वैराग्य नहीं विरक्ति का आनंद पाएं

वैराग्य दुःख, शोक और अभावों से प्राप्त होता है और इसके साथ कई सारे मनुष्यों की स्मृतियां जुड़ी होती हैं जिनके बाद में कई-कई बार उभरने, अंकुरित होने और पल्लवित-प्रसरित होने की तमाम संभावनाएं बनी रहती हैं।

यह प्रतिकूल घटनाओं-दुर्घटनाओं से भरे हुए अवचेतन से प्राप्त होता है इसलिए जब भी दुःखों या अभावों के अवसर आएंगे, अवचेतन के द्वार बार-बार खुलते रहेंगे और चाहे कितना वैराग्य पा लिया हो, बार-बार उसे अधोगामी होना ही है।

इसके विपरीत संसार के सुख और भोगों की प्राप्ति का चरमोत्कर्ष हमारी वैयक्तिक उपलब्धि होता है जहां हम ही हम होते हैं अपार सुखों की अनुभूति के लिए। इसलिए दूसरों का स्मरण भी नहीं होता। फिर सुख-भोग और इच्छाओं के औसत स्तर में तृप्ति पा लेने के बाद उनसे संबंधित जिज्ञासाएं और प्रश्न अपने आप समाप्त व अस्तित्वहीन हो जाते हैं उनके लिए अवचेतन में जगह रख छोड़ने की आवश्यकता नहीं होती।

इसलिए हम इनसे मुक्त होकर इस मामले में शून्यावस्था में ही रहा करते हैं और यह स्थिति विरक्ति की है। वैराग्य जहां अभावों से उत्पन्न होता है वहीं विरक्ति संतृप्तता के बाद की स्थिति है। जो विरक्त है उसे अधोगामी नहीं होना पड़ता क्योंकि वह उन सारी स्थितियों से पहले ही गुजर कर दैहिक एवं आत्मीय सुख का अनुभव कर चुका है।

पर इन तमाम प्रकार के सुखों की प्राप्ति से लेकर उपभोग और विसर्जन तक की समस्त यात्रा में निष्काम भाव अपनाया जाए तो कर्म के प्रति आसक्ति का बोध नहीं होगा। क्योंकि हर निष्काम कर्म भगवदीय होता है।

वैराग्य को यों समझें कि भरपूर बहाव वाली नदियों के किनारे रहने वाले और घण्टों नदियों के तटों पर नहाने का आनंद पाने वाले लोग मरुस्थल में पहुंच जाएं और वहां उन्हें नहाने के लिए एक बाल्टी पानी भी नहीं मिले। तब दुःखों से घबराकर वहां से पलायन कर जाएं, यही दुःखजनित वैराग्य है।

जबकि दूसरी ओर इन्हीं लोगों से कोई यह कह दे कि कुछ देर और नहा लो हमारे साथ। और वे यह कहें कि काफी समय से जलक्रीड़ा का खूब मजा ले रहे थे अब थक गए, रहने दो यार, कल देख लेंगे। कितना नहाएं, मल-मल कर बहुत नहा लिए। और यह कहकर तट पर गुलाबी धूप सेकने में मस्त हो जाएं। यह विरक्ति है।

विरक्ति पा लेने के बाद जल क्रीड़ा या पानी से संबंधित कोई सा संदेह, जिज्ञासा या प्रश्न नहीं होता, फिर वह ईश्वरीय मार्ग की जिज्ञासाओं का द्वार खटखटाने लगता है जहाँ जल क्रीड़ा से कहीं अधिक और कभी खत्म न होने वाले आनंद की तलाश बढ़ जाती है।