ज्ञान और अनुभवों के महासागर हैं हमारे बुजुर्ग

समाज और क्षेत्र में ज्ञान और अनुभवों का एक बहुत बड़ा मोबाइल भण्डार हमारे आस-पास ऎसा पसरा हुआ है जिसके प्रति हमें न जानकारी है, न हम उनका लाभ लेना चाहते या जानते हैं।

वर्षों तक समाज-जीवन और परिवेश के विभिन्न क्षेत्रों में अपने ज्ञान और अनुभवों का कोष समृद्ध कर चुके खूब लोग हमारे करीब हुआ करते हैं लेकिन हमें उनकी उपयोगिता का भान नहीं है वरना इनका संरक्षण और मार्गदर्शन पाकर समाज कई मामलों में अपनी रफ्तार बढ़ा सकता है तथा समाज और अपने इलाके की कई सारी नहीं बल्कि तमाम समस्याओं का खात्मा इनकी मौजूदगी और निर्देशन मात्र से हो सकता है। वहीं समाज को नई दिशा और उन्नत दशा दिलाने में इस अनुभवी शक्ति समूह का प्रभावी योगदान हासिल किया जा सकता है।

लेकिन यह हमारा दुर्भाग्य है कि हम इस शक्ति केन्द्र को न पहचान पा रहे हैं, न इनसे कुछ हासिल कर पा रहे हैं।  हम अपने सम सामयिक ज्ञान, आविष्कारों, उपकरणोंं और यांत्रिक क्रियाओं के साथ ही खुद के अहंकार की वजह से इतने फूले हुए हैं कि हमें उन बुजुर्गों की परवाह नहीं है बल्कि हममें से काफी सारे लोग उन्हें उपेक्षित करते हुए चल रहे हैं।

समझदार और संस्कारवान लोगों को छोड़ दिया जाए तो काफी सारे लोग अपने बुजुर्गों को सिर्फ भार मानकर ही चल रहे हैं। बुजुर्गों को जैसा सम्मानजनक माहौल मिलना चाहिए वैसा मिल नहीं रहा।

जिन लोगों ने पीढ़ियों से लेकर कुटुम्ब, समाज और देश के निर्माण में अपने पूरे जीवन को झाेंक दिया, उनसे हम कुछ प्राप्त कर पाने को अपनी हीनता समझ रहे हैं, इससे बड़ा दुर्भाग्य हमारा, समाज और देश का और कुछ हो ही नहीं सकता।

आज इस अुनभवी पीढ़ी का उपयोग समाज और देश की विभिन्न रचनात्मक गतिविधियों में होने लगे तो हम कहां से कहां पहुंच जाएं। उन बुजुर्गों के बारे में हम बात नहीं कर रहे हैं जो रिटायरमेंट के बाद फिर से नौकरियों में जा घुसे हैं और जिनकी कामना है कि उनकी मौत भी हो तो उन बाड़ों में जहां वे नौकरी कर रहे हैं, और जब ऊपर जाने का वक्त आए तब हाथ में और कुछ नहीं तो तनख्वाह ही रखी हो ताकि आत्मा भटकती ही न रह जाए। और कंधे भी हों तो उन युवाओं के जो हमारी नौकरी की भूख के आगे बेरोजगार होकर इधर-उधर भटकने को विवश हैंं।

समाज का बहुत बड़ा बुजुर्ग वर्ग ऎसा है जो नौकरियों की परवाह नहीं करता बल्कि स्वान्तः सुखाय और स्वाभिमानी जिंदगी जी रहा है। इन लोगों को थोड़ा सा आत्मीय आदर और सम्मान मिल जाये तो वे समाज के लिए बिना किसी पारिश्रमिक की कामना से बहुत कुछ ऎसा कर सकने का सामथ्र्य रखते हैं जो रचनात्मक कर्मयोग का नवीन इतिहास रच सकता है।

हमें अपने आपके ज्ञानी, समर्थ और अनुभवी, उच्च शिक्षित, उच्च पदस्थ और वैभवशाली होने का अहंकार त्यागना होगा तभी समाज के बुजुर्गों का सान्निध्य प्राप्त कर सकते हैं। समाज और देश की तरक्की को पंख लगाने के लिए यह जरूरी है कि ज्ञानवान और अनुभवों से भरपूर हमारे अपने इन बुजुर्गों को योजनाओं, कार्यक्रमों, आयोजनों और सभी प्रकार की रचनात्मक गतिविधियों में सीधी और सम्मानजनक सहभागिता के अवसरों से जोड़ा जाए ताकि इनकी सेवाओं का लाभ सभी को प्राप्त हो सके।

समाज और देश के लिए बुजुर्गों की अहमियत रही है, और रहेगी। इस दृष्टि से जहाँ कहीं ये बुजुर्ग संगठित हैं या बुजुर्गों के असंगठित क्षेत्र हैं उनका योगदान पाने के लिए हमें आगे आना चाहिए ताकि देश का बहुत बड़ा समर्थ वर्ग भी अपनी निष्काम, निस्पृह और समर्पित भागीदारी अदा कर सके।

विभिन्न प्रकार के आयोजनों में अक्सर यह देखा जाता है कि जितने लोगों को निमंत्रण दिया जाता है उनमें से आधे से भी कम लोग पहुंचते हैं, यदि खाने-पीने या उपहारों का प्रबन्ध न हो तो। जबकि इन आयोजनों में पेंशनर समाज, बुजुर्गो के संगठन तथा अपने क्षेत्र के बुजुगोर्ंं को आमंत्रित किया जाए तो उनकी भागीदारी सौ फीसदी होनी संभव है। जहां उनके आत्मस्वाभिमान की रक्षा होगी, सम्मान मिलेगा, वहाँ इन बुजुर्गों को आनंद भी आएगा तथा पूरे मन से काम भी करेंगे।

इसके साथ ही एक ही स्थान पर सभी वर्गों, क्षेत्रों और विशिष्ट विधाओं के शिखरपुरुषों का समागम भी अपने आप में आयोजनों को विशिष्ट और बहुरंगी बना देता है। समय रहते अपने बुजुर्गो का हम ख्याल नहीं करेंगे तो परंपरागत ज्ञान, अनुभव और विशिष्ट हुनरों का संवहन नई पीढ़ी तक नहीं हो पाएगा और धीरे-धीरे सृष्टि के लिए महत्त्वपूर्ण रहा यह सारा ज्ञान और अनुभव अपने आप समाप्त हो जाने वाला है।

इसलिए समाज की रचनात्मक गतिविधियों में बुजुर्गो की यथासंभव उपयुक्त भागीदारी रखें और बुजुर्गो के लिए वर्तमान युवा तथा प्रौढ़ पीढ़ी सुविधादाता के रूप में आगे आए। ऎसा होने पर बहुआयामी तरक्की की गति कोई रोक नहीं सकता। मीठे पानी के झरने हैं हमारे सामने, और हम प्यास के मारे रो रहे हैं।

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