चापलूसी करो, मौज उड़ाओ

सभी समझदार लोग चापलूसों को दोष देेते हुए उन्हें हीन भावना से देखते हैं और जहाँ मौका मिल जाए, वहाँ बेचारों को सुना भी दिया करते हैं। जबकि ऎसा नहीं होना चाहिए। यह तो उन सभी चापलूसों की विवशता है कि बेशर्म होकर तसल्ली से सुन लिया करते हैं अन्यथा आजकल कौन किसकी सुनता है। 

थोड़ा इन चापलूसों के परिवेश, विवशताओं और मनोविज्ञान को भी समझने की कोशिश करें कि इन बेचारों के पास यही तो एकमात्र हुनर है जिसके सहारे खा-पी और कव जमा लेते हैं, बड़े-बड़े लोगों के आगे-पीछे और साथ-साथ हो जाते हैं और खुद को बड़ा मान और मनवा लिया करते हैं।

जो लोग स्वाभिमानी, संस्कारित, शिक्षित-दीक्षित और हुनरमन्द हैं, ज्ञानवान और अनुभवी हैं, कर्म के प्रति निष्ठा और समर्पण रखते हैं, उन लोगाें के लिए जीवन निर्वाह आसान है। वे अपनी क्षमताओं और कर्मयोग से कमा खाते हैं और अपनी प्रतिष्ठा बना लेते हैं लेकिन जिन बेचारों के पास कोई ज्ञान, अनुभव और हुनर नहीं है, जिनकी पीढ़ियां ही स्वाभिमान को गिरवी रखती आयी हैं, जिनके लिए मानवता से बढ़कर भोग-विलास और वैभव है, उन लोगों के लिए खुद को जिन्दा रखते हुए अपने वजूद को दर्शाने के लिए जब और कोई रास्ता ही नहीं बचा तो क्या करें। मरता क्या नहीं करता। एकमेव चापलूसी के सहारे ये औरों को भरमाते हुए चल निकलते हैं।

यह एकमात्र ऎसा तिलस्मी हुनर है जिसके मोहपाश में अच्छे-अच्छे लोग बँध जाते हैं और खुद को नायक एवं महानायक समझते हुए निरंकुशता भरा नेतृत्व ध्वज थाम लेते हैं और खूब सारे स्वयं को महावत समझ कर बड़े-बड़े हाथियों पर सवारी करते हुए यायावरी सुख-सुकून का अहसास करने लगते हैं।

हम लोगों को हमेशा यह शिकायत रही है कि जमाने के पास मूल्यांकन का अब और कोई पैमाना कामयाब नहीं रहा है सिवाय चापलूसी के। कितना ही अच्छा काम करते रहो, पूरी निष्ठा, समर्पण और ईमानदारी से दिन-रात जुटे रहो, गुणवत्ता भरा कर्मयोग दर्शाते रहो, समाज और राष्ट्र के उत्थान में पसीना बहाते रहो, लेकिन इसका कोई मूल्य नहीं। आखिर बाजी तो वे ही मार ले जाते हैं जो चापलूसी करने में माहिर होते हैं।

आजकल जमाना इन्हीं चापलूसों का लगने लगा है। हर तरफ इन्हीं की भरमार है। हर कोई एक-दूसरे की चापलूसी करता हुआ भरमा रहा है। कोई किसी को उल्लू बना रहा है, कोई अपने आपको उल्लू का पट्ठा बता कर उल्लुओं के नाम पर चमड़े के सिक्के चला रहा है और कोई खोटी चवन्नियों को बाजार में चलवा रहा है। उल्लू बनाने वाले भी खूब हैं और बनने वाले भी। सभी को एक-दूसरे को बनाना रास आ गया है। 

चापलूसों का तो पूरा का पूरा शब्दकोष ही अलग बन चुका है जहाँ आकाओं और अपने स्वार्थ सिद्ध करने वालों को भगवान से भी अधिक समर्थ, शक्तिमान और सर्वज्ञ बताते हुएलफ्फाजी भरे लच्छेदार शब्दों से भरमाने का सिलसिला लगातार उछालें मारने लगा है।

चापलूसी करने वाले भी खुश हैं और चापलूसों से घिरे रहकर मिथ्या प्रशस्तिगान का श्रवण करने वाले भी मदमस्त हैं। इन सभी को और क्या चाहिए। स्तुतिगान करने और कराने वाले, सुनने और सुनवाने वाले सारे के सारे अपने-अपने दड़बों में मुजरे का आनंद ले रहे हैं।

जब से यह लोक धारणा बन चली है काम-धाम, निष्ठा, मेहनत-मजूरी , ईमानदारी, सत्यनिष्ठा, श्रम, समय और सिद्धान्तों की बजाय एकमात्र चापलुसी से ही अपने काम आने वाले लोगों को रिझाया जा सकता है, तभी से कर्मयोग का ह्रास होने लगा और लोगों ने चापलूसी का सबसे सहज, आसान और सरल किन्तु प्रभावी उपाय अपना लिया और शुरू कर दिया हर तरफ आजमाना।

हममें यदि शिक्षा-दीक्षा, खाने-कमाने और खुद के बुद्धिबल से प्रतिष्ठा अर्जित करने का माद्दा न हो तो ऎसे में चापलूसी का दामन थाम कर कहीं भी कुछ भी प्राप्त किया जा सकता है। हम देख ही रहे हैं कि बड़े-बड़े लोग यही करते आये हैं। उनकी आशातीत और अप्रत्याशित सफलता और वैभव के पीछे यही एक हुनर छिपा है और वह है चापलूसी का।

अब इंसान को रिझाने के लिए और किसी भी हुनर या परिश्रम, अच्छे कामों और प्रखर प्रज्ञा या दीर्घकालीन अनुभव की आवश्यकता नहीं है, केवल और केवल चापलुसी मात्र को अंगीेकार कर लिए जाने से हम दुनिया की उस मुख्य धारा में अपने आप को पा सकते हैं जहाँ बिना कुछ किए धराए प्रतिष्ठा भी है और इससे जुड़े हुए मुफतिया भोग-विलास भरी आरामतलब जिन्दगी।

चापलूसी का राफेल तीनों लोकों में सिद्धि और प्रसिद्धि के लिए उपयुक्त है। इसके प्रशिक्षण के लिए भी कहीं समय जाया करने की आवश्यकता नहीं है। हमारे आस-पास ऎसे खूब सारे हुनरमन्द लोग हैं जिनके पास और कुछ भी हुनर नहीं है सिवाय चापलूसी के। और इसी के सहारे आज वे कहाँ से कहाँ जा पहुँचे है, यह बताने की आवश्यकता नहीं है।

धन्य हैं वे लोग जिन्होंने चापलूसी को जीवन भर के लिए संगी साथी और संरक्षक बना दिया है। ये चापलूसी का तिलस्म नहीं होता तो आज वे लोग कहाँ होते जो चापलूसी के ढेरों अभिनव प्रयोग करते हुए प्रतिष्ठा के कमाऊ और पूज्य धाम बने बैठे हुए हैं।

ईश्वर इन सभी हुनरमन्दों को लम्बी आयु दे ताकि आने वाली पीढ़ियों को अपने लिए ज्यादा मेहनत ही नहीं करनी पड़े, सब कुछ इसी चापलूसी के सिद्ध मंत्र से ही प्राप्त होने लगे। चापलूसी जिन्दाबाद। चापलूस अमर रहें।

1 thought on “चापलूसी करो, मौज उड़ाओ

  1. सबसे बड़ा हुनर है चापलूसी ..,जो आजमाए वो निहाल
    न शिक्षा-दीक्षा चाहिए, न अनुभव और संस्कार, और न किसी तरह के आदर्श, सिद्धान्त और नैतिक मूल्य। न कोई चरित्र, न समाजसेवा या देशभक्ति का टण्टा। चापलूसी के सहारे इस जगत में वो सब कुछ पाया जा सकता है जो कि मेहनत, ईमानदारी, सच्चाई और धर्म से हासिल नहीं किया जा सकता। बड़े-बड़े लोगों की पहली पसन्द हैं चापलूस। तभी तो ऎसे-ऎसे लोग जमाने भर में फब रहे हैं जिनकी कोई औकात ही नहीं है। सिवाय चापलूसी के कुछ जानते ही नहीं। और चापलूसी ऎसी कि चल निकली है। – Der. Deepak Acharya

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