लक्ष्य को साधें

लोग दिन-रात भागदौड़ कर रहे हैं, जी जान से अपने-अपने लक्ष्यों और इच्छित सफलताओं को पाने मे जुटे हुए हैं, रोजमर्रा की जिन्दगी का अधिकांश समय इसी में लगा रहे हैं, खूब परिश्रम भी कर रहे हैं, बावजूद इसके सफलता इनसे दूर से दूर होती चली जा रही है।

यह हम सभी लोगों का अनुभव है। जमाने भर में लोग हमेशा व्यस्त रहते दिख जाते हैं, कोई कुछ कर रहा है, कोई दूसरा कुछ। सारे के सारे इस दौड़भाग भरी जिन्दगी में कुछ न कुछ कर ही रहे हैं।

इसके साथ ही पैसे भी खर्च हो रहे हैं, परिश्रम भी लग रहा है और समय भी जाया हो ही रहा है। इतना सब कुछ होने के बावजूद अधिकांश लोगों के पल्ले असफलता ही हाथ लगती है। इस वजह से लोगों में हताशा, निराशा और तनावों का साया पनप रहा है।

ये लोग अवसादों में जीने को विवश होते जा रहे हैं। बहुत बड़ी संख्या में लोग ऎसे हैं जिनकी जिन्दगी से आनंद और आशाएँ छीन गई हैंं और पूरा जीवन लगता है कि जैसे नारकीय ही हो रहा है।

कोई नहीं है संतुष्ट

बात किसी भी आयु वर्ग की हो, बच्चों से लेकर किशोर, युवा, प्रौढ़ और बुजुर्गों सभी की यही हालत देखी जा सकती है। कोई संतुष्ट नहीं है। कर्महीन भी असंतुष्ट हैं और कर्म, अभ्यास, स्वाध्याय और साधना में रोजाना घण्टों गुजार देने वाले भी।

लाख परिश्रम के बावजूद लक्ष्य प्राप्ति में विफलता तथा सोचे गए कामों में फिसड्डी हो जाने का मूल कारण सब लोग अपने-अपने ढंग से तलाशते हैं। अपने यहाँ मूल्यांकन करने और राय देने वालों की किसी भी युग में कोई कमी नहीं रही।

वर्तमान युग में तो इनकी सब स्थानों पर जबर्दस्त भरमार ही है। सब लोग अपनी-अपनी सुविधाओं और प्रतिष्ठा बचाए रखने के लिए हजार कारण गिनाते रहते हैं। लेकिन थोड़ा गंभीर होकर सोचा जाए तो साफ-साफ सामने आएगा कि हमारी असफलता का मूल कारण एकाग्रहीनता है। 

जिस  पढ़ाई-लिखाई से लेकर दुनिया भर के जिन कामों को पूरी एकाग्रता एवं तल्लीनता से किया जाता है उन कामों में पूर्ण सफलता पाने से हमें कोई रोक नहीं सकता। आजकल हमारे सभी प्रकार के कर्मों में समयबद्धता और गुणवत्ता के अभाव का यही सबसे बड़ा और एकमेव मूल कारण है।

काम बिगाडू होते हैं बहुधंधी घुसपैठिये

दुनिया में दो तरह के लोगों पर कभी भरोसा नहीं किया जाना चाहिए। उनमें एक वे लोग हैं जो दुनिया में कोई सा क्षेत्र या विषय हो, कोई सा कार्यक्रम हो, उसमें घुपैठ कर लिया करते हैं और बहुत सारे कामों और धंधों को एक साथ करने की आदत पाल लेते हैं।

ये बहुधंधी लोग किसी के सगे नहीं होते। इनके बारे में यह साफ तौर पर कहा जा सकता है कि मौका देखकर ये किसी भी समय पाला बदल सकते हैं। ये हर प्रकार की प्रवृत्ति में अपने आपको आगे रखने की कोशिश में सौंपे गए कर्म भुला बैठते हैं।

चकाचौंध और संसारी मायाओं में जकड़े हुए इन लोगों को सिर्फ सभी जगह घुस जाने और मुँह दिखाते रहने की बुरी आदत पड़ जाती है इसलिए वे अपने कर्म की बजाय जमाने भर के कर्मों में रुचि रखते हैं।  और इसलिए किसी एक का भी कोई सा काम ईमानदारी व मनोयोग से नहीं कर पाते।

भटकते रहते हैं मोबाइल घूस्सू

इसी प्रकार की एक और किस्म है उन लोगों की जो हर काम को करते वक्त, यहाँ तक कि पढ़ाई-लिखाई, पूजा-पाठ, घरेलू और व्यवसायिक कामकाज, नौकरी करते हुए तथा वाहन संचालन, परिभ्रमण आदि सभी स्थितियों में मोबाइल से बातें करने, गाने सुनने, मैसेजिंग तथा अन्य कामों में व्यस्त रहा करते हैं। बहुत सारे वाहनचालकों से लेकर निरन्तर कर्मरत लोग भी कुछ न कुछ चलाते ही रहते हैं।

इस कारण से उनका पूरा ध्यान अपने काम पर केन्दि्रत नहीं हो पाता। हालांकि इन लोगों से पूछें तो कहेंगे कि इससे उनका ध्यान बना रहता है, मगर हकीकत में यह सब कुछ मिथ्या ही होता है।

इन लोगों को न अपने कर्मयोग में गुणवत्ता से सरोकार है, न समय पर काम करने का इरादा होता है और न ही इससे उत्पन्न होने वाले फल से कोई मतलब है। ये लोग अपने हर कर्म को टाईमपास एवं भार उतारने से अधिक नहीं लेते।

बेकार है इनकी जिन्दगी

यही कारण है कि हर कर्मक्षेत्र में अब समय और गुणात्मकता के साथ ही उपयोगिता का संकट पैदा होने लगा है। सर्वाधिक खराब हालत बच्चों, किशोरों और युवाओं की है जो मोबाइल, टीवी और दूसरे मनोरंजन संसाधनों का नशा इस कदर पाल चुके हैं कि उन्हें लगता है कि जैसे जिसके लिए वे पैदा हुए हैं वह सब कुछ अब उनकी मुट्ठी में आ चुका है। इसलिए अब जीवन का कोई लक्ष्य रहा ही नहीं।

हाथ में आता है बाबाजी का ठूल्लू

हालात सब जगह एक जैसे ही हैं। सारे के सारे लोग एकाग्रता को भुलाकर बहुधंधी और चंचल हो गए हैं। यही हमारी असफलता का सबसे बड़ा कारण है। हालांकि आरंभिक दिनों में लोग इस स्थिति को गंभीरता से नहीं लेते लेकिन समय निकल जाने के उपरान्त उन्हें अक्ल आ ही जाती है लेकिन वह किस काम की। सब कुछ दाँव पर लगा देने के बावजूद हाथ में आता है बाबाजी का ठूल्लू।

तबाह कर देगा यह यांत्रिक जीवन

जो पके हुए या जाने की तैयारी में हैं, अपना नम्बर आने की प्रतीक्षा कर रहे हैं, उन लोगों को छोड़कर शेष सभी बच्चों, किशोरों और युवाओं को चाहिए कि वे अपना भविष्य सँवारना चाहें तो संयम को अपनाएं, ज्ञान और विवेक का इस्तेमाल करें, समय के महत्व को पहचानें तथा जीवन के लक्ष्यों के प्रति एकाग्र होकर अभ्यास करें अन्यथा ये भोग-विलासी और टाईमपास उपकरण ही उनके लिए घातक अस्त्र सिद्ध होकर जीवन तबाह कर डालेंगे।

1 thought on “लक्ष्य को साधें

  1. इंसान को नाकारा और आवारा बनाती है लक्ष्यहीनता ..

    जिनके पास अपना कोई लक्ष्य नहीं है। जिन्हें यह तक पता नहीं है कि हमारे पैदा होने और जिन्दा रहने का उद्देश्य क्या है, हम कौन हैं और किसलिए शरीर का बोझ ढो रहे हैं। कुटुम्ब, समुदाय, परिवेश और देश के प्रति अपने क्या फर्ज हैं। उन लोगों के जिन्दा रहने का कोई औचित्य नहीं है।
    आवाराओं की तरह भटकते और हर जगह मुँह मारते, कान धरने वाले ये लोग धरती पर वह नकारात्मक और संक्रामक बोझ है जिसके बारे में कहा जाता है कि जब तक ये नहीं मरेंगे, तब तक धरती माता को इनका अनचाहा बोझ झेलना ही है।
    हम सभी को चाहिए कि टाईमपास और आवारा कुत्तों की तरह जिन्दगी जीने का शौक समाप्त कर अपने-अपने लक्ष्य का निर्धारण करें और ऊपर जाने से पहले ऎसा कुछ कर जाएं कि विधाता और संसार के लोगों को कुछ देकर जाने की स्थिति में रहें।

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