हम सब हैं ठाले-मुफतिया जासूस

बाहर चलने वाली हवाओं और हलचलों से इंसान हमेशा प्रभावित रहा है। उसे हमेशा यह जिज्ञासा रही है कि लोग क्या कर रहे हैं, बाहर क्या हो रहा है, कौन क्या कह रहा है, क्या सुन रहा है और क्या कर सकता है, क्या हो सकता है, क्या होना चाहिए। हम सभी लोग इसी महामारी से ग्रस्त हैं।

हममें से काफी लोग मूक द्रष्टा हैं, काफी मूक-बधिरों का व्यवहार करने के आदी हो गए हैं। काफी बातूनी, बकवासी हैं, कई सारे अपने आपको भाग्यविधाता मान बैठे हैं और इसी भ्रम में जी रहे हैं कि वे ही हैं जो लोगों और क्षेत्रों की तकदीर लिख रहे हैं, खूब अपने आपको अधीश्वर होने के भ्रम में हैं, काफी हरकारों की तरह दौड़ लगाने वाले हैं, पत्तल-दोने उठाने वालों से लेकर जाजम बिछाने वाले भी हैं, मालिश करने वालों से लेकर हर आज्ञा का पालन करने वाले भी हैं।

किसम-किसम के लोगों और जमाने भर की हलचलों को जानने-समझने और प्रचारित करने का शगल अब नए अंदाज पा चुका है।  इन्हीं में अब नई किस्म और जुड़ गई है, और वह है जासूसी। जब से इंसान को लग गया है कि कमाने-खाने-पीने और मौज-मस्ती से रहने के लिए पुरुषार्थ की बजाय अधिक आनंद दूसरों की कमजोरियां तलाशने में आता है और इसमें कोई परिश्रम भी ज्यादा नहीं होता, तब से कुछ नवाचारी चलन पूरे उन्माद पर हैं।

सूचनाओं के महा विस्फोट भरे इस युग में सूचनाओं की प्राप्ति, भण्डारण, विश्लेषण और संवहन पर हर तरफ विशेष जोर दिया जा रहा है और यह वर्तमान की वैश्विक जरूरत भी है। इससे भी अधिक सूचनाओं की प्राप्ति और इससे सभी पक्षों पर चिंतन-मनन और अपने निष्कर्षों के साथ ताजा बनाकर परोसने की महामारी आज के इंसान को इतनी बुरी तरह लगी हुई है कि अधिकांश लोगों की फितरत में दूसरों के बारे में और अपने आस-पास से लेकर विश्व के कोने-कोने तक में होने वाली हलचलों, घटनाओं और चर्चाओं के बारे में जानने, इनका पोस्टमार्टम करते हुए अपने-अपने ढंग से इन्हें परोसने का शगल परवान पर है।

आज का हर इंसान रहस्यों का उद्घाटन करने में अधिक आनंदित महसूस करता है और उसे लगता है कि दुनिया में कोई ताजातरीन काम कोई है तो वह है किसी न किसी के बारे में अथवा किसी भी विषय या क्षेत्र के बारे में जानकारियों को जमा कर परोसना ही है।

इससे आत्मिक आनंद की प्राप्ति होने के साथ ही अपनी-अपनी विद्वत्ता और तीव्र कार्यशैली का भी परिचय प्राप्त होता है। यही कारण है कि आजकल हर कोई दूसरे के बारे में जानने को इतना अधिक उतावला और व्यग्र हो चुका है जितने पुराने जमाने के मशहूर जासूस भी नहीं होते थे।

आजकल अधिकतर लोग इसी फिराक में लगे रहते हैं कि दूसरों की कमजोरियों को जानें, उन्हें रिकार्ड करें और इसका जायज-नाजायज इस्तेमाल कर पाने के तमाम रास्ते खुले रखें, ताकि ‘‘यथायोग्यं तथा कुरु’’ की भावना साकार हो सके।

इसके लिए पहले के जासूसों को जितनी कठिनाई महसूस होती थी, उतनी आजकल के इन जासूस किस्म के लोगों को नहीं होती। अब कैमरे हैं, मोबाइल हैं, सीसी टीवी कैमरे हैं और दूसरे कई प्रकार के छिपे हुए कैमरों वाले पैन तथा सूक्ष्म कैमरे भी आ गए हैं जिन्हें चाहे जहाँ अदृश्य इस्तेमाल किया जा सकता है।

कई लोगों के लिए तो उनका पूरा कारोबार, कार्यालय और घर-प्रतिष्ठान आदि सब कुछ इस तरह कैमरे की हद में आ गया है कि किसी को भनक भले न लगे, मगर ये हथियार लगातार चलते रहते हैं, क्या पता कब काम आ जाएं। आजकल तो लोग बातचीत तक मोबाईल पर कैद कर लिया करते हैं।

खूब सारे लोगों का तो यह धंधा ही बना हुआ है कि लोगों पर निगाह रखो और रात-दिन कुछ न कुछ तलाशते रहो। ऎसे लोग सूअरों और गिद्धों की तरह कहीं भी मुँह मार सकने को स्वतंत्र एवं स्वच्छन्द होते हैं।  सामान्य आदमी तक की निजता अब खतरे में है। क्या पता कौन क्या कुछ कर जाए।  हालात ये हैं कि मिनटों में संचार माध्यमों से सूचनाएं और तस्वीरें अपने-अपने ठिकानों तक पहुंचा दी जाती हैं।

आदमी को अपने बारे में सोचने-समझने और सुनने की फुर्सत भले न मिले, लेकिन औरों की निजी तथा सार्वजनिक जिंदगी के बारे में जानने, उनकी गतिविधियों को कैद करने और इसका अपने-अपने हिसाब से अपनी-अपनी मानसिकता से इस्तेमाल करने का जो दौर आजकल दिख रहा है उसमें किसी की कोई निजता रही ही नहीं।

हालात ये हो गए हैं कि अधिकांश इंसान जासूस नज़र आते हैं जिनका एकमेव उद्देश्य औरों की किसी न किसी प्रकार से जासूसी करना ही रह गया है। इस जासूसी का उन्हें कोई भौतिक लाभ भले मिल जाए लेकिन जो जितना अधिक औरों के बारे में जानकारी रखता है उतना अधिक उसका मस्तिष्क और मल गंदगी से भरा होता है और उसके दिमाग तथा दिल में दूसरे ही दूसरे लोग, उनकी बातें और ढेर सारी गंदगी भरी होती है।

यह गंदगी उनके काले, अनाकर्षक, भद्दे और मलीन चेहरों से साफ तौर पर देखी जा सकती है। यही कारण है कि जो जितना अधिक मलीन होता है वह अलक्ष्मी को प्राप्त कर पाने में सफल जरूर हो सकता है मगर जीवन के सच्चे और शाश्वत आनंद से कोसों दूर हो जाता है और एक समय ऎसा आता है जब लोग उससे दूरी बनाए रखना शुरू कर देते हैं।

ऎसे लोगों का शरीर भी सडान्ध मारने लगता है और अंतिम समय तक अकेलेपन से रूबरू होना पड़ता है, और वह भी समस्याओं और अभावों के साथ, क्योंकि इनका पूरा जिस्म और दिमाग मृत्यु आने तक कूड़ा-करकट का वह धाम बन जाता है जहां से सडांध का आना स्वाभाविक ही है।

अपने आस-पास भी ऎसे खूब लोग हैं जो निकृष्ट जासूसों की तरह व्यवहार करते हैं। ऎसे लोगों की कार्यशैली और इनके भविष्य  के प्रति कल्पना करें तो साफ पता लगेगा कि हमारे आस-पास खूब सारे मोबाइल कूड़ा घर हैं जो जिन्दगी भर कूड़ा जमा करने का ही काम करते रहते हैं।

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