलत, भवन, जमीन और भोग-विलासी सामग्री है।

उसके लिए यह कबाड़ ही है जिसके सहारे वह अहंकार की ऊँची गद्दियों पर बैठा हुआ अपने आपको औरों के मुकाबले श्रेष्ठ और महान सिद्ध दर्शाता रह सकता है।

इंसानी क्षमताओं को और अधिक धारदार तथा पैनापन देते हुए बौद्धिक और शारीरिक शक्तियों का इच्छित विकास किया जा सकता है लेकिन इसके लिए सांसारिक मनोवृत्ति न होकर आध्यात्मिक पृष्ठभूमि का होना नितान्त जरूरी होता है।

बिना आध्यात्मिक पृष्ठबल और आधार के कोई भी इंसान केवल सांसारिक और भौतिकवादी सोच व संसाधनों या आस-पास के सांसारिक भोग विलासियों की मदद से कुछ नहीं कर सकता। धर्म-अध्यात्म और परंपराओं के भीतर वैज्ञानिक रहस्य छिपे होते हैं और इस कारण से इनका प्रभाव इंसान के अंग-प्रत्यंग और विचारों से लेकर आभा मण्डल तक सभी जगह पड़ता है और मानसिक तथा शारीरिक क्षमताओं मेें कई गुना वृद्धि होने लगती है।

जो इंसान जितना अधिक आध्यात्मिक होगा, उसकी बौद्धिक क्षमताएं उतनी ही अधिक निखरती हुई प्रखर होने लगेंगी। इसके पीछे कारण यह है कि इंसान को जितनी ऊर्जा ब्रह्माण्ड या ईश्वरीय स्रोतों से चाहिए, जितना पंच तत्वों का पुनर्भरण होना चाहिए, वह सब कुछ तभी संभव हो पाता है कि जब इंसान रोजाना कुछ क्षण के लिए शून्य का आश्रय ग्रहण करे।

आम तौर पर कोई भी व्यक्ति सीधे तौर पर कभी भी शून्य अवस्था को प्राप्त नहीं कर सकता । इसके लिए ध्यान, ईश्वर की भक्ति, साधना, योग आदि की जरूरत पड़ती है और इसी साधनावस्था में वह लीन होने का अभ्यास करते हुए एक समय ऎसा आता है कि जब वह अपने आप शून्य को पा लेता है और यही कुछ क्षणों वाला शून्य जरूरी तत्वों और ऊर्जाओं से लेकर हमारे लिए जरूरी ईश्वरीय संकेतों और अनुभवों की प्राप्ति कराने वाला होता है।

एक सामान्य व्यक्ति चाहे वह विद्यार्थी हो, कामकाजी हो या फिर नौकरी-धंधे वाला, इस तरह पुनर्भरण के उपरान्त उसकी ताजगी, क्षमताओं और जीवन निर्वाह से लेकर जीवनानंद तक की सभी प्रकार की स्थितियों में अपार विस्तार और विकास दिखने लगता है।

एक विद्यार्थी को ही लें, जो कि प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं या किसी भी प्रकार की पढ़ाई की तैयारी कर रहा हो। यदि वह सामान्य ही हो, किसी भी प्रकार की ध्यानसाधना या उपासना का कोई अभ्यास नहीं करने वाला हो, उसे सौ पृष्ठ की एक पुस्तक को पढ़ने में सात से आठ घण्टे लगेंगे और याद रह पाएगा सिर्फ 5 से 10 फीसदी और वह भी आधा-अधूरा।

और यही पुस्तक किसी आध्यात्मिक पृष्ठबल वाले इंसान को पढ़ने दी जाए तो वह केवल दो घण्टे में ही पूरी पढ़ लेगा और उसे 60 से 80 फीसदी याद रहेगा। इसके अलावा उसकी अतीन्दि्रय क्षमता का विकास इतना अधिक हो जाएगा कि उसका ध्यान उन बिन्दुओं पर अधिक केन्दि्रत रहेगा जो कि परीक्षा में पूछे जाने वाले हैं।

यह अपने आप में बहुत बड़ा विज्ञान है। हम जो भी कर्म करें, उसके प्रति निष्ठा और एकाग्रता रखें और पूरी ईमानदारी से करें किन्तु  इन कर्मों को यदि और अधिक उपादेय और आशातीत सफल बनाना चाहें तो इन कर्मों से पूर्व कुछ समय अपने ईष्ट, आराध्य और भगवान के लिए निकालें, आत्म जागरण और ध्यान की अवस्था पाने के लिए निकालें ताकि हमारी आत्मिक ऊर्जाओं का विकास हो सके।

इंसान की जिन्दगी  में हर तरह से सफलता पाने का यह अपने आप में सरल, सस्ता और सुगम मार्ग है।  इस रहस्य को जानने की आवश्यकता है।