उदारतापूर्वक बाँटें ज्ञान और अनुभव

जमाने भर से जो लिया है उसे जमाने में ही पात्र लोगों तक पहुँचाने और बाँटते हुए जो विसर्जन की प्रक्रिया को पूर्ण करता रहता है वही संसार के लिए उपयोगी है और उसी की जीवन्मुक्ति संभव है, मोक्ष प्राप्ति होकर रहती है। लेकिन जो लोग संग्रह ही संग्रह करते रहते हैं, कबाड़ियों की तरह जमा ही जमा करते रहते हैं और फिर पूरी जिन्दगी इसकी चौकीदारी में लगा दिया करते हैं उनका सौ जन्मों में भी उद्धार होना संभव नहीं है।

हर ज्ञानवान, अनुभवी और हुनरमंद इंसान के जीवन का एक अहम् फर्ज यह भी है कि उसने जो कुछ भी ज्ञान पाया, सीखा और अनुभव लिया है, जो कुछ अपनी बुद्धि और प्रतिभा से नया अर्जित किया है उसके बारे में अपनी ही तरह का कम से कम एक ऎसा इंसान बनाए जिसके कर्मयोग को देख कर लोग कह सकें कि अच्छे गुरु का शिष्य है अथवा इसका उस्ताद कोई तगड़ी हस्ती ही रहा होगा। 

ज्ञान, अनुभवों और हुनर का एक से दूसरी पीढ़ी, एक से दूसरे युग तक संवहन उस हर इंसान की जिम्मेदारी है जिसमें थोड़ी-बहुत भी समझ है तथा जिसे अपने आपके आदमी होने पर गर्व है, अपनी संस्कृति और पुरखों की थाती पर गौरव का बोध है।

प्राच्यविद्याओं, ज्योतिष, तंत्र-मंत्र-यंत्र, मैली विद्याओं और वाम मार्गी साधनाओं तथा रहस्यमयी गोपनीय साधनाओं व सामुद्रिक विद्याओं के बारे में यह स्पष्ट कहा जाता है कि जो व्यक्ति अपने द्वारा अर्जित ज्ञान,  अनुभवों तथा सिद्धि प्राप्ति के रहस्यों को जानता है उसके लिए यह जरूरी है कि वह मरने से पहले कोई न कोई शिष्य तैयार करके जाए अन्यथा उसे ब्रह्मराक्षस होना पड़ता है।

जो लोग अपनी विद्याओं, ज्ञान, हुनर और अनुभवों को आने वाली पीढ़ी से बचाकर या छिपा कर रखते हैं वे लोग अपने उत्तरार्ध में सुखी नहीं रह पाते, ऎसे लोगों का वंश आगे नहीं चलता है अथवा मरने के बाद ब्रह्मराक्षस या भूत-प्रेत बनते हैं अथवा इनकी गति-मुक्ति बाधिवत हो जाती है।

जो अर्जित ज्ञान, अनुभव और सिद्धियों का हुनर किसी एक व्यक्ति तक आकर विराम पा जाता है, उस स्पीड़ ब्रेकर बने हुए इंसान को प्रकृति, काल और परमात्मा कोई भी पसंद नहीं करते हैं। यह जीवात्मा अपने आप में अभिशप्त ही रहती है।

यही कारण है कि अधिकांश ऎसे लोगों की मृत्यु आसानी से नहीं हो पाती है और बरसों तक ये खटिया पकड़े रहते हैं। इनके जीवन का अंतिम चरण जीते जी नारकीय, उपेक्षित और हीनता भरा होकर रह जाता है।

बहुत सारे लोग हैं जिनमें थोड़ा-बहुत हुनर दिखाई देता है लेकिन वे इतने अहंकारी और निष्ठुर हो जाते हैं कि सब कुछ छिपा कर रखते हैं और बर्ताव ऎसा करते हैं जैसे कि अमरफल खाकर आए हों। हवा में ऎसे उड़ते हैं कि जैसे दुबारा जमीन से कोई संपर्क ही नहीं होने वाला।

इनमें अधिकांश लोग ऎसे होते हैं जो अपने आपको ही सभी जगह स्थापित करने और अंधों में काना राजा बने रहने की तर्ज पर अपनी चवन्नियां और हर प्रकार के चमड़े या कागजों के सिक्के चलाने के लिए किसी को कुछ नहीं सिखाते।

इनके जीवन का यही लक्ष्य होता है कि जहाँ जरूरत हो वहाँ वे ही वे नज़र आएं, और कोई दूसरा दिखे ही नहीं ताकि उनकी तूती हरदम बोलती रहे और जहाँ जरूरत हो उन्हीं की पूछ हर कहीं होती रहे।

जो लोग साठ साला बाड़ों और अखाड़ों के ठेकेदार व उस्ताद बने हुए हैं उनमें भी खूब सारे ऎसे हैं जो अपने आपको जाने क्या कुछ समझ बैठे हैं। इनमें से भी काफी ऎसे हैं जो अपने हुनर से किसी दूसरे को इसलिए परिचित नहीं करवाते क्योंकि इन्हें यही भय होता है कि बाड़ों में अपना निर्धारित समय पूरा हो जाने के बाद उनकी जरूरत महसूस नहीं होगी और ऎसे में दुबारा बाड़ों में घुसपैठ करने के उनके सारे रास्ते बंद हो जाने वाले हैं।

हालांकि बहुत से उदारमना लोग हैं जो यह मानते हैं कि उन्होेंने जो कुछ सीखा-पाया है उसे अपने आस-पास वालों को भी तैयार करें ताकि उनका जीवन भी निखरे और कामकाज सरल, सहज और जल्दी हो सके।

लेकिन इनमें से कुछ लोगों की अक्सर यही शिकायत रहती है कि कई सारे लोग सीखने तक विनम्र, आज्ञाकारी और स्वामीभक्त बने रहते हैं तथा अपने आपको शिष्य होने का स्वाँग रचते भी हैं और दूसरों को जताते भी हैं कि हम अमुक के शिष्य हैं और जो कुछ सीख रहे हैं वह उन्हीं की देन है।

लेकिन सब कुछ सीख जाने के बाद या किसी स्वार्थ के सामने आ जाने पर ऎसे लोग गुरुओं और उस्तादों की ही टाँग खिंचने लगते हैं और उन्हें धकिया कर आगे बढ़ने, नीचा दिखाने आदि से संबंधित हीन हरकतें करते रहतेे हैं, और इस कारण से उदारवादी लोग भी विवश होकर अपनी उदारता को ढंक दिया करते हैं तथा सिखाने के कामों को विराम दे दिया करते हैं।

हालांकि ऎसा करने में उन्हें काफी तकलीफ भी होती है क्योंकि संवेदनशील, उदारवादी और आत्मीयता से परिपूर्ण परोपकारी दृष्टि रखने वाले लोग कभी नहीं चाहते कि वे अपने ज्ञान, अनुभव और हुनर को अपने तक रोके रखें, किसी को बताएं नहीं और बिना बताए संसार से चले जाएं।

लेकिन कुछ खुदगर्ज लोगों की नादानी, नासमझी और नालायकी के कारण अच्छे लोगों को न चाहते हुए भी विवशता ओढ़ लेनी पड़ती है। इस वजह से चंद नुगरों की नापाक हरकतों और गलतियों की वजह से जिज्ञासुओं से लेकर पूरे समुदाय और युग तक को खामियाजा भुगतना पड़ता है।

दुनिया के अधिकांश गुरुओं और विद्वजनों का अनुभवजन्य निष्कर्ष यही है कि जो लोग उनसे कुछ सीखते हैं, वे बाद में अपनी ही अपनी चलाते हैं और गुरुओं को पछाड़कर आगे बढ़ जाने में ही अपनी काबिलियम समझते हैं। और काफी मामलों में गुरुओं की असामयिक हत्या या प्रतिष्ठा हानि के लिए ऎसे तथाकथित शिष्य ही जिम्मेदार होते हैं जो कि गुरुओं के दम पर आगे बढ़ जाते हैं।

जो ज्ञान और अनुभव हैं उन्हें बाँटें, इसके बिना न हमारी गति-मुक्ति हो सकती है, न हमारी आने वाली पीढ़ियों को सुकून मिल सकता है। इस मामले में उदारतापूर्वक जगत कल्याण की भावना से पूरी उदारता से निष्कपट एवं निरपेक्ष भाव से काम करने की आवश्यकता है। इस मामले में उदारता और जगत कल्याण की दिशा-दृष्टि अपनाने की आवश्यकता है।

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