करामाती छछून्दर

हाल के दशकों में जाने ऎसा क्या हो गया है कि लोग बिना मेहनत किए सब कुछ पा जाने के लिए ऎसे उतावले बने रहते हैं जैसे कि उन्होंने इसीलिए धरती पर जन्म लिया है। इनमें भी सब जगह खूब सारे लोग ऎसे विद्यमान हैं जो खुद धेला भी खर्च नहीं करना चाहते लेकिन मुफ्त में औरों से काम निकलवाने में माहिर हैं।

ऎसे खूब सारे लोग हमारे आस-पास भी हैं, परिचितों और सम्पर्कितों में भी हैं। और इनसे भी अधिक संख्या में सभी क्षेत्रों में हैं।   ये लोग अपने लाभ के लिए दिन-रात वो सब कुछ करते रहते हैं जिससे उन्हें कुछ न कुछ प्राप्ति होती रहे अथवा इनके काम सधते रहें। न इनका कोई धर्म होता है, न औरों के प्रति संवेदनशीलता, न काम बताने और करवाने का कोई समय, और न ही सामने वाले की परेशानियों या विवशताओं का कोई ख्याल।

ऎसे लोगों पर एक ही भूत सवार होता है कि चाहे जैसे भी हो, उनका काम सबसे पहले निकलना चाहिए, चाहे इसके लिए औरों का समय, शक्ति और धन कितना ही खर्च क्यों न हो जाए। इस किस्म के मुफ्तखोर शातिर सभी स्थानों पर हैं जो लोगों की लल्लो-चप्पो करते हुए कुछ न कुछ हर जगह से हासिल कर लेने की कोशिशों मेें जुटे रहते हैं।

इनमें कई तो अहंकारी होते हैं जो किसी बाड़े में उनकी हरकतों पर हो जाने वाली प्रतिकूल टिप्पणियों पर खफा हो जाते हैं और उस स्थान विशेष तथा इनसे संबंधित लोगों से शत्रुता पाल लिया करते हैं जबकि ऎसे अधिसंख्य मुफ्तखोर हद दर्जे के बेशर्म  और नालायक होते हैं, इन्हें कुछ भी कह दिया जाए, कोई फरक नहीं पड़ता। इन्हें सिर्फ अपने कामों से मतलब है, फिर इन्हें चाहे जो सुना दो।

इस किस्म के लोग अपनी पूरी जिन्दगी में एक भी काम सेवा या परोपकार का नहीं करते, बल्कि ये उन्हीं कामों में हाथ डालते हैं जिसमें कुछ न कुछ मिलने की उम्मीद हो। ये दो कदम चलेंगे, दो बातें करेंगे या किसी के काम आएंगे तो तब ही जब कोई लार टपकने लायक दृश्य सामने हो।

इस किस्म के लोग अपनी ओर से न परिश्रम करना चाहते हैं, न कौड़ी भी खर्च करना, लेकिन पाना सब कुछ चाहते हैं। पूरी की पूरी दुनिया को अपनी मुट्ठी में कर लेने के लिए ये जी तोड़ कोशिशों में जुटे रहते हैं।

इस प्रजाति के लोग दूसरों का कोई सा काम बिना पैसे, उपहार या आमिष-निरामिष पार्टियां लिए कभी नहीं करते, और दूसरों से हमेशा यह अपेक्षा करते रहते हैं कि उनके सारे काम लोग इस तरह करते चलें कि जैसे इन लोगों का अवतरण समर्पित सेवा और परोपकार के लिए ही हुआ हो।

समाज और देश की कैसी विडम्बना है यह कि नुगरों, नालायकों और मुफतखोरियों की अनचाही भीड़ बढ़ती जा रही है और परेशान हो रहे हैं बेचारे वे लोग जो समाज और देश के हितों की रात-दिन चिन्ता करते हुए अपने-अपने कर्तव्यों की पूर्ति में मर-खप रहे हैं।

देश के सबसे बड़े दुश्मन और गद्दार ये ही लोग हैं जो अपने ही अपने स्वार्थ की बातें करते हैं, स्वार्थ पूर्ति के लिए किसी से भी समझौता कर डालते हैं और अपनी तरह के कामचोरों और हरामखोरों के साथ मिलकर उन लोगों पर कहर बरपाते रहते हैं जो लोग ईमानदार, निष्ठावान और सच्चाई से जीने वाले हैं।

ये दुष्ट लोग अव्वल दर्जे के शोषक होते हैं और इनकी जिन्दगी का अधिकांश हिस्सा औरों का शोषण करने में ही गुजरता है।  इस किस्म के लोग यह थाह पाने में अच्छी तरह माहिर होते हैं कि किस आदमी से कौनसा काम कैसे निकलवाया जाए और उसके लिए कौनसा प्रलोभन या दबाव  हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है।

अपना घर भरने और दुनिया भर का माल अपने आँगन में जमा कर लेने से लेकर बैंक बेलेंस बढ़ाने के लिए नीच और पामर भिखारियों से भी गए बीते होकर धौंस और चतुराई से मौज-मस्ती में रमे रहने वाले गुलछर्रे उड़ाते रहने के आदी ऎसे लोग दूसरों से हमेशा यह उम्मीद रखते हैं कि दुनिया के लोग अपने सारे काम-धाम छोड़कर सिर्फ उन्हीं के काम आएं, जैसे कि इस दुनिया के लोग उन्हीं की सेवा-चाकरी के लिए पैदा हुए हैं।

मानवीय संवेदनशीलता, दया, करुणा और उदारता से कोसों दूर ऎसे लोग हमेशा जमाने भर का शोषण करने के इतने आदी हो चुके होते हैं कि इनकी हरकतें औरों के लिए अन्याय, प्रताड़ना और अत्याचार की श्रेणी में आ जाया करती हैं। हर तरह के बाड़ों में ऎसे खुदगर्ज, निर्लज्ज, नालायक और धूत्र्त किस्म के लोगों की सत्ता बनी हुई है जो औरों पर कहर ढाते हुए अपने सारे काम निकलवा लिया करते हैं।

आश्चर्य और विडम्बना यह कि ऎसे लोग समाज जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में खोटे सिक्के और अपनी चवन्नियां चला रहे हैं और लोक प्रतिष्ठ होने का चौला धारण किए हुए हैं।  जो लोग अपने उल्लू सीधे करने के लिए औरों का समय बर्बाद करते हैं, शोषण और अन्याय करते हैं और सिर्फ अपने ही अपने स्वार्थों में रमे रहते हैं ऎसे लोग समाज, क्षेत्र और देश पर भार ही हैं जिनसे न किसी का भला हो सकता है, न ऎसे लोग समाजसेवा या परोपकार के किसी काम में हाथ बँटा सकते हैं।

ऎसे लोगों से सज्जनों, समाज और क्षेत्र को किसी भी प्रकार की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। इन लोगों के लिए किसी भी प्रकार का कोई सा काम करना या इनकी मदद करना ठीक वैसे ही है जैसे कि गाय का दूध दूहकर ईमानदारों पर भौंकने वाले कुत्तों को आदर सहित पिलाना। बच के रहें ऎसे मुफ्तखोरों से, जो न हमारे किसी काम के हैं, न समाज या अपने क्षेत्र के। देश के लिए इनकी भागीदारी की कल्पना तो पागलपन ही कही जा सकती है।

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