परिपूर्णता के लिए जरूरी है महाशून्य

परिपूर्णता के लिए जरूरी है महाशून्य

बात किसी भी प्रकार की ऊर्जा की हो, पदार्थ या विचारों की, इनका पूर्ण सदुपयोग तभी संभव है कि जब इनकी उपलब्धता परिपूर्ण अवस्था में हो। आधे-अधूरे, रिसते रहने वाले या आंशिक रिक्त पात्र में पूर्णता की कल्पना नहीं जा सकती।

परिपूर्णता हर कोई चाहता है तभी तो उसे औरों की आवश्यकता पड़ती है। इसके लिए दूसरे ध्रुव की तलाश सभी को लगी रहती है। यह ध्रुव व्यक्ति, विषय, स्थान या प्रकृति अथवा कोई सा विचार हो सकता है जो हमें पसंद आए।

जहाँ पूर्ण शून्य की अवस्था आती है वहीं पर परिपूर्णता के अवसर उपलब्ध रहते हैं। लेकिन जहाँ आंशिक शून्यता का क्रम बना रहेगा वहाँ परिपूर्णता आना कभी संभव नहीं हो पाता है क्योंकि आधी-अधूरी शून्यता मौलिक न होकर पुरातन ही बनी रहती है जबकि परिपूर्णता के लिए यह जरूरी है कि यह शत-प्रतिशत मौलिक, ताजी और ऊर्जस्वित हो।

इसमें किसी भी स्तर पर और किसी भी अंश में मिलावट का सवाल ही नहीं होता। पूर्ण शून्य जहां हैं वहीं पूर्णता देखी जा सकती है। हर पूर्णता के लिए पहले पूर्ण शून्य अवस्था का होना सबसे पहली और अंतिम शर्त है।

इस रहस्य के विज्ञान को जो समझ लेते हैं वे महाशून्य की स्थितियां पैदा करते हुए परिपूर्णता का आस्वादन करने में समर्थ हो जाते हैं। इस महाविज्ञान को आज समझने की आवश्यकता है। जैसे खीर या रबड़ी बनाने के लिए चाहे कितने ही किलो विशुद्ध दूध कड़ाही में उबालने की तैयारी की जाए किन्तु कड़ाही में यदि कहीं कोई विजातीय द्रव्य चिपका हुआ रह जाने से सारा का सारा दूध फट जाता है।

यही स्थिति इंसान की होती है। इंसान अपने आप में ऎसा पात्र है जो जीवन भर ज्ञान, अनुभवों और व्यावहारिक दीक्षा से भरता रहता है। बहुधा लोग अपने समूहों में, मित्रों, घर-परिवार और रिश्तेदारों में चर्चाओं में रमे रहते हैं लेकिन बातों का क्रम आधा-अधूरा रह जाने से रोजाना मौलिकता और ताजे विचारों का पुराने विचारों और बातों से घालमेल होता रहता है और इस कारण से रोजाना वैचारिक मिलावट बनी रहती है।

इस वजह से इन्हें ताजिन्दगी अधूरेपन या कहीं किसी न किसी प्रकार की कमी रह जाने जैसी अनुभूति होती रहती है लेकिन अन्त तक यह पता नहीं चल पाता है कि आखिर वो मूल बात कौन सी है जिसके कारण उद्विग्नता बनी रहती है और परम शांति एवं संतोष का अहसास नहीं हो पा रहा है।

आजकल हालांकि समय की सबके पास कमी है फिर भी पारस्परिक चर्चाओं और गपियाने, औरों की बुराई और निन्दा करने  की फुर्सत हर कोई निकाल ही लेता है चाहे वह सामान्य इंसान हो या बड़े से बड़ा अभिजात्य वर्ग वाला अथवा पाश्चात्यी संप्रभु।

बतियाने का महारोग आसानी से छूट नहीं पाता क्योंकि यह सामान्य इंसानों की नैसर्गिक महामारी है जिससे वही बच सकता है जिसे समय और अपने जीवन का मोल अच्छी तरह मालूम है अन्यथा अधिकांश लोगों की जिन्दगी का अधिकांश हिस्सा बतियाने और गपियाने, बुराई और निन्दा में ही खर्च हो जाता है।

इतना सारा समय व्यय होने के बावजूद भी हम पूरी तरह खाली नहीं हो पाते हैं, यही हमारी सबसे बड़ी समस्या भी है और दुःख का कारण भी। जब भी हम कोई बढ़िया और बड़ा भवन बनाना चाहते हैं इसके लिए भूखण्ड की पूर्ण साफ-सफाई और पवित्रता के साथ ही विधि विधान से  भूमि पूजन  भी जरूरी होता है।

इस कार्य में थोड़ी सी लापरवाही घातक हो सकती है और बाद में इनका कुफल लोगों को भुगतना पड़ता है। यही स्थिति इंसान के मन और मस्तिष्क की है। तभी शारीरिक और मानसिक शुचिता पर सर्वाधिक जोर दिया गया है। इस शुचिता को पाने के लिए अपने आपको पूरी तरह खुला और खाली करना नितान्त जरूरी है, इसके बगैर इंसानी जीवन के लक्ष्यों को अच्छी तरह नहीं पाया जा सकता।

लोग चाहते तो हैं कि अपने भीतर अनकही बातों, कुढ़ने वाली चर्चाओं, अच्छे-बुरे अनुभवों को किसी न किसी के समक्ष खाली करें और खुद मुक्त हो जाएं। इंसान की पूरी जिन्दगी में केवल वे बातें और विचार ही सबसे बड़े और भारी वजन की तरह महसूस होती हैं जिन्हें वह अपने मन-मस्तिष्क में सायास दबाए रखता है।

जब तक ये भीतर रहेंगे, इंसान का जिस्म सूक्ष्म कब्रगाह के रूप में बना रहेगा, जहाँ केवल दुःख और शोक ही रह सकते हैं, संतोष, जीवनांनद और सुकून नहीं। हर इंसान अपने भीतर दबी-छिपी बातों को बाहर निकाल कर खुद हल्का होना चाहता है किन्तु ऎसे पात्र इंसान नहीं मिल पाते, जिनके आगे वह अपने मन-मस्तिष्क को उण्डेल सके।

हर इंसान रोजाना इस बात के प्रयत्नशील रहता है कि वह खाली हो, पर हो नहीं पाता। खासकर चालाक, धूर्त, षड़यंत्रकारी और घाघ लोग हर पल इस बात के लिए गंभीरता के साथ प्रयास करते रहते हैं कि कोई बात उनके मुँह से निकल नहीं जाए।

इस कारण से ये लोग चुप्पी साधे रहकर अपने आपको धीर-गंभीर बनाए रखने में सफल तो हो जाते हैं किन्तु इस चक्कर में वे उन्मुक्त हँसी, सहजता और सरलता भूल जाते हैं। एक समय बाद यह स्थिति आती है कि इनका पूरा जीवन अवसादी, असहज और कृत्रिम हो जाता है। इनकी शक्ल और बॉडी लैंग्वेज से भी पता चल जाता है कि ये वे गुन्ने लोग हैं जो चतुराई के साथ नकारात्मक काम करने के आदी हैं।

जीवन में उन्मुक्त मुस्कान, आनंद और मस्ती पाने का सबसे श्रेष्ठ उपाय यही है कि कुछ भी छिपाने या दूराव जैसा व्यवहार रखे ही नहीं जिससे कि हमें अपारदर्शी बने रहने का स्वाँग रचना पड़े।

हर मामले में खुला खाता रखें। कुछ ऎसा हो ही नहीं कि जिसे दूसरों से  छिपाने की विवशता हो और हमेशा सशंकित, असुरक्षित व भयग्रस्त रहने की स्थितियां बनी रहें। खुद हमेशा अपने आपको रिक्त बनाए रखें और रिक्तता का स्तर महाशून्य तक होना चाहिए।

औरों की हर बात को सुन-सुनकर इतना अधिक खाली कर दें कि उनके पास बोलने, छिपाने और चर्चा करने को कुछ बचे ही नहीं। एक बार पूर्ण रिक्त कर देने के बाद हम सामने वाले में चाहे जो विचार, संस्कार और ज्ञान भर सकते हैं।

यह परिपूर्णता का स्तर प्राप्त करते हुए स्थायी भाव को प्राप्त कर लेता है।  इसलिए पहले  महाशून्य की स्थिति लाएं। तब जाकर ही परिपूर्णता का आनंद अनुभवित हो सकता है।

खासकर महिलाओं के बारे में यह अनुभूत तथ्य है कि उन्हें जितना बोलती रहें, बिना किसी रुकावट के पूरा समय देते हुए सुनते रहें, एक समय बाद उनके मन में कुछ भी अवशेष नहीं रहेगा, तब उनमें वैचारिक सामग्री भरने का प्रयास करें।

यह स्थायी भाव को प्राप्त करेगी और पारस्परिक विश्वास की प्रगाढ़ता भी अनुकरणीय होगी। आज के जमाने में जो जितना अधिक सुनता है वही विश्वस्त और लोकप्रिय हो सकता है। इसलिए पहले खाली करें, फिर मनचाहे विचारों और सत्य को परिपूरित करें।