हर पल हो यादगार

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जीवन का सुनहरा पक्ष है हर दिन नयापन और हर घटना यादगार। जीवन में आनंद की प्राप्ति और  अभिव्यक्ति दोनों के लिए यह जरूरी है कि अपना हर क्षण ताजगी भरा हो। इसके लिए नित नवीनता का समावेश जिन्दगी के प्रत्येक पहलू में होना जरूरी है।

खासकर व्यक्ति की वैचारिक भावभूमि पर  सात्विक संकल्पों के अनुरूप शाश्वत बीजों का पल्लवन होना आवश्यक है। वैचारिक दृष्टि से व्यक्ति जितना शुद्ध-बुद्ध होता है, निष्काम, निरहंकारी और निरपेक्ष होता है उतना ही उसकी ताजगी का ग्राफ बढ़ा  रहता है।

बौद्धिक शुचिता से ही शारीरिक स्वास्थ्य भी सबल और उन्नत रहता है। जीवन के प्रत्येक क्षण को इस प्रकार पूर्ण आनंद और तन्मयता के साथ जीना चाहिए कि जो कर्म हो उसकी परिपूर्णता का पूरा-पूरा आनंद हमें प्राप्त होता रहे। कर्म के साथ हमारा मन जुड़े और एकाग्रता आ जाए तभी हमें कर्म में आशातीत सफलता से उपजने वाले आत्म आनंद की अनुभूति होती है जो अर्से तक बनी रहती है।

इसलिए कोई सा कर्म हो, उसमें अपना पूरा हुनर उण्डेलने के साथ ही एकाग्रता का पुट भी जरूरी है। इनमें  ताजगी भरे विचार और प्रसन्नता के भाव मिश्रित हो जाने पर कार्य करने से लेकर समाप्ति तथा इसके बाद तक आनन्द की प्राप्ति का बोध बना रहता है और यही भाव बोध निरन्तर ताजगी का अहसास कराता रहता है।

कर्मयोग में हमेशा यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि हर कार्य लीक से हट कर किया जाए या पूर्वापेक्षा बेहतर स्वरूप में हो, ताकि अन्यतम छवि उभरने के साथ ही समाज को हमारे हुनर का परिष्कृत लाभ प्राप्त हो और इससे सामुदायिक सेवा के सरोकारों में नवीन सम्बल प्राप्त हो सके।

जीवन का हर पल यादगार बनाने के लिए जरूरी है कि हम ऎसे काम करें जो वैयक्तिक हितों से ऊपर हों तथा सार्वजनीन कल्याण के जनक हो। ‘बहुजन हिताय-बहुजन सुखाय’ की भावना से किया जाने वाला प्रत्येक कर्म व्यक्ति के जीवन में आनंद की वृष्टि करने वाला ही होता है।

जीवन में वे सारी घटनाएं तभी याद रहती हैं जब उनमें कुछ रोमांच, कुछ विचित्रता और कुछ संयोग-वियोग  हों। इसके लिए तमाम घटनाओं और उपलब्धियोें को अपनी किसी न किसी सम सामयिक तिथि, गतिविधि या काल से जोड़कर यादगार बनाएं।

ये घटनाएं सिर्फ अपने लिए नहीं बल्कि अपने परिवार वालों, ईष्ट मित्रों तथा परिचितों के लिए भी यादगार बनी रहें, इसके लिए उन सभी की भी यथोचित सहभागिता का ख्याल रखा जाना चाहिए।

स्मृतियों के साथ आनन्द और उल्लास का मिश्रण होने से ये सदैव ताजी बनी रहती हैं।  समय-समय पर इसकी अभिव्यक्ति नवीन ऊर्जाओं का अहसास कराती हुई भावी गतिविधियों में आनंद भरती जाती है। इस तरह हमारे जीवन का हर क्षण ताजिन्दगी यादगार बना रहता है और अपने से संबंधित सभी को यह यादें अर्से तक बनी रहती हैं।

हम कहीं भी काम करते हों, वहाँ हमारे होने या न होने का कोई अर्थ नहीं है यदि वहां की हवाओं और परिवेश में हमारी गंध का कोई कतरा कहीं महसूस न किया जाए। हम जहां भी कर्मरत हों, वहां हमारे कर्मों और व्यक्तित्व की गंध इतनी पसरी रहनी चाहिए कि कम से कम दशकों तक लोग हमारे अस्तित्व को भुला न पाएं और हमारी गंध का आकर्षण हमेशा बरकरार रहे, चाहे हम वहाँ मौजूद रहें या न रहें।

मजा तो तब है जब हमारे कर्मयोग की सुगंध हमारे परवर्ती प्रतिस्थापक तक न मिटा पाएं और उन्हें भी हमेशा इस बात का मलाल रहे कि वे चाहते हुए भी नहीं खींच पा रहे हैं हमसे लम्बी लकीर।

कर्मयोग और हुनर के मामले में व्यक्ति कहीं उन्नीस नहीं होता। जो मौलिक प्रतिभाएं होती हैं वे बिना बाँध की विराट नदी की मानिंद निरन्तर जहां से होकर बहती है वहां के वासन्ती आबोहवा से भरे तट रसीले होते हैं। हम कहीं रहें और हमारी चर्चा तक न हो, इससे बड़ी विड़म्बना और हमारा नाकारापन कुछ और हो ही नहीं सकता। इससे तो अच्छा होता कि हमारा इस पावन धरा पर अवतरण ही नहीं होता। इसलिए जो कुछ करें उसे यादगार बनाएं, तभी मनुष्य होने का अर्थ है।