जो कुछ है वह औरों के लिए

समाज की हर इकाई दूसरी इकाइयों को मदद देने के लिए है और इस परस्पर सहकार, समन्वय और सामंजस्य भरी श्रृंखलाओं की पुष्टि से ही सामुदायिक तरक्की की धाराएं वेगवती होती हैं। संसार में द्रव्य, संसाधनों तथा स्थलों और क्षेत्रों आदि का न्यूनाधिक प्रभाव हर युग में परिलक्षित होता है।

हम जहाँ रहते हैं अथवा जहाँ हमारा अवतरण हुआ है वहाँ रहने वाले लोगों तथा उन क्षेत्रों के प्रति हमारी जिम्मेदारी है कि उन्हें हमारे होने का लाभ किस प्रकार पहुँचे, किस प्रकार हम हमारे क्षेत्र या अपने क्षेत्र के लोगों की जरूरतों को पूरा करने में भागीदारी निभा सकते हैं, यह सोचना हर समझदार का कत्र्तव्य है और जो इस बात को मानता और इसके अनुरूप आचरण करता है वही वास्तव में मनुष्य है।

जो लोग सिर्फ अपने में ही सिमटे हुए हैं और उन्हें न क्षेत्र की परवाह है, न अपने आस-पास की, और न दूसरों की, इस तरह के सभी लोग मनुष्य न होकर मनुष्य शरीरी मात्र हैं।

भारतीय संस्कृति एवं परम्पराओं में सृष्टि के हर कारक के प्रति संवेदनशील होने को सर्वोपरि महत्त्व दिया गया है और परिवेश में कहीं भी कोई हलचल होती तो इसका सीधा प्रभाव वहाँ रहने वाले प्रत्येक मनुष्य पर पड़ता था और हृदय से लेकर शरीर तक इसकी तीव्र अनुभूति होती थी।

ऎसे में कहीं भी कोई समस्या या मांग सामने आती तब इसका समाधान सभी के सहयोग से अपने आप हो जाता था। इसीलिये उन दिनों वृद्धाश्रम या अन्न क्षेत्र जैसे शर्मनाक शब्द नहीं सुने जाते थे।

कालान्तर में मानवीय संवेदनाओं का निरन्तर क्षरण होते रहने से परिवेश और पड़ोस के प्रति हमारी संवेदनाएं समाप्त होती गई और आज लगता है हमारी वो सारी संवेदनाएं मर चुकी हैं जिनके बूते हमें मनुष्य होने का अभिमान था।

आज हमें न अपने मानव होने पर गौरव या गर्व है, न हम मानवीय सभ्यताओं का पूरा पालन ही कर पा रहे हैं। अंधे स्वार्थ की दौड़ ने हमें इंसान से यंत्र बना डाला है। हमारी मानसिक स्थिति और स्वार्थ पूर्ति के उपायों को देखें तो लगता है कि हम पशुओं से भी गए बीते हो गए हैं क्योंकि पशुओं में भी अपने क्षेत्र और बँधु-बाँधवों के प्रति संवेदनशीलता का भाव अवश्य देखा जाता है।

आज पशुओं जैसी संवेदना भी हम लोगों में नहीं रही। कहीं हम पैसा कमाने की मशीन के रूप में काम आ रहे हैं,  कहीं धन-दौलत का भण्डारण कर इसकी सुरक्षा के लिए दिन-रात लगे हुए हैं, कहीं सारे संसार को अपना बनाने के लिए ऎसे-ऎसे षड़यंत्रों में रमे हुए हैं कि जिनसे हमारे पितर और माँ का दूध भी लजाने लगता है।

जमीन-जायदाद बनाने के लिए सारे नाजायज हथकण्डों को अपनाने वाले कितने लोग अपने आपको सुखी मानते हैं और कितने लोग अपने द्वारा अर्जित सम्पदा का अपने लिए उपयोग कर रहे हैं, इसका विश्लेषण किया जाए तो निन्यानवें फीसदी लोग ऎसे सामने आएंगे जो न खा-पी सकते हैं, न आसानी से सो पाते हैंं।

फिर ऎसा वैभव किस काम का, जिसके आते ही आदमी का सुख-चैन और आनंद खो जाए और वह सिर्फ मशीन मात्र होकर रह जाए,  जिसका लाभ खुद की बजाय दूसरे लोग उठाएं, और वह भी बिना किसी मेहनत के।

अपने आस-पास जो लोग जरूरतमन्द हैं उनके प्रति मैत्री, करुणा और दया का भाव रखते हुए उनकी जरूरतों को पूरी करने में मददगार बनना ही मनुष्य का प्राथमिक फर्ज है और इसी से वास्तविक आनंद और आत्मतोष प्राप्त हो सकता है। इसके सिवा और कोई रास्ता है ही नहीं, जिसके अवलंबन से आनन्ददायी नींद प्राप्त हो सके।

अपने आस-पास या क्षेत्र में जरूरतमन्दों के प्रति संवेदनशीलता न हों तथा अपने इलाके के लोगों या मूक पशुओं को कष्टों में देखकर मुस्कुराते रहें, ऎसे लोग खुद कभी सुखी नहीं रह पाते। जिनकी आँखों के सामने पेड़-पौधें पानी के बिना सूख कर मरते चले जाएं, परिवेशीय सरसता का खात्मा होता चला जाए।

जो परिवेश के प्रति संवेदनशील है उसी पर ईश्वर भी प्रसन्न रहा करता है।  धन की गतियों में उपयोग एवं दान को महत्त्व दिया गया है और ऎसा नहीं होने पर यह चोरी-डकैती या लूट में चला जाता है अथवा नष्ट हो जाता है।

आजकल धन-दौलत का संग्रह करना भी मुश्किलों से भरा होकर रह गया है तथा निरन्तर अपराधों का बोलबाला बढ़ता जा रहा है। सिर्फ धन पाने मात्र की इच्छा से सर्वाधिक अपराध हो रहे हैं।

हरामखोरों और निर्वीर्य लोगों की इतनी बड़ी खेप पैदा हो चुकी है जिसका एकमेव उद्देश्य दूसरों का धन हड़पना ही रह गया है, चाहे इसके लिए उन्हें कितने ही अपराध क्यों न करने पड़े। ये लूटेरे कई सारे भैंसों में हमारे सामने हैं।

फिर जहाँ धन होता है वहाँ सब कुछ सायास छिपाया भी जा सकता है। अपने यहाँ अपराधियों और लुटेरों की लगातार बढ़ती जा रही संख्या के अनुपात में बिकने के लिए तैयार बैठे लोगों की भी कोई कमी नहीं है। आदमी बिकने का आदी हो गया है और उसका मोल-भाव कोई भी कर सकता है।

अपने इलाके और अपने आस-पास खूब सारे लोग ऎसे हैं जिन्हें खरीदा जा सकता है। बिकने वाले भी खूब हैं और खरीदने वाले भी।

चारों तरफ लूटेरोंं का जमावड़ा बढ़ता जा रहा है। ऎसे में हम सभी को गंभीरता के साथ सोचने की जरूरत है कि जो हमारे पास अतिरिक्त है, वह समाज का है। बात सिर्फ रुपयों-पैसों की नहीं है। धनदान, श्रमदान और समयदान जैसे कई कारक हैं जिनके माध्यम से समाज के हितों में अपनी सहभागिता सुनिश्चित की जा सकती है।

अभी हम नहीं चेते तो आने वाला समय और अधिक खराब आ रहा है। कलियुग निरन्तर यौवन पाकर बलशाली होता जा रहा है और ऎसे में जरूरतमन्दों के प्रति हम आज संवेदनशील होकर मददगार नहीं बनेंगे तो हो सकता है लूटेरे अपना आपा खो दें और हमें भी लूट लें।

लूट का अर्थ सिर्फ इसी से नहीं है कि हथियार दिखा कर लूट लिया जाए। आजकल छोटे-मोटे कामों को कराने से लेकर मनचाहे कामों के लिए दूसरे तरह  के रास्ते सामने आ गए हैं। लूट की तरकीबों ने अपने रास्ते बदल लिए हैं।

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