अवसान वर्ष का है, अपना नहीं

पूरी दुनिया आज की रात जश्न में इतना अधिक डूबेगी कि जैसे वर्ष का नहीं दुनियावी लोगों का अवसान ही होने जा रहा है। खाओ, पिओ, मौज करो वाली संस्कृति के लोगों के लिए अंधेरों का जश्न ही है, उनके भाग्य में रोशनी का क्या काम।

फिर अंधेरा और अंधेरा पसन्द लोगों में हम भी इस कदर शामिल हो चुके हैं कि पता ही नहीं चलता कि कौन अंधेरे का उपासक है और कौन उजालों का आह्वान करने वाला।

इसे हमारी अतिशय उदारता, समन्वयवादी दृष्टिकोण कहें कि मूर्खता, कुछ नहीं कहा जाना चाहिए। लेकिन इतना अवश्य है कि हम अपने आपको भुला चुके हैं, अपनी संस्कृति को विस्मृत कर चुके हैं। 

जिस देश ने पूरी दुनिया को ज्ञान का पाठ पढ़ाते हुए विश्व गुरु की उपाधि हासिल की, उसी देश के हम लोग किस कदर आत्महीनता के भयानक और विनाशकारी दौर से गुजर रहे हैं, यह किसी को कहने की आवश्यकता नहीं है।

इसके प्रमाण के लिए सिर्फ आज की रात ही काफी है। किसी जमाने में ‘तम सो मा ज्योतिर्गमय’ के उद्घोष के साथ उजालों का आवाहन भी किया जाता था और उजालों के देवता का पूजन-अर्चन भी। पाश्चात्य प्रभावों के कारण आज हमने अंधेरों को संगी-साथी बना लिया है।

हालात ये हो गए हैं कि ये अंधेरे न हों तो हममें कोई उत्साह रहे ही नहीं। हर तरह के आनंद और उल्लास के लिए हमें अंधेरे चाहिए ही चाहिएं। और अंधेरों के साथ किन तत्वों, विषयों और प्रभावों का मेल-मिलाप जरूरी है, यह वे सभी लोग अच्छी तरह जानते हैं जिनके लिए अंधेरों भरे उत्सव और अवसर जीवन के परम और चरम आनंद को प्रदान करने वाले हैं।

भोगभूमि के लोगों के लिए अंधेरों का साथ जरूरी हो चला है और कर्मभूमि के बाशिन्दों के लिए उजालों की अनिवार्यता। दुर्भाग्य से हम लोग भोगभूमि वालों के साथ हो लिए हैं और इसलिए अंधेरी रातों के उत्सवों में हमें आनंद आता है और यही रातें हमें रास आती हैं।

कहना न होगा कि ज्यों-ज्यों हम वैश्वीकरण की ओर डग बढ़ा रहे हैं, त्यों-त्यों निशाचरी परंपरा को आत्मसात करते जा रहे हैं। वर्ष की इस अंतिम आधी रात में हम लोग अपने दैहिक आनंद में इतने अधिक डूब जाया करते हैं कि हमें यह भान ही नहीं रहता कि हम क्या हैं और क्या कर रहे हैं।

हमारी सारी क्रियाएं-प्रतिक्रियाएं और जीवन व्यवहार सब कुछ ऎसा होने लगा है जैसे कि आज का दिन ही हमारी जिन्दगी का अंतिम दिन है इसलिए जो कुछ मौज-शौक करना हो, वह कर लो, हो सकता है कल दिन उगे ही नहीं।

फिर दूसरी बात यह भी कि आधी रात तक भोग-विलास में गोते लगाते रहो, फिर निकल कर सीधे कूद जाओ, नए साल के स्वागत में। सारे के सारे अर्धरात्रियां आनंदी जीव यही समझकर सब कुछ करते रहते हैं। और ऊपर से संकल्प यह कि अगले साल से कुछ नया, अच्छा और यादगार करेंगे। साथ में बुरी आदतों और बातों का भी परित्याग करेेंगे।

लेकिन अपनी मौज-शौक की खुमारी उतरने के बाद सारे संकल्प और अच्छे कामों की बातें भूल जाते हैं। दो-चार दिन बाद वैसे ही हो जाते हैं जैसे कि थे। वर्ष का अवसान मानने वालों को साल के इस अंतिम दिन यह चिन्तन करना चाहिए कि बीते वर्ष भी हमने इसी तरह मौज-शौक पूरे किये थे, पीने-पिलाने और खाने-खिलाने से लेकर दैहिक भोग-विलास के भी यथा उपलब्ध आनंद अवसरों को मूर्त रूप दिया था।

और पिछले बरस ही क्यों, खूब सारे लोग पिछले कई सालों से यही सब करते आ रहे हैं किन्तु वहीं ठहरे हुए हैं जैसे पहले थे। केवल कैलेण्डर बदलते रहे हैं, अंधेरी रात में वर्षावसान और नव वर्ष आगमन का जश्न मनाने वाले वहीं के वहीं हैं।

इन हालातोंं में अंधेरी रातों के ये विदेशी अप संस्कृति से प्रभावित उत्सवों  का क्या औचित्य है, इसे न वे समझ सकते हैं, न समझा सकते हैं। हर देश-धर्म और संस्कृति के अनरूप जो परम्पराएं स्थापित हैं उन्हीं का आश्रय ग्रहण करते हुए लक्ष्यों में सफलता और ऊध्र्वगामी होने का प्रयास करना अधिक लाभकारी होता है। दूसरे देशों से आयातित उत्सवों से दैहिक आनंद तो पाया जा सकता है किन्तु भीतरी शांति और आनंद कभी नहीं।

जो लोग अंधेरों के साथ अपने अनुष्ठान करते हैं उनके जीवन में रोशनी आ ही नहीं सकती। हो सकता है कि अलक्ष्मी और भौतिकतावादी चकाचौंध मुँह बोलने लगे किन्तु अन्तर्मन में तो अंधियारा घर किए ही रहता है।

इंसान की मनोवृत्ति अब यह होती जा रही है कि उन्मुक्त भोग-विलास को सार्वजनिक मान्यता और स्वीकार्यता देने-दिलाने के लिए वह साल भर किसी न किसी उत्सव और अवसर की तलाश में बना रहता है ताकि औरों की नज़रों में बुरा या अनुचित न दिखे। 

सम्पूर्ण जीवन यात्रा को सामने रखकर यह सोचने की आवश्यकता है कि हम जो कुछ कर रहे हैं वह हमारे लिए कितना उपयोगी है। यह भी सोचने की जरूरत है कि साल बीत रहा है, वर्ष का अवसान हो रहा है, हमारा नहीं।

इसलिए पूरी शालीनता, मर्यादा और सौहार्द के साथ पुराने साल को विदा दें। आज की आधी रात में पुराने साल को विदा देने में शिद्दत के साथ जुटे सभी उत्सवधर्मियों और आनंदमार्गियों को हार्दिक शुभकामनाएँ …।

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