गायत्री साधना को समर्पित दिव्य साधक ः बण्डू महाराज

शैव, शाक्त और वैष्णव उपासना धाराओं के साथ ही वैदिक परम्पराओं और प्राच्यविद्याओं का गढ़ रहा राजस्थान का दक्षिणांचलीय जिला बांसवाड़ा धर्म-कर्म के क्षेत्र में पूरे भारतवर्ष में अनूठा स्थान रखता है। पुरातन काल में ऋषि-मुनियों और सिद्ध संतों की तपस्या से अनुप्राणित इस अंचल में प्राचीन काल से संत-महात्माओं और महन्तों की लम्बी श्रृंखला विद्यमान रही है।

हिन्दुस्तान का यह इलाका तंत्र-मंत्र, ज्योतिष और साधनात्मक दृष्टि से महत्वपूर्ण रहा है। यहां विभिन्न पद्धतियों के एक से बढ़कर एक साधक हुए हैं जिनकी तपस्या की बदौलत इस अंचल को धर्म धाम लोढ़ी काशी के रूप में मान्यता मिली हुई है। माही मैया की स्नेह धारा से घिरे यहां के साधना जगत में कई ऎसी हस्तियां हुई हैं जिन्होंने कठोर तप और एकनिष्ठ उपासना के बूते ईश्वरीय कृपा का साक्षात्कार किया है। यही परम्परा न्यूनाधिक रूप में आज भी चली आ रही है।

      गायत्री साधना में अग्रणी वागड़

वागड़ प्रदेश के नाम से प्रसिद्ध बांसवाड़ा क्षेत्र गायत्री साधना में भी अग्रणी रहा है। अनेक पुरश्चरण करने वाले गायत्री साधकों की बांसवाड़ा में कोई कमी नहीं रही। आस्था और पुण्य संचय परम्परा की इसी कड़ी में एक नाम है – पं. विजय कुमार त्रिवेदी, जिन्होंने दृढ़ संकल्प लिया और बांसवाड़ा शहर के पूर्वी छोर पर अवस्थित प्राचीन आस्थास्थल वनेश्वर शिवालय परिसर स्थित गायत्री मन्दिर में वर्षों तक अनवरत् तपस्या लीन रह कर सवा करोड़ गायत्री जप पुरश्चरण का अनूठा संकल्प पूरा किया है।

      जीवन भर गायत्री उपासना का संकल्प

पं. विजयकुमाBandu Maharaj Banswara (438)र त्रिवेदी का जन्म संस्कारित ब्राह्मण परिवार में श्री मधुसूदन त्रिवेदी के घर माता चन्द्रकान्ता देवी की कोख से पड़ोसी राज्य मध्यप्रदेश के बांसवाड़ा से सटे झाबुआ जिलान्तर्गत रम्भापुर में ज्येष्ठ शुक्ल प्रतिपदा परम द्वितीया 21 मई 1939 को हुआ।

शैशव के ब्राह्मण संस्कारों की वजह से संध्या और गायत्री साधना का नियम पाले हुए पं. विजय कुमार त्रिवेदी पर ईष्ट देवी की इतनी कृपा हुई कि उन्होंने ताज़िन्दगी गायत्री साधना का अखण्ड व्रत ले लिया। धुन के पक्के पं. त्रिवेदी ने अहर्निश गायत्री उपासना को ही अपने समग्र जीवन का सर्वोपरि ध्येय बना लिया है। सन् 1956 से उन्होेंने रोजाना ग्यारह माला गायत्री जप शुरू किया जो वर्षों तक अखण्ड रूप से बना रहा।दिल्ली में एलेम्बिक केमिकल तथा जनरल इंश्योरेन्स में नौकरी करने के दौरान् व्यस्तताओं के बावजूद उनकी गायत्री साधना बरकरार रही।

      वनेश्वर बना साधना केन्द्र

गायत्री साधना के लिए उन्होंने वनेश्वर शिवालय के गायत्री मन्दिर को साधना केन्द्र बनाया। इसके साथ ही उन्होंने लोक सेवा का दामन थामा। इसी लोक सेवी व्यक्तित्व को देखते हुए उन्हें वनेश्वर शिवालय परिसर मेें संचालित मानस भवन के व्यवस्थापक का दायित्व सौंपा गया। अपनी साधना के साथ ही वे मानस भवन को भी अपनी सेवाएं देते रहे हैं।

गायत्री मन्दिर के गर्भ गृह में गायत्री मैया की मूर्ति के सान्निध्य में उन्होंने 24 लाख गायत्री जप का पुरश्चरण सन् 2002 में शुरू किया। अब तक वे डेढ़ करोड़ से अधिक  गायत्री जप पूर्ण कर चुके हैं। यह कीर्तिमान ही है।      अपनी तरह के अनूठे साधक पं. विजय कुमार त्रिवेदी ने अपने लक्ष्य को पूरा करने के लिए रोजाना दस घण्टे तक गायत्री जप की साधना का नियम अपनाया और इस प्रकार लगातार अनुष्ठान करते हुए महान लक्ष्य हासिल किया।  संतुलित आहार-विहार और सादगी की प्रतिमूर्ति प. विजयकुमार त्रिवेदी साधनाकाल में पूरी तरह स्वपाकी रहे।

      पाक कला में बेमिसाल

अन्नपूर्णा की उन पर इतनी जबर्दस्त मेहरबानी है कि वे जो बनाते हैं वह स्वादिष्ट हो जाता है। पहले के सारे अनुष्ठानों में उन्होंने अन्न का पूरी तरह त्याग कर दिया था और शरीर चलाने के लिए वे रात में मामूली फलाहार व दूध जरूर लेते रहे। पर अब मामूली भोजन कर लेते हैं वह भी खुद के हाथों का बना ही। इस वर्ष के आरंभ में उन्हें देवी का स्वप्नादेश मिला। तभी उन्होेंने पुरश्चरण का फैसला ले लिया  और इस वर्ष रामनवमी से उन्होंने  गायत्री मन्दिर में ही देवी के सम्मुख 24 लाख गायत्री जप का छठा पुरश्चरण आरंभ कर दिया है।  रोजाना वे इक्यावन मालाएं जपते हैं।

गायत्री साधना की लम्बी यात्रा में उन्हें कई बार दिव्य शक्ति और दिव्य दर्शन का अनुभव हुआ। ख़ास बात यह है कि साधना से उनका शरीर आरोग्यवान बना होने के साथ ही तपस्या का ब्रह्म तेज उनके चेहरे से साफ झलकता है। इस सबको वे भगवती गायत्री की कृपा ही मानते हैं।

      माता-पिता से मिली पर््रेरणा

पं. विजय कुमार त्रिवेदी को गायत्री साधना की प्रेरणा अपने पिताश्री मधुसूदन त्रिवेदी व माताश्री चन्द्रकान्ता से मिली। वे साधना कक्ष में अपने पिता और माता की तस्वीर भी साथ रखते हैं। उनका मानना है कि इससे उन्हें प्रेरणा और आशीर्वाद का अनुभव होता है। वे कहते हैं कि पृथ्वी के सबसे समीप पितर लोक है और जब तक पितरों की कृपा नहीं होती तब तक ऊपर के लोेकों की निर्बाध यात्रा का सफर पूरा नहीं हो सकता।

      स्वप्न ने दृढ़ किया संकल्प

अपने जीवन में वैराग्य Bandu Maharaj Banswara (444)भाव की दृढ़ता और गायत्री साधना के प्रति अगाध आस्था भाव रखने के पीछे उनके जीवन का एक स्वप्न मददगार साबित हुआ। वे बताते हैं कि एक बार स्वप्न में उन्हें किसी कृत्या के दर्शन हुए जो भयानक स्वरूप के साथ उन्हें खाने के लिए सामने आयी लेकिन स्वप्न में उन्होंने पांच बार गायत्री मंत्र का उच्चारण किया इससे वह कृत्या भस्मीभूत हो गई। सवेरे उठने पर उन्हें यह स्वप्न याद रहा।

उसी दिन से उन्होंने महसूस किया कि स्वप्न में गायत्री जप से ऎसा चमत्कार हो सकता है तब गायत्री साधना को और अधिक बढ़ाया जाए तो भगवती की अपार कृपा पायी जा सकती है। तभी से उनका चित्त साधना में दृढ़ होता चला गया और उन्हें बड़े-बड़े पुरश्चरण करने में कामयाबी मिली। कभी कोई अड़चन सामने नहीं आयी। मन्दिर के गर्भ गृह में गर्मी, बरसात और सर्दी की परवाह नहीं करते हुए अनुष्ठान पूर्ण करने वाले वे विलक्षण साधक ही हैं। सवा करोड़ गायत्री जप के महान पुरश्चरण की पूर्णाहुति उन्होंने सवा लक्ष गायत्री पंचकुण्डी महायज्ञ के साथ 7 व 8 नवम्बर 2009 को की। इसी  महायज्ञ समारोह में उन्हें संतों, पण्डितों और श्रद्धालुओं के समागम ने स्वामी विजयानंद महाराज नाम दिया।

पं. महादेव शुक्ल से पाया साधना ज्ञान

पं. विजय त्रिवेदी अपनी साधना की सफलता में गायत्री मण्डल के संस्थापक व संरक्षक रहे प्राच्यविद्यामर्मज्ञ देवर्षि स्व. पं. महादेव शुक्ल को साधना-गुरु मानते हैं। वे कहते हैं कि साधना मार्ग पर सफलता का राज और सामने आने वाली बाधाओं पर विजय प्राप्ति के नुस्खे उन्हें पं. शुक्लजी से मिले और इसी का परिणाम है कि वे साधना पथ पर अडिग रहते हुए निरन्तर रमे हुए हैं। अब भी 77 वर्ष की आयु में भी वे स्वस्थ हैं, अपने सारे काम खुद कर लेते हैं तथा निरन्तर गायत्री साधना के साथ विभिन्न अनुष्ठानों के कई चरण पूरे करने का आनंद प्राप्त कर रहे हैं।  इसके अलावा रामायण और सुन्दरकाण्ड पारायण Bandu Maharaj Banswara (278)सहित विभिन्न  अनुष्ठान भी वे करते रहे हैं। अब वे अपना पूरा जीवन लोक कल्याण और सेवा में समर्पित किए हुए हैं।       दक्षिणांचल में गायत्री साधना के लिए दशकों से प्रयासरत संस्था गायत्री मण्डल ने उनकी गायत्री साधना की उपलब्धियों को देखकर ‘‘गायत्री’’ उपनाम व अलंकरण से सम्मानित किया। वहीं अनेक बार विद्वानों और धार्मिक संस्थाओं द्वारा उन्हें सम्मानित किया जा चुका है।

गायत्री के अनन्य साधक पं. विजयकुमार त्रिवेदी की दिली इच्छा है कि बांसवाड़ा में वेद व पौरोहित्य शिक्षा का महाविद्यालय स्थापित हो। उनकी अनवरत् गायत्री साधना और निष्काम अनुष्ठानों की श्रृंखला नई पीढ़ी के साधकों के लिए प्रेरणा का स्रोत भी बनी हुई है।

One comment

  1. सर महाराज जी का कोई संपर्क नंबर हो तो कृपा करके प्रदान करें साथ ने पूरा पता भी