शत्रु या मित्र वही जो हो बराबरी का

हम चाहे जिसे मित्र या शत्रु मान लिया करते हैं यही हमारी सबसे बड़ी भूल है।  दुनिया में प्रेम सभी से हो किन्तु विश्वास या श्रद्धा के लिए पात्रता का परीक्षण पहले जरूरी है।

इसी प्रकार शत्रु या मित्र भी वही हो सकता है जो कि हमारी बराबरी का हो। आजकल मित्रता और शत्रुता के गहन अर्थ से नासमझ लोग पात्रताहीन लोगों के साथ जुड़ जाते हैं और अपने मित्र या शत्रु के रूप में संबंध स्थापित कर डालते हैं और फिर जिन्दगी भर पछताते रहते हैं या कुढ़ते रहने को विवश हो जाते हैं।

मित्रता और शत्रुता दोनों में बराबरी का मापदण्ड है। हम लोग चाहे जिस मित्र बना लेते हैं और चाहे जिसे अपना शत्रु मान लेते हैं। यह हमारी जिन्दगी के लिए हमेशा विषमताजनक व अनमनी स्थितियां पैदा करता रहता है और जिन्दगी भर हम इसी उधेड़बुन में रहते हैं कि किस मित्र ने हमारे साथ क्या कर दिया अथवा किस इंसान ने शत्रुता निभाते हुए बहुत कुछ कर दिया।

हम जिन लोगों को मित्र या शत्रु मानते हैं उन सभी लोगाें के स्वभाव, व्यवहार, कथनी और करनी, आचरण, दैवीय और आसुरी गुणों तथा अन्यतम विशिष्टताओं का तुलनात्मक अध्ययन करें और उसके बाद तय करें कि वे हमारे मित्र या शत्रु हो सकते हैं अथवा उसके लायक भी हैं।

यदि इनमें भिन्नताएं अधिक हैं तब तो वे हमारे मित्र बनने के लायक हैं ही नहीं और यदि समानताएं अधिक हैं तो मित्र हो सकते हैं। इनमें भी जिन लोगों से हमारी समानताएं पूरी तरह मेल खाती हैं वे ही आदर्श मित्र कहे जा सकते हैं।

समानता चाहे भौतिक धरातल पर न हो लेकिन वैचारिक और बहुविध मानसिक धरातल और दैवीय गुणों के आधार पर होनी नितान्त जरूरी है और ऎसा होने पर ही मित्रता का आनंद प्राप्त किया जा सकता है अन्यथा यह मित्रता कामचलाऊ ही रहेगी और किसी स्वार्थ या काम के सधने तक ही इसका प्रभाव दिखाई देगा।

शत्रुता के बारे में भी यही स्थिति है। हममें से बहुत से लोग ऎसे-ऎसे टटपुन्जिये नुगरे लोगों को अपना शत्रु मान लिया करते हैं जो किसी भी स्थिति में हमारे शत्रु होने लायक नहीं होते। शत्रुओं को पहचानने के मामले में हम लोग नासमझ और मूर्ख  सिद्ध होते हैं। अपना शत्रु वही हो सकता है जिसका विचार, कर्म और व्यवहार हमारी तरह हो, हमसे मेल खाता हो तथा हमारी और उसकी प्रवृत्तियाँ समान अथवा लगभग समान हों।

शत्रुता के मामले में भौतिक सम्पन्नता भी बहुत बड़ा मापदण्ड होती है। किसी धनाढ्य का शत्रु कोई भिखारी या विपन्न कभी नहीं हो सकता। किसी प्रतिष्ठित इंसान का शत्रु कोई सामान्य इंसान नहीं हो सकता। मुण्डे-मुण्डे मतिर्भिन्ना होने से वैचारिक असमानता या विचारों को नहीं मानने की स्थिति को शत्रुता नहीं माना जा सकता क्योंकि यह हर इंसान का अधिकार है।

ऋषि परंपरा में जीने वाले किसी आध्यात्मिक व्यक्तित्व का शत्रु कोई भ्रष्ट, रिश्वतखोर, कमीशनबाज या चोर-डकैत नहीं हो सकता। किसी उदारमना इंसान का शत्रु कोई कृपण कभी नहीं हो सकता।

समाज और देश के लिए जीने वालों का शत्रु कोई खुदगर्ज या स्वार्थी नहीं हो सकता। किसी ईमानदार इंसान का शत्रु बेईमान कभी नहीं हो सकता। जहाँ जमीन-आसमान का अन्तर हो, वहाँ शत्रुता संभव है ही नहीं।

किसी ऋषि या सज्जन का शत्रु कोई असुर या दुष्ट नहीं हो सकता। कोई छपास, मंच और लंच का भूखा, सम्मान, पद, अभिनंदन और पुरस्कारों का प्यासा इंसान कभी भी स्वान्तः सुखायी व्यक्तियों का शत्रु नहीं हो सकता।

मेहनती आदमियों के शत्रु हरामखोर और कामचोर कभी नहीं हो सकते। चरित्रवान लोगों के शत्रु व्यभिचारी नहीं हो सकते। इसी प्रकार जिन लोगों का स्वभाव विलोमानुपाती है  उनके बीच शत्रुता नहीं हो सकती।

पर हम लोग अक्सर किसी न किसी ऎरे-गैरे नत्थुगैरे को अपना शत्रु मान लेते हैं और उसे शत्रु के रूप में प्रतिष्ठित कर दिया करते हैं। और कई बार तो अपने कद को बढ़ाने के लिए नालायक और निकम्मे लोग हमसे शत्रुता का व्यवहार करने लगते हैं और वह भी इस कारण कि इससे उनका वजूद सिद्ध होगा और सामने आएगा।

सज्जनों को चाहिए कि वे उन्हीं लोगों की परवाह करें जो उनके मुकाबले के हैं और मूल्यांकन का माद्दा रखते हैं। अनपढ़ गँवार, भीखमंगे, लोगों से उधार पैसे ले लेकर काम चलाने वाले, पुरुषार्थहीन, ब्लेकमेलिंग करने वाले, खुद को खुदा मानने वाले, कमीन लोग यदि हमारे बारे में कुछ कहते या करते हैं तो उसे शत्रुता नहीं माना जा सकता।

यह केवल भूखे-प्यासे श्वानों की भूँकन और रुदाली मात्र है जिसके प्रति गंभीर होना भी महामूर्खता का एक हिस्सा माना जाता है। ये मन्दबुद्धि और खुराफाती, औरों की दया पर पलने वाले और झूठन के सहारे जिन्दगी चलाने वाले लोग किसी भी दृष्टि से हमसे शत्रुता रखने में असफल हैं।

ये लोग भौंकने वालों में शुमार हैं जिन्हें और कुछ नहीं चाहिए, थोड़ा कृत्रिम आदर, सड़ी-गली ब्रेड का टुकड़ा या कोई सी बासी-पुरानी झूठन ही काफी है। कुछ मिल जाएगा तो मुँह बंद हो जाएगा लेकिन वह तभी तक जब तक गले से नीचे नहीं उतरे। पेट में चले जाने के बाद फिर भौंकना शुरू।

यह श्रृंखला ताजिन्दगी बनी रहती है। इन भौंकने वालों का ईलाज डण्डादेव के अनुष्ठान से भी किया जाता है। लेकिन सर्वश्रेष्ठ और निरापद ईलाज यही है कि इन्हें कुछ समझें ही नहीं और अपने काम करते रहें। इन लुच्चे-लफंगों और टुच्चे लोगों को हम अपना शत्रु स्वीकार कर हम अपना तथा पूरी मानवजाति का अपमान ही करते हैं।

आज से अपने शत्रुओं की सूची में कटौती करनी आरंभ कर दें और उन सभी लोगों को हटा दें जो हमसे शत्रुता रखने के काबिल भी नहीं है, फिर भी हमारे दिमाग में कब्जा किए बैठे हैं।