मायावी कुत्तायुग
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मायावी कुत्तायुग

कुत्तों को समझने, उनके उपयोग के बारे में जानने और उन्हें आदर-सम्मान एवं श्रद्धा देने का काम हर कोई नहीं कर सकता। ये काम वे ही कर सकते हैं जो कि कुत्तों के प्रजनन और प्रसूति से लेकर इनके जीवनक्रम, व्यवहार, स्वभाव और विशेषताओं से वाकिफ हों।

यह काम किसी सामान्य इंसान के बस का नहीं है। इसके लिए कुत्तों के आस-पास या साथ रहने की, उन पर शोधात्मक अध्ययन और अनुसंधान की तथा कुत्तों की तमाम प्रकार की देशी-विदेशी नस्लों की गहरी जानकारी के साथ ही कुत्तों के असंख्य प्रकार के उपयोगों के बारे में अखूट ज्ञान, अपार अनुभव और कुत्तों के साथ बिताए जाने वाले क्षणों के अनुभवों का जखीरा होना चाहिए।

तभी कहीं जाकर कुत्तों के चाल, चलन और चरित्र की थाह पायी जा सकती है और अपने भीतर उन गुणों और आदतों को विकसित किया जा सकता है जिनकी वजह से कुत्तों का साहचर्य हमारे लिए लाभकारी और आनंददायी होता है।

इस मामले में स्वदेशी और विदेशी कुत्तों के साथ ही संकर नस्ल के कुत्तों के बारे में भी गहन जानकारी एवं शोध का होना जरूरी है।  कुत्ते अपने आप में कैसे भी हों, देशी, विदेशी या संकर नस्ल के हों।

जो इन कुत्तों का उपयोग करना सीख जाता है वही श्वान पिता, श्वान माता, श्वान पालक और श्वान बंधु के रूप में पूजने और आदर देने योग्य है। कुत्तों को खिलाने-पिलाने, उनकी झोली हमेशा भरी रखने और उन्हें आदर-सम्मान एवं श्रद्धा देना ही आज का युगधर्म होता जा रहा है। अन्यथा ये कुत्ते और कुतियाएं कुछ भी कहर बरपाने का सारा इन्तजाम रखते हैं।

दुनिया में यही एक ऎसा जीव है जो हर मामले में फक्कड़ और निहायत बेपरवाह है। उसे इस बात की कभी कोई चिन्ता नहीं सताती कि दूसरे जीव उसके बारे में क्या सोच रहे हैं, क्या कह रहे हैं और क्यों कह रहे हैं।

इसलिए वह अपनी ही मस्ती में पूँछड़ी हिलाता हुआ हर कहीं विचरण करने को स्वतंत्र है। और इनका उन्मुक्त व भयहीन विचरण भी ऎसा कि कभी लगता है रैम्प पर जलवा दिखा रहे हों, कभी शादी के मण्डप में फेरे लगाते हुए और कभी लगता है मार्निंग या इवनिंग वॉक करते हुए प्रतीत होते हैं।

किसी भी मामले में कुत्तों के लिए न कोई पाबंदी है, न मर्यादा। न इन्हें स्वच्छता के किसी अभियान या कानून से बांधा जा सकता है। जिन्दगी भर दिन-रात भौं-भौं कर शांति भंग करते रहें तब भी इन्हें न तो ध्वनि प्रदूषण की किसी धारा में पाबंद किया जा सकता है और न ही शांति भंग के किसी कानून का भय दिखाया जा सकता है। कुत्ते और कुतियाएं भौंकने के लिए स्वतंत्र है क्योंकि इनका जन्म ही इसीलिए हुआ है।

दुनिया भर में यही जीव ऎसा है जो अपनी ही मस्ती में रमा रहता है। उसे न कोई पूछने वाला है, न रोकने-टोकने वाला। उसे पता है कि दुनियावी लोगों का काम उसके बिना नहीं चलने वाला। इसलिए चोर-साहूकारों से लेकर तमाम लोकप्रिय, प्रतिष्ठित और सामान्य से सामान्य डेरे वालों तक के लिए उसकी उपयोगिता स्वयंसिद्ध है।

कुत्तों को अलग रखकर दुनिया की जीवन्तता की कल्पना तक नहीं की जा सकती। यों कहें कि कुत्ते न होते तो ये दुनिया ही न होती। धार्मिक आस्था वाले लोग इसे भैरव का वाहन मानकर पूजते हुए नहीं अघाते।

पुरातन काल से यह माना जाता रहा है कि कुत्ता बिना झोली का साधु है और इसके लिए खान-पान का इंतजाम अपने आप होता रहता है। फिर आजकल तो देशी-विदेशी लजीज पकवानों ने पुराने जमाने के छप्पन भोगों को भी पीछे छोड़ दिया है। आमिष-निरामिष सब प्रकार का सब कुछ माल, द्रव और ठोस आहार उपलब्ध है।

कुत्तों को पता है कि आदमी का माल उन्हीं के लिए काम आने वाला है इसलिए कुत्तों और आदमियों का पारस्परिक प्रेम, अगाध विश्वास और एक-दूसरे के लिए काम आने वाली भावनाओं का ही परिणाम है अब आदमी और कुत्तों के बीच न कोई कौटुम्बिक संबंधी आ पाता है और न ही कोई आत्मीय।

आदमी को निरापद भ्रमण और सुरक्षा के लिए अदद कुत्ते की तलाश हमेशा बनी रहती है और कुत्ते को अपने लिए कोई न कोई आदमी हमेशा चाहिए होता है जो कि उसकी तमाम प्रकार की भरपाई करता रहे।

जितना बड़ा आदमी उसे उतना महंगा और नस्ली कुत्ता चाहिए होता है। कई बार तो आदमी और कुत्तों के महान प्रगाढ़ और अभिन्न संबंधों को देखकर यह लगता है कि पूर्वजन्म का कोई न कोई रिश्ता चला आ रहा है जिसे निभाकर आदमी भी खुश है और कुत्तों की जात भी।

कुत्तों के लिए अपना जीवन इतना अधिक निरापद, मस्त, मनमौजी और उन्मुक्त है कि कुछ कहने की जरूरत नहीं। न इनके लिए समय की पाबंदी है, न काम-काज का कोई सा बोझ। कुत्तों के लिए पूरी दुनिया ही एक सराय है जहाँ जब चाहे परिभ्रमण करते रहें, दिल मानें तब तक बैठे रहें, जी भर जाए तो वहाँ से उठकर दूसरे डेरे की ओर चले जाएं।

कहीं से कोई उलाहना नहीं। कोई आवारा कहे तो कहे, अपने बाप का क्या। इसी सोच को अपना जीवन वाक्य मानकर सारे के सारे कुत्ते धींगामस्ती में रमे हुए हैं। जब दुनिया का सारा वैभव बिना कुछ किए मिल रहा हो, हिलने-डुलने और कुछ करने की जरूरत ही न हो, तो फिर कुत्तों को कहाँ कुछ करना है। घूमो-फिरो और मौज उड़ाओ। समस्या तो उन चन्द कुत्तों को रहती है जिनके लिए खाने-पीने और मौज मस्ती का कोई जुगाड़ नहीं होता। इसी अवस्था को प्राप्त हुए कुत्ते पागल हो जाते हैं और दूसरों को काटने से नहीं चूकते।

और कुत्ते ही क्यों, कुतियाएं भी कहाँ पीछे हैं इस मामले में। फिर जहाँ कुत्तों और कुतियाओं का नापाक गठबंधन या लीव इन रिलेशनशिप हो, अथवा कोई न कोई रहस्यमय गोपनीय संबंध हो, वहाँ तो सारा का सारा बाड़ा ही कुत्ताई हो उठता है।

कुत्तों के हक में भगवान ने कई सारी खासियतें नवाजी हैं। कुत्ते कभी बुरा नहीं मानते। शुद्ध रोटी या ब्रेड खिला दो तब भी खुश। सड़ा-गला डाल दो तब भी खुश। मुफ्त का माल उड़ाने का ठेका दुनिया के कुत्तों ने ही तो ले रखा है।

अपने ग्रह-नक्षत्र और अनिष्टकारी शक्तियों के निवारण के लिए अपने ऊपर से उतारा कर खिलाते रहो, तब भी खुश। कुत्तों की जेब नहीं होती इसलिए इनकी मजबूरी होती है कि दूसरों के पैसों से भी खाएं-पियें और मौज उड़ाते रहें।

अब यह मिथक भी करीब-करीब टूट चुका है कि कुत्ते स्वामीभक्त या स्वामिनीभक्त होते हैं। आदमी की जात का झूठन खा-खाकर अब ये किसी के नहीं रहे। अब कुत्ते उसी के होकर रह जाते हैं जो खिलाए-पिलाये, कुत्तों की सुने और दूसरों को सुनाता रहे।

दुनिया भर के तमाम प्राणियों के बीच सर्वाधिक बदलाव आया है तो वह कुत्तों में ही। कुत्ते अब किसी के बस में नहीं रहे। कुत्ते अब अपने बस में भी नहीं रहे। कुत्ते असल में कुत्ते ही नहीं रहे, इससे भी कई गुना ऊपरी स्तर को पा गए हैं कुत्ते।

अब कुत्तों को बिना झोली का साधु कहना अटपटा लगता है।  सच पूछा जाए तो कुत्ते अब सब कुछ हो गए हैं। बिना कुत्तों के कुछ नहीं होता आजकल। लगता है कि जैसे कुत्ता युग ही आ गया है।

समय आ गया है कि जब कुत्तों का सार्वजनिक महिमा मण्डन करें। वो दिन भी दूर नहीं जब कुत्तों और कुतियाओं की मूर्तियाँ लगनी शुरू हो जाएंगी। जो कुत्ता पुराण को पढ़ेगा, सुनेगा और मनन करेगा, उस पर भगवान भैरवनाथ की आकस्मिक कृपा बरसेगी।

2 comments

  1. Shakuntala Sharma

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