कुत्तों को पछाड़ रहे हैं तलवे चाटने वाले

जो असली और सौ फीसदी खरा है उसका जीवन संघर्षों भरा होगा ही। इनके सामने पग-पग पर चुनौतियों के पहाड़ खड़े हुए नज़र आएंगे ही। कारण स्पष्ट है कि जो वास्तविक है वह इसीलिए खरा और परखा हुआ है क्योंकि वह पूर्णतया मौलिक है। फिर चाहे वह सोना हो या आदमी या फिर दुनिया का कोई सा तत्व।

पंच तत्वों से लेकर सब कुछ तभी तक शुद्ध बने रहते हैं जब तक उनमें किसी भी प्रकार की मिलावट न हो। जैसे ही किसी भी मात्रा में आंशिक मिलावट भी हो गई, तब समझ लो कि उसका मूल प्रभाव और तासीर नष्ट हो गई और वह खरा न होकर मिलावटी ही कहा जाएगा, मिलावटियों जैसा ही व्यवहार करेगा और अन्त तक वह मिलावटी ही रहेगा।

बात हवा, पानी, पृथ्वी, आसमान और अग्नि की हो या फिर किसी भी स्थल की आबोहवा की। सब तभी तक स्वीकार्य और श्रेष्ठ होते हैं जब तक वे शुद्ध हैं। जहाँ इनमें किसी भी प्रकार की मिलावट हो जाती है, प्रदूषण का खतरा पैदा हो जाता है और इन्हें किसी के लिए भी ठीक नहीं कहा जा सकता।

ये जहाँ विद्यमान होते हैं वहाँ का कबाड़ा कर डालते हैं और स्वास्थ्य, सौंदर्य एवं सुन्दरता से लेकर सब कुछ लील लिया करते हैं। आजकल पूरी दुनिया तरह-तरह के घातक प्रदूषणों और मारक तत्वों से त्रस्त है और इससे जड़ और जीवन्त सब कुछ तबाह होता जा  रहा है।

यही स्थिति इंसानों की है। जहाँ-जहाँ इंसान के भीतर मौलिक इंसानी गुण विद्यमान हैं वहाँ ताजगी और सुकून पसरा-बिखरा पड़ा है लेकिन जहाँ इंसान बिगड़ गया, वहाँ सब कुछ तबाह होता जा रहा है।

संसार के कई भूभागों में इंसान इसी वजह से हैवान होता जा रहा है, मारकाट, आतंक और हिंसा का बोलबाला है, भ्रष्टाचार और अनियमितताओं ने कई मुल्कों की अस्मिता को खतरे में डाल रखा है, मूर्खों, महामूर्खों और वज्रमूर्खों की जाने कितनी ही नस्लें उन जगहों पर काबिज हैं जिन्हें प्रभावशाली और निर्णायक कहा जाता है।

पूरी दुनिया साफ-साफ दो भागों में विभक्त होती दिखाई दे रही है। एक तरफ इंसानियत खोकर शैतानी रंग-रूपों में तरह-तरह के आसुरी भावों में पारंगत लोगों का जमावड़ा बढ़ता जा रहा है वहीं दूसरी ओर इंसानों की वह किस्म है जिसके लिए दुनिया के तमाम वैभव, स्वार्थ और प्रतिष्ठा की बजाय इंसानियत का बड़ा महत्व है।

हालांकि इस किस्म की जनसंख्या घटती जा रही है, लेकिन अभी बीज बाकी है। जिनका बीज ही गड़बड़ है, वर्णसंकरता हावी है और जो अपने स्वार्थ के लिए पशुता और पैशाचिकता को अंगीकार कर चुके हैं उन लोगों के लिए दुनिया में कहीं कोई संघर्ष नहीं है।

जो लोग नंगे होकर नदी उतर चुके हैं, बेशर्म होकर रोड शो कर रहे हैं, उन लोगों के लिए कोई शर्म बची ही नहीं है इसलिए ये लोग मर्यादाओं, संस्कारों और आदर्शों के पालन की परिधि में आते ही नहीं।

ये पूरी तरह उन्मुक्त होकर वह सब कुछ कर रहे हैं जो इंसानी खेमों में वर्जित कहा गया है। जो एक बार पटरी से उतर चुका है, फिर वह किसी भी पटरी, पगडण्डी और सड़क से होकर या इन्हें पार करके कहीं भी जाने को स्वच्छन्द है।

उसे न किसी की फिकर है, न शर्म। ऎसे लोगों की बेशर्मी को लोक मान्यता प्राप्त हो जाती है इसलिए इन्हें कोई रोकता-टोकता भी नहीं। फिर किसी न किसी लोभ-लालच और भोग-विलास में लार टपकाती और लपलपाती जीभ लिए हुए ये लोग किसी भी भीड़ में शामिल हो जाते हैं, किसी भी बड़े आदमी को भरमाते हुए उसके पीछे-पीछे कहीं भी हो आते हैं।

जो एक बार संस्कारहीन होकर व्यक्तिपूजा, चापलुसी और मुफतिया भोग-विलास की झूठन का स्वाद पा लेता है, वह श्वानों की तरह सूंघते हुए कहीं भी चले जाने और किसी भी बाड़े में घुसपैठ कर मनचाही और मनमानी करने को स्वतंत्र हो जाता है।

वृहन्नलाओं, भीखमंगों और बेशर्मों की तरह नाच-गान और चम्पी करने वालों के लिए पूरी दुनिया एक बाड़ा हो जाता है। जहाँ चाहो वहाँ घुस जाओ और मौज-उड़ाओ, कोई पूछने वाला नहीं।

सब एक जैसे ही हैं, कोई बड़ा, महान और प्रतिष्ठित माना जाता है और दूसरे उसके पिछलग्गू और फोलोवर। इन सभी के लिए जीवन इतना अधिक आसान होता है कि कुछ कहा नहीं जा सकता।

कुत्तों, पागलों, वृहन्नलाओं, तलवे चाटने वाले दासों और भीखमंगों के लिए कहीं कोई संकट नहीं है। न कमाने-धमाने का, न और कुछ। असली संघर्ष तो उन लोगों के भाग्य में ही बदा हुआ है जो असली इंसान है।

जो लोग स्वाभिमानी, ईमानदार, कर्मनिष्ठ, पुरुषार्थी, सम्मान से जीने वाले और संस्कारी हैं उन लोगों को ही अपने वजूद के लिए संघर्ष करने की आवश्यकता है क्योंकि इनकी जिन्दगी इंसानी उसूलों की पटरी पर चलती है और इस पटरी पर चलने के लिए माद्दा होना जरूरी है।

इस पर वही चल सकता है जिसका बीज सौ फीसदी शुद्ध हो, वंश-परिवार और समाज के संस्कार हों, औरों के पीछे-पीछे चलने की बजाय खुद के परिश्रम के बल पर जीवन निर्वाह का ध्येय हो। और ऎसा इंसान न अपना सम्मान खो सकता है, न स्वाभिमान त्याग कर सकता है।

और इस वजह से सभी प्रकार के नालायकों, नुगरों और परजीवियों से ढेरों प्रकार की चुनौतियों का मिलना स्वाभाविक है। असली और खरे तत्वों से लेकर आदमियों तक की जिन्दगी में तपना लिखा है और इससे ही व्यक्तित्व सोने की तरह निखरता है।

इसलिए सज्जनों और सच्चे स्वाभिमानी लोगों को चाहिए कि वे आसन्न चुनौतियों के प्रति हर क्षण तैयार रहें और इंसानियत पर डटे रहें। हमारे इसी दृढ़ निश्चय और संघर्ष को देखते हुए पूर्वज और दुनिया के लोग प्रसन्नता का अनुभव करते हुए हमें अक्षय कीर्ति प्रदान करते हैं।

तलवे चाटने वालों से न घबराएँ क्योंकि ये हमेशा औंधे मुँह रहकर नीचे ही देख सकते हैं। इंसानों से नज़रें मिलाने का साहस इनमें कभी नहीं आ सकता। मौत के बाद भी नहीं।