देश के दुश्मन हैं ये

देश के दुश्मन हैं ये

मर्यादाओं, संस्कारों और परंपराओं का ह्रास होता है और अपने स्वार्थ और ऎषणाओं के अनुरूप जब परिभाषाएं गढ़ी जाती हैं तब प्रकृति और परमेश्वर भी अपना साथ छोड़ देते हैं और वह सब कुछ होने लगता है जो नहीं होना चाहिए।

पेड़-पौधों, जड़-जंगम और दूसरे जीवों को छोड़कर इंसान अब अपनी सारी की सारी मर्यादाओं और मौलिक संस्कारों को भुलाकर हर तरह से अमर्यादित, उच्छृंखल और उन्मुक्त उन्मादी होता जा रहा है और इसका असर ये हो रहा है कि अब वो सब कुछ अनियमित हो गया है जो नियमित रूप से मौसम के अनुरूप होना चाहिए।

सर्दी, गर्मी, बरसात, मावठा, आँधियां, लू, बर्फीली हवाएं और परिवेशीय परिवर्तन हर मामले में अनिश्चय की स्थितियां हैं। पहले लोग स्वाभाविक मौत मरा करते थे। अब पता भी नहीं चलता और लोग आकस्मिक काल कवलित हो जाया करते हैं।

कब कहाँ भूकंप आ जाए और कब कहाँ ज्वालामुखी फट जाए, उसका कोई भरोसा नहीं। पल में माशा, पल में तोला जैसी स्थितियां हैं।  न बाहर का कोई भरोसा रहा है, न भीतर का।  आदमी जात भी ऎसी ही हो गई है। कभी अचानक किसी बात पर खुश हो जाती है और कभी किसी बात पर गुस्सा। इसीलिए इंसान की प्रकृति के बारे में कहा गया है – क्षणे रुष्टा-क्षणे तुष्ट, रुष्टा-तुष्टा क्षणे-क्षणे।

किसी के साथ रहकर या किसी को देखकर भी हम यह अन्दाजा नहीं लगा सकते कि कौन आदमी या औरत किस तरह का स्वभाव पाले हुए है और कौन अपना-पराया, अच्छा-बुरा है। न पुरुष पूर्ण रहे, न स्ति्रयाँ पूर्ण हैं।

लगता है कि सारे आधे-अधूरे और भटके हुए हैं। अपने आप के बारे में भी सदा सर्वदा अनिश्चय और आशंकाएं हमेशा बनी रहने लगी हैं। कुछेक ही होंगे जिन्हें अपने जीवन और कर्म के बारे में वास्तविक और शाश्वत ज्ञान होगा अन्यथा बाकी सारी भीड़ तो स्वार्थ और लाभ देखकर चलने की आदी है।

 

आज हम यहाँ हैं, कल कहाँ होंगे कोई भरोसा नहीं है। यूज एण्ड थ्रो का जमाना है आजकल। कोई किसी को भी अनचाहे उठाकर कहीं भी फेंक या फिंकवा सकता है। न हमें पता रहता है न हमारे घर-परिवार वालों को, और न ही उन लोगों को जो हमें हाँकते हुए आगे से आगे ले जा रहे हैं।

शातिरों की बिसात पर शतरंज के मोहरे फिट किए जाते रहे हैं। यहाँ ज्ञान, अनुभवों और ओहदों और प्यादों का कोई वजूद नहीं है, जो जितना अधिक शातिर खिलाड़ी या ग्वाला है वह कुछ भी कर सकता है।

शेर-बकरी, गधे-घोड़े-खच्चर, भैंसों, हिरणों से लेकर तमाम जात के आदमियों के के लिए समानता और व्यवस्था के नाम पर मनमाने चरागाहों का इंतजाम हो जाता है। न कोई कहने वाला है न सुनने वाला।  बाड़े वालों के लिए जीवित और मृत दोनों तरह के चलते हैं। किसी को नहीं पड़ी है।

चरागाहों में घास के अभाव में उपवास करो या दम तोड़ दो। पानी न मिले तो प्यासे ही मर जाओ। जो करना है करो, लेकिन आवाज और सडान्ध बाड़े से बाहर नहीं आनी चाहिए अन्यथा बिना किसी चेतावनी के इनसे भी और अधिक खराब बाड़ों में इधर-उधर कर दिए जाने की आशंका हमेशा बनी हुई है ही।

भूख लगे तो बाड़े के दरख्तों को खा जाओ, दूसरों को नोचकर खाओ और खून पी जाओ, सब चलेगा। बाड़े वाले तो यही चाहते हैं कि सारे एक-दूसरे से लड़ते रहें और वे जंगल सफारी का आनंद पाते रहें। और कुछ खाने-पीने और पार्टी करने की इच्छा हो तो शाम तक तो कोई न कोई इंतजाम हो ही जाएगा, क्योंकि बाड़ों में वो सारे शिकारिया इंतजाम पहले से ही मौजूद हैं कि कुछ तो रोज फंसेंगे ही।

यह अपने आप में काफी है औरों को डराने के लिए। जंगल अब दरख्तों के नहीं रहे, शिकारियों के होकर रह गए हैं। अब शिकारी ज्यादा हैं और शिकार होने वाले कम पड़ गए हैं। तरह-तरह के लिबासों और मुखौटों में शिकारी गिद्ध दृष्टि बनाए हुए हैं, कब मौका मिले और कच्चा चबा जाएं।

पहले तो शिकारियों में लिंग भेद भी था पर अब शिकारियों की तादाद इतनी अधिक बढ़ चली है कि पुल्लिंग-स्त्रीलिंग और उभयलिंगी शिकारी भी जोर आजमाईश कर रहे हैं। फिर नए शिकारियों के तेवरों को तो भगवान भी नहीं भाँप सकता।

हर तरफ हालात हास्यास्पद भी हैं और इन्हें देख कर रोना भी आता है। बहुत से लोग हैं जिनकी उत्पत्ति और जीवन पर शंकाओं का होना स्वाभाविक है, और खूब सारों के बारे में खंगाले जाने पर कुछ और ही किस्से-कहानी सामने आते हैंं।

बाड़ा कोई सा, किसी का कोई ठिकाना तय नहीं है। जिनके खुद के ठिकाने तय नहीं होते, जिन्हें अपनी काबिलियत पर कोई भरोसा नहीं होता, वे दूसरों की प्रतिभाओं और क्षमताओं पर भी भरोसा नहीं करते। करें भी कैसे, इन्हें अपने आप पर भी भरोसा नहीं होता।

संतोष, स्थायित्व, निश्चय और मस्ती सब कुछ गायब होती जा रही है क्योंकि सब तरफ अनिश्चय का दौर है और इससे रोजाना नई-नई आशंकाओं का जन्म होता रहता है। इंसान को मस्ती भरी जिन्दगी और कर्मयोग के लिए जो शांति, संतोष और आनंद चाहिए उसका सभी तरफ अभाव होता जा रहा है।

कुछ फीसदी लोग तो ऎसे हैं जिन्हें देखकर ही लगता है कि ये लोगों को हैरान-परेशान करने और तनाव देने के लिए ही पैदा हुए हैं और जब  तक जियेंगे तब तक उन्हें अपने इन्हीं कुकर्मों के साथ रहना है।

लगता तो ये भी है कि जब से फांसी की सजाएं कम होने लगी हैं, सामन्तशाही खत्म हो गई है तभी से जिन जल्लादों, कसाइयों और हत्यारों का रोजगार छीन चुका है वे सारी की सारी जीवात्माएं अब इन लोगों के रूप में पैदा हो चुकी हैं और दुनिया में लोगों को परेशान करते रहने तथा अपनी खोटी चवन्नियां चलाने के सिवा इनका और कोई लक्ष्य नहीं है।

ऎसे ही लोगों के कारण समाज और देश का उद्धार नहीं हो पा रहा है क्योंकि जिन लोगों के जीने का चैन-सुख-सुकून छीन लिया जाता है वे तसल्ली से काम कर पाने का अनुकूल माहौल प्राप्त नहीं कर पाते हैं और इसका असर ये होता है प्रतिभाओं को प्रतिकूलताओं तथा दमन का अहसास होता है।

प्रतिभाओं को बेवजह प्रताड़ित करना, उन्हें बिना किसी कारण से इधर-उधर करते रहकर परेशान कर देना, जीवन से स्थायित्व और घर-परिवार का सुख छीन लेना यह सब कुछ प्रताड़ना और दमन में शुमार है और जो लोग इस तरह के कुकर्म, अपराध और यंत्रणा भरे कामों में हिस्सेदार या सर्जक होते हैं वे समाज और देश के गद्दार हैं क्योंकि उनके कारण देश और समाज को प्रतिभाओं का पूरा लाभ नहीं मिल पाता।

बुरे लोगों को दण्ड न मिल पाए, तो चलेगा। इससे देश को उतना नुकसान नहीं होता क्योंकि वे तो पहले से ही नाकारा और निकम्मे हैं लेकिन यदि सज्जनों और कर्मयोगियों को प्रोत्साहन की बजाय तिरस्कार, अपमान, प्रताड़ना और सजा मिलती रहे तो यह मानकर चलें कि यह स्थिति राष्ट्र के लिए अधिक आत्मघाती है।

इससे एक तरफ श्रद्धाहीनता और कर्म क्षीणता आती है, दूसरी ओर सज्जनों और अच्छे लोगों की आह से परिवेश में पाप और ताण्डवी माहौल आकार लेता रहता है। हालांकि यह काफी है किसी को भी भस्मीभूत करने के लिए, लेकिन इसके लिए समय की प्रतीक्षा का धैर्य होना जरूरी है।