अहसान मानें इनका

कुछ लोग अच्छे कामों के सहारे आगे बढ़ते हैं, अपनी प्रतिभाओं और व्यक्तित्व के दम-खम पर दुनिया में नाम रोशन करने में कामयाब हो जाते हैं और अपनी अन्यतम और यादगार पहचान कायम करते हुए औरों के लिए मिसाल सिद्ध होते हैं जबकि इनसे इतर बहुत बड़ी संख्या में लोग अपनी मूर्खता, अज्ञानता, प्रतिभाहीनता और अवगुणों को छिपाने के लिए नकारात्मक रास्तों का सहारा लेते रहते हैं।

ये लोग अपने सडान्ध भरे दिमाग और मैले मन का पूरा-पूरा प्रभाव दिखाते हुए अपने अस्तित्व को सिद्ध करने और दूसरों के मुकाबले अपनी खास पहचान साबित करने के लिए तमाम प्रकार के हथकण्डों, स्टन्ट, पब्लिसिटी फण्डे, षड़यंत्रों और दूसरों की बेवजह शिकायतों में रमे रहते हैं और यह मानते हैं कि लोगों को भयभीत करते हुए सब कुछ पाया जा सकता है बिना किसी मेहनत के।

एक तीसरी प्रकार के लोग होते हैं जिन्हें किसी से कोई सरोकार नहीं रहता, अपने हाल में मस्त रहा करते हैं। इनमें से कुछ फीसदी तो ऎसे उदासीन होते हैं कि बाहरी उत्तेेजना या स्वार्थ – परमार्थ जैसी कोई बात उन्हें जगा नहीं सकती।

इंसान के हर कर्म के बारे में लोगों के पास खरा और सटीक पैमाना होता है और वे अच्छी तरह जानते हैं कि कौन कैसा है। यह भी नहीं है कि दुनिया मेंं अच्छे लोग नहीं हैं। हर जगह अच्छे और सच्चे लोगों की बहुत बड़ी संख्या आज भी है।

धरती ईमानदारी, कर्तव्यनिष्ठा और सच्चाई के बीज अभी बचाकर रखे हुए है। हमारे कर्मों का लेखा-जोखा सब रखते हैं और हम जिस क्षेत्र में रहते हैं अथवा जिनके आस-पास रहा करते हैं, वे भी अच्छी तरह जानते हैं, ऊपर से कह नहीं पाएं, यह संभव है।

अच्छे, सच्चे और ईमानदार लोगों की कद्र करने वाले लोग सैकड़ों, हजारों और लाखों में होते हैं और ये दिल से हमें चाहते भी हैं। लेकिन उनकी अभिव्यक्ति मुखर नहीं होती इसलिए हमें अपने कद्रदानों का अन्दाजा लग नहीं पाता।

इसे दुर्भाग्य कहें या मूर्खता कि हम उन 4-5 लोगों की बातों से व्यथित हो जाते हैं जिन लोगों की अपनी कोई प्रतिष्ठा नहीं होती, न कोई काम-धंधा कर सकते हैं। अच्छे लोगों की बुराई करने वालों में एक भी अच्छा इंसान नहीं होता बल्कि अच्छे, सच्चे, कत्र्तव्यनिष्ठ और ईमानदार लोगों की बुराई करने वाले वे ही लोग होंगे जो निकम्मे, चोर-बेईमान, मुफ्तखोर, टाईमपास, भ्रष्ट, ब्लेकमेलर, मुफतिया माल उड़ाने में विश्वास रखने वाले, खुराफाती दिमाग, पामर और मलीन होंगे।

और ऎसे दो-चार सभी जगह होंगे, जिनके बारे में सभी अच्छों और समझदार लोगों की यही टिप्पणी होती है कि ये अच्छे लोगों को तंग करने के लिए ही पैदा हुए हैं, नकारात्मक कामों, शिकायतों और इधर-उधर की करते हुए अपने लिए किसी न किसी की जुगाड़ में लगे रहते हैं तथा अपने जैसे दूसरे नंगे-भूखे उन्मादी नुगरों को साथ लेकर छापामार गौरिल्लों की तरह जहाँ-तहाँ घुसपैठ कर माल उड़ाया करते हैं।

बहुत से लोगों के बारे में कहा जाता है कि ये सवेरे उठते ही सबसे पहले अपने लिए मुफ्त में चाय-नाश्ते, लंच-डीनर और रात को पीने-पिलाने के लिए मुर्गों और गुर्गों की तलाशी योजना का खाका खींच लिया करते हैं।

इन लोगों को घर के लोग, घर का खाना, घर वाली और घर-परिवार के संबंधी रास नहीं आते बल्कि आवाराओं की तरह दूसरों की थालियाँ अच्छी लगती हैं और इन थालियों मेंं छेद करने में इन्हें अनिर्वचनीय आनंद और सुकून की प्राप्ति होती है।

लगभग सभी प्रकार के रचनात्मक कर्मयोगियों और अच्छे लोगों की सबसे बड़ी शिकायत यही रहती है कि हर जगह कुछ न कुछ नुगरे विद्यमान हैं जो अपनी पूरी जिन्दगी औरों के लिए सरदर्द बने रहते हैं।

प्रकृति और परमात्मा ने शुचिता और पवित्रता के  लिए बड़ी ही अच्छी व्यवस्था कर रखी है। यदि चील-कौअे, गिद्ध, सूअर, कुत्ते, बैक्टीरिया और दूसरे प्रदूषणभक्षी जीव एवं कीट-कीटादि आदि न होते तो पृथ्वी पर गंदगी की स्थिति क्या होती, इसकी कल्पना भी रौंगटे खड़े कर देती है।

इसी प्रकार संसार में सभी जगह ऎसे लोग हैं जो अच्छे और सच्चे लोगोंं की निन्दा करते हुए उनके पाप अपने सर पर ओढ़ कर अपने खाते में दर्ज करा लेते हैं और अच्छे लोगों को पापमुक्त कर दिया करते हैं।

इस बारे में एक सिद्धान्त को समझ लेना जरूरी है कि किसी गलत काम या गलत आदमी को गलत कहा जाए तो वह आलोचना है और ऎसा करना सभी के हित में है। लेकिन किसी अच्छे इंसान को गलत कहा जाए तो वह निन्दा की श्रेणी में आता है और पर-निन्दा करना सबसे बड़ा पाप है।

हमारे पुराने जन्मों तथा वर्तमान जन्मों के पापों का खात्मा करना हो यानि की इन पापों से हमेशा के लिए मुक्ति पानी हो तो यह काम हम कई जन्मों में भी पूरे नहीं कर पाएंगे। ऊपर से इस बात की भी कोई गारन्टी नहीं है कि आने वाले जन्मों में हम मनुष्य ही बने रहेंगे।

इस स्थिति में हमारे सभी प्रकार के पापों का शमन होना असंभव है यदि हमारी निन्दा करने वाले सहजता से उपलब्ध न हों। इन निन्दकों का ही कमाल है कि ये हमसे बिना कुछ शुल्क लिए हमारे सारे पापों की गठरी अपने सर पर ले लेते हैं।

जितने अधिक निन्दक होंगे, उतनी अधिक हमारी निन्दा करते रहेंगे और इससे हमारे पापों का खात्मा जल्दी-जल्दी होने लगेगा। अपने पापों से मुक्ति का इससे बेहतर और सरल और कोई मार्ग नहीं है। निन्दकों द्वारा की जाने वाली निन्दा के प्रति बेपरवाह रहें, उन्हें काम करने दें, इसमें विरोध या प्रतिक्रिया न करें अन्यथा नवीन प्रारब्ध का निर्माण संभव है।

हजार बुरे लोग मिलकर भी यदि किसी अच्छे इंसान की निन्दा करते हैं तब भी कोई असर नहीं पड़ता। प्रयास यह करना चाहिए कि बुरे लोग हमारी तारीफ न करें तथा अच्छे लोगों के मन में हमारे प्रति दुर्भावना न आने पाए।

अपनी तरक्की को गति देना चाहें, जीवन को बेमिसाल बनाने की इच्छा हो तो निन्दकों के प्रति उदासीन बने रहें। हमारी तरक्की में निन्दकों के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता। वे न होते तो हम इतने आगे नहीं बढ़ पाते।

इसलिए इस परम सत्य को आत्मसात कर लें कि दुर्जनों, निन्दकों, नकारात्मक लोगों, नुगरों तथा बात-बात में बेवजह कुतर्क व विरोध करने वालों का होना हमारे लिए बहुत जरूरी है क्योंकि ये न होते तो हमारे अब तक के कई जन्मों से संचित होते रहे पापों को झेलने वाला कौन होता।

बुरे और निन्दक लोगों द्वारा हमारी जितनी निन्दा होगी, उतना हमारा आभामण्डल शुभ्र और तेजस्वी होता जाएगा। अहसान मानें उन लोगों का, जो हमारी बेवजह निन्दा करते हैं और हमारे लिए अनचाहे ही अप्रत्यक्ष रूप से हमारे सारे पाप अपने माथे लेकर सहयोगी की भूमिका का निर्वाह करते हैं।

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