बेमानी हैं पर्यावरण संरक्षण की बातें

बेमानी हैं पर्यावरण संरक्षण की बातें

प्रकृति पूरी दुनिया पर यों ही कुपित नहीं है। अकारण ही नहीं आ रहे भयानक भूकंप, भीषण गर्मी के जानलेवा ताण्डव, असहनीय शीत के प्रकोप, बेमौसम बरसात, भयंकर बाढ़ और तबाही के खौफनाक मंजर। सूखा और अकाल भी बिना वजह के नहीं आते।

सब तरफ मचा हुआ है भीषण शोर पर्यावरण की दुर्गति, प्रदूषण और मारक-घातक परिवेशीय हलचलों का। जल, थल और नभ सभी जगह तरह-तरह भारी गड़बड़ है। जहाँ-जहाँ आदमी पहुँच गया है वहाँ-वहाँ अभावों, समस्याओं, प्रदूषण और तबाही के सिवा कुछ नया नहीं हुआ है।

नवीनता के नाम पर सीमेंट-कंक्रीट और पत्थरों के जंगल सजे हैं, आलीशान फ्लेट्स और गगनचुम्बी बहुमंजिला इमारतों की संरचनाएं और विकास के नाम पर भौतिकता का नग्न आकर्षक प्रदर्शन ही सब जगह हो रहा है।

विदेशी मूर्खों और भोगवादियों के चक्कर में हमने अपने आपको भी भुला दिया है और अपनी संस्कृति को भी। जड़ों से हम पूरी तरह कटते जा रहे हैं। हमारी संस्कृति और परंपराओं में पेड़-पौधे देवी-देवताओं और जीवन जगत के कारकों से इस तरह जुड़े हुए थे कि इनसे भिन्न हमारे जीवन और सृष्टि की कल्पना तक नहीं की जा सकती थी लेकिन भौतिक विकास, भोगवादी मानसिकता और कृत्रिम तत्वों की आवक बनाए रखने वाली मशीनों पर आश्रित होकर हमने सब कुछ  गँवा दिया।

हमारी स्थिति उन दीन-हीन, नंगे-भूखे भिखारियों की तरह होकर रह गई है जिसके पास ज्ञान, अनुभव, संस्कारों और परंपराओं का अखूट खजाना है लेकिन उस पर विश्वास नहीं है। हमारा विश्वास हमसे अधिक उन विदेशियों पर है जो ज्ञान के लिए भारत में आते रहे हैं और यहीं से सब कुछ पाकर अपने-अपने देशों में लौट कर खुद को सक्षम बनाए हुए हैं।

हमारी यह आत्महीनता को केवल मूर्खता कहकर छोड़ देना हमारी भूल होगी। हमारे कुछ पुरखों ने भी हमें अपनी जड़ों से काटने की कोशिश की है और आज भी हमें अपनी संस्कृति और संस्कारों की मुख्य धारा से अलग-थलग करने की कोशिश जारी है जिसमें अपने लोग भी हैं जो स्वार्थ में डूबे रहकर परायों की तरह व्यवहार करने लगे हैं।

इन लोगों को कंचन, कामिनी और काम से ही सरोकार रह गया है इसलिए भोग-विलास की उन्मुक्त प्राप्ति के लिए ये औरों के आगे नतमस्तक भी हैं और उनकी अंधानुचरी करने को विवश भी। लेकिन इन चन्द बिके हुए और मुफतिया भोग-विलास को पाने के लिए भिखारियों की तरह मण्डरा रहे लोगों की गलतियों का खामियाजा समाज और पूरा देश भुगतता  रहा है।

सभी लोग पेड़-पौधों की कमी, ओजोन परत में छेद, गर्मी और सर्दी के ग्राफ में उत्तरोत्तर बढ़ोतरी, पानी, हवा और जमीन में घातक प्रदूषण से लेकर पर्यावरणीय प्रदूषण के लिए हर बार चिल्लाते रहते हैं और एक-दो दिन आयोजन करते हुए हर साल पेड़-पौधे लगाने के संकल्प लेते हैं और बाद में भूल जाते हैं।

यों भी हमारी प्रतिज्ञाओं, संकल्पों और शपथों का कोई महत्व नहीं रह गया है। ये केवल औपचारिकताएं ही हैं और बनी रहेंगी जब तक इंसान  में इंसानियत का प्रभुत्व नहीं होगा। पर्यावरण के लिए ऊपरी मन से चिन्ता करने वाले लोगों में उन लोगों की संख्या सर्वाधिक है जो कि खुद पर्यावरण और प्रकृति से दूर रहकर कृत्रिमता भरे माहौल में जी रहे हैं।

एयरकण्डीशण्ड वाहनों, घरों, दफ्तरों और प्रतिष्ठानों में दिन-रात गुजारने वालों, पेड़-पौधे लगाने के नाम पर मात्र भाषण झाड़ने वालों, पेड़ों की कटाई और वनों के सफाये में परोक्ष-अपरोक्ष रूप से लगे हुए लोगों तथा पर्यावरण रक्षा के नाम पर होने वाले आयोजनों से पैसों, प्रतिष्ठा और छपास की कमाई करने वाले, पर्यावरण के लिए उपदेश देने वाली भीड़ में शामिल लोगों से पूछा जाए कि वे स्वयं कितने सचेत या प्रयासरत हैं पर्यावरण रक्षा के लिए। तो कोई जवाब दे पाने की स्थिति में ये नहीं होंगे। हो भी नहीं सकते।

ये केवल दूसरों को उपदेश देने के लिए ही पैदा हुए हैं और उत्प्रेरक तथा उपदेशक से अधिक हो भी नहीं सकते। कृत्रिम हवा, पानी और रोशनी ने इन सभी की मौलिक इंसानी ताकत को छीन लिया है इसलिए ये विवश हैं। और जो सक्षम हैं उन्हें यह सब करने में शर्म आती है।

पर्यावरण रक्षा की बातें ही बातें करते रहना बेमानी है। जब तक हमें खुद को प्रकृति के प्रकोप या अनिष्ट का अनुभव नहीं हो पाता तब तक हमारी संवेदनाओं का जागरण नहीं हो सकता। क्यों न गर्मी के दिनों में महीने भर के लिए तमाम एयरकण्डीशण्ड की सेवाओं को बंद कर दिया और हम सभी को यह महसूस करने के लिए छोड़ दिया जाए कि पर्यावरण रक्षा के लिए पेड़-पौधे लगाने, वनों के विकास, जल संग्रहण और भूमि शुद्धिकरण की कितनी अधिक जरूरत है।

तब हम सभी को असली पता चल सकेगा कि वाकई पर्यावरण की हानि कितने अधिक घातक स्तर तक पहुंच चुकी है। पर्यावरण के प्रति हमारी चिन्ता कितनी है इसका पता इसी से लग सकता है कि सूरज की भरपूर रोशनी होने के बावजूद हम बंद कमरों में दरवाजे-खिड़कियां बंद कर, परदे लगाकर बिजली की रोशनी में रहने को ही प्रतिष्ठा और स्टेटस सिम्बोल मानते हैं। आरओ का पानी ही हमें भाता है।

हम सभी को गर्मी से बचाव के लिए एसी चाहिएं और सर्दी को प्रकोप कम करने के लिए हीटर्स के बिना काम नहीं चल पाता।  मतलब यह कि प्रकृति से हम मुँह छिपाने के आदी हो गए हैं, दूर भाग रहे हैं और दूसरों को उपदेश दे रहे हैं कि प्रकृति का सामीप्य पाओ, पर्यावरण की रक्षा करो।

पर्यावरण से जुड़े तमाम आयोजनों में हम पेड़-पौधे लगाने से कहीं अधिक रुचि भाषण झाड़ने और उपदेश झाड़ने में रखते हैं। जो समय मिला है उसमें क्यों न हम कुछ साल तक भाषणबाजी, मंच, लंच और स्वागत-सत्कार की भूख-प्यास को छोड़कर पूरा का पूरा समय पेड़-पौधे लगाने में करें।

कितने लोग हैं जो पेड़-पौधों और पर्यावरण की बातें तो करते हैं, मगर पेड़ लगाने से उनका कोई सरोकार नहीं। केवल फोटो खिंचवाने के लिए भीड़ में शामिल होकर पेड़ का स्पर्श करते दिखाई जरूर देंगे जैसे कि इनका पावन स्पर्श ही काफी है पर्यावरण  संरक्षण-संवर्धन के लिए।

हम सभी लोगों को चाहिए कि यथासंभव पेड़-पौधे लगाकर उनकी परवरिश और बड़ा करने का जिम्मा भी लें। जो लोग पेड़ लगाकर भूल जाते हैं उन लोगों को वृक्ष हत्या का पाप भी लगता है।

इस पाप से मुक्ति का कोई उपाय नहीं है। जो लोग पेड़ नहीं लगा सकते, वे कृपया पौधारोपण के न भाषण दें, न उपदेश झाड़ें।

आईये अब तो जगें-जगाएं, पर्यावरण संरक्षण के लिए कुछ करें अन्यथा आने वाली पीढ़ियाँ कोसती रहेंगी। और तब भूत-पलीत की योनि पा चुके हम लोगों को पेड़ों और जंगलों का ठिकाना भी नसीब नहीं होगा।

विश्व पर्यावरण दिवस की शुभकामनाएं…।