सुरमा ने दिया सुनहरा भविष्य

लगातार व्यवसायिक प्रतिस्पर्धा के दौर में आजीविका का जुगाड़ करना कितना मुश्किलों भरा है इसे समझना आसान है लेकिन बांसवाड़ा में एक शख़्स ऎसा है जिसने आँखों में सुरमा लगाने का हुनर अपनाया और इसे अपनी आजीविका का साधन बनाने के साथ ही लोकप्रियता भी हासिल की। हालांकि वर्तमान युग में सुरमे का प्रचलन करीब-करीब खत्म सा ही हो गया है किन्तु यह सुरमा आँखों को इतनी ताजगी देता है कि लोग सुरमे वाले सरदारजी की प्रतीक्षा करते हैं।

बांसवाड़ा शहर के सूरजपोल क्षेत्र में रहने वाले सरदार भगतसिंह की अपनी कोई दुकान नहीं है बल्कि ये अटैची में सजी अपनी मोबाईल दुकान के साथ कहीं भी दीख जाते हैं। लोगों की प्यार-मुहब्बत इतनी कि रोक कर इनके हाथों अपनी आँखों में सुरमा लगाकर खुश होते हैं व 2-5-10 रुपए जो भी हो, इन्हें नज़र करते हैं। भगतसिंह सन् 1986 में वैद्य का काम करने वाले अपने ससुर सरदार करतार सिंह के साथ बांसवाड़ा आए और यहीं के होकर रह गए। तभी से भगतसिंह ने जीविकोपार्जन के लिए आँखों में सुरमा लगाने का हुनर आजमाया। यह काम उनकी जिन्दगी का सहारा बनता चला गया और आज इसके सहारे उनकी गृहस्थी की

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गाड़ी चल रही है। इस हुनर ने भगतसिंह को लोकप्रियता भी दी। आज वे जहाँ भी जाते हैं सुरमा लगवाने वालों का तांता बंध जाता है।

मूलतः उत्तर प्रदेश के बिजनौर निवासी भगतसिंह के परिवार में पत्नी व 3 बच्चियां हैं। अपने एक मात्र पुत्र की कई साल पहले हुई मौत के बाद उनका भविष्य का सहारा भी छीन गया। इसके बावजूद पूरे हौसले के साथ अपने परिवार को चला रहे भगतसिंह का मानना है कि ऊपरवाला सब ठीक ही करेगा। सुरमे के साथ ही वे नेम प्लेट बनाने का काम भी करते हैं। उनके नयन ज्योति सुरमे के कद्रदानों की संख्या में हर साल इज़ाफा हो रहा है। यह सुरमा श्वेत व श्याम दोनों रंगों का है। भगतसिंह बताते हैं कि इससे आँखों की गरमी, जाली, लाली, धुंधलापन, रतौंधी आदि से राहत मिलती है। खासकर हिसाब-किताब व लिखने-पढ़ने वालों के लिए यह राहत भरा है। इसे लगवाने वालों में हर आयु वर्ग के लोग शामिल हैं। काफी संख्या में महिलाएं भी इनके हाथों सुरमा लगवाकर सुकून पाती रही हैं।

भगतसिंह न सिर्फ बांसवाड़ा शहर में सार्वजनिक स्थलों बल्कि जिले के कस्बों व गाँवों तक भी सफर करते हैं। गांवों में भी सुरमे के कद्रदानों की संख्या कम नहीं है। सुरमा लगाने के लिए वे सभी के लिए अलग-अलग सलाई लेते हैं। अफसरों से लेकर कर्मचारी, दुकानदारों से लेकर ठेले वाले तक इस सुरमे की तासीर समझते हैं।

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वे अपने हाथ से सुरमा आँजने के साथ ही सुरमे की शीशियां भी बेचते हैं। कई नाई इनसे सुरमा लेकर अपने ग्राहकों को खुश करते हैं। भगतसिंह बताते हैं कि उनके सुरमे में 32 तरह की आयुर्वेदिक जड़ी बूटियों का मिश्रण है जो आँखों के लिए हर दृष्टि से फायदेमंद है।

वे हजारों लोगों को सुरमा लगा चुके हैं पर इतने वर्षों में किसी की कोई शिकायत नहीं आयी बल्कि जो एक बार सुरमा लगवा देता है वह स्थायी कद्रदान तो बनता ही है, दूसरों को भी स्वैच्छिक रूप से प्रेरित करता है। यह सुरमा वे सहारनपुर, दिल्ली, अमृतसर आदि स्थानों से मंगवाते हैं। भगतसिंह का सूरमा उनकी जिन्दगी का सहारा बन चुका है जिसके जरिये उनका परिवार पल रहा है।