कद को प्रभावित करते हैं स्थानिक कारक

आदमी जैसा आया है, जो है वैसा ही रहता है। निरंतर कठोर परिश्रम से प्राप्त उपलब्धियों वाले आदमी जहाँ रहते है वहीं कर्म क्षेत्र को अपने अनुकूल स्वरूप प्रदान कर वहीं स्वर्ग बना लेते हैं। उनके लिए स्थान का कोई ख़ास महत्व नहीं होता। इनके लिए उनका अपना निश्छल कर्मयोग ही प्रत्येक स्थान पर भारी रहता है और इसकी गंध बरसों बाद तक महसूस की जाती रहती है।

सच्चे कर्मवीर देश, काल व परिस्थितियों से ऊपर उठकर काम करते हैं। इनके पास मौलिक हुनर के साथ ईश्वरीय कृपा भी अटूट और अखूट होती है। फिर इनके लोकमंगलकारी कार्यों व सद्भावी व्यक्तित्व की वजह से सभी की दुआएं भी खूब मिलती रहती हैं। असल मे ये ही इनकी पूंजी होती है।

इन बहुआयामी ऊर्जाओं के ही फलस्वरूप ऎसे लोगाें के लिए अनवरत रचनात्मक कर्म करते रहना ही जीवन का लक्ष्य बना रहता है। इन दृढ़ संकल्पों और प्रगाढ़ आत्मविश्वास के रहते न कोई स्थान विशेष इन्हें प्रभावित कर पाता है, न समय। और न ही परिस्थितियां।

ये जहाँ रहते हैं वहॉं हर परिस्थिति में खुद ढल जाते हैं व प्रसन्नता के साथ तमाम कठिनाइयों को चुनौती के रूप में स्वीकार भी कर लेते हैं। इन सभी प्रकार के अच्छे-बुरे व सम-विषम हालातों में समन्वय बनाये रखने वाले लोग समरसता भाव, सहिष्णुता, धैर्य, परहितपोषी और निरंहकारी रहते हैं।

ये लोग बडे़ ओहदों पर होने के बावजूद छोटी जगह पर रहें अथवा छोटे ओहदों को धारण करते हुए बड़ी जगह पर रहेंं, ये स्थान विशेष की हवाओं की नेकचलनी या बदचलनी से अप्रभावित रहते हैं क्योंकि इन्हें अपनी मर्यादाओं की परिधि का मान और भान हमेशा बना रहता है।

यह असीम आत्मतुष्टि ही इन्हें हमेशा आनन्ददायी और स्फूर्तिमान बनाये रखती है। इसके विपरीत काफी संख्या में ऎसे-ऎसे लोग पैदा हो गए हैं जो अधजल गगरी बने हुए जहाँ-तहाँ छलकते रहकर अपने होने का प्रमाण दर्शाते रहने को विवश हैं। इनके जीवन में न मर्यादा रहती है न समत्व या दूसरों के प्रति संवेदनशीलता या परोपकार का भाव।

ऎसे लोग अपनी उच्चाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। इनमे बडे़ ओहदेधारी किसी छोटे स्थान पर लगा दिए जायें तो इनका हर दिन असंतोष के साथ उगता है। ऎसे में ये न खुद के काम ढंग से कर पाते हैं न औरों के। किसी छोटे स्थान विशेष में समृद्धि या आकर्षण का कोई केन्द्र हो तब अपवाद कहा जा सकता है वरना ये रोजना कुढ़ते रहकर दिन काटते है।

दूसरी अवस्था में इस किस्म के आदमी अपनी हैसियत से ज्यादा ओहदा पा जाएं अथवा किसी बडे़ स्थान विशेष में लगा दिए जाए तब इनकी असलियत कुछ और ही हो जाती है। बड़े स्थलों पर पहुँचकर ये लोग अपने आपको बड़ा आदमी या बड़ा साहब महसूस करने लग जाते हैं और अपने चारों तरफ हमेशा इसी मायावी महानता भरे इन्द्रजाल का आभामण्डल बुनते रहते हैं।

बड़े स्थान विशेष पर होने वाले ये लोग फिर उन पर भी हुकूमत करने की कोशिश करने लगते है जो छोटे स्थलों पर तैनात हैं और उनसे ऊँचे ओहदों पर होने के साथ ही अधिक योग्यताधारी पात्र जन हैं।

बड़े स्थलों में पहुंचकर अचानक बड़े हो जाने वाले ये लोग अपने कई-कई किरदारों में जीने लगते हैं। कभी ये संरक्षक या भाई-बहन का सम्बंध बनाकर नसीहत देने लगते हैं, कभी महानतम विशेषज्ञ और चिंतक के रूप में उपदेश झाड़ने लग जाते हैं, और कभी बॉस की भूमिका में डाँटने डपटने या घुट्टी पिलाने।

आमतौर पर होता यही आया है कि भौगोलिक लिहाज से बड़े व अपेक्षाकृत विकसित स्थल विशेष पर पहुंचे या रह रहे बहुसंख्य ऎसे लोग अपने से निम्न क्षेत्रों के लोगों को अपने से कम ही आँकते हैं व व्यवहार भी उसी अनुरूप करते हैं। भले ही सामने वाला कितना ही बड़ा और समर्थ क्यों न हो।

इन बड़ों को अपने कर्मस्थलों पर भी बडप्पन दिखाते देखा जा सकता है। बडे़पन को अंगीकार करने वाले आदमियों की फितरत कहें या बड़े शहरों या महानगरों की हवाओं की असर, कुछ बिरलों को छोड दिया जाए तो अधिकांश बड़ों का व्यवहार, स्वभाव और कर्म इतना अधिक बदल जाता है कि इन्हें देखकर लगता है कि मुखौटों के जंगल में आ गए हों या फिर बहुरूपियों की बस्तियों में, जहाँ हर कोई अभिनय का बादशाह होता है और इनके अलावा हर किसी को निरीह एवं मात्र दर्शक या रसिक।

आम तौर पर यह भी देखा जाता है कि कई स्थानों पर बहुत योग्य, प्रतिभाशाली और मेधावी लोग स्थान विशेष के नकारात्मक प्रभावों के कारण अपने आपको व्यथित महसूस करने लगते हैं, काम में मन नहीं लगता और प्रतिष्ठा हानि होने लगती है। इसके दो कारण हैं। एक तो स्थान विशेष की नकारात्मकता और दूसरा उस स्थान पर रहने और काम करने वाले लोगों की नकारात्मकता और व्यभिचारी मनोवृत्ति।

बहुधा किसी भी स्थान पर चोर-डकैत और बेईमान-भ्रष्ट, लम्पट और पैशाचिक वृत्तियों वाले लोग लम्बे समय तक विद्यमान रह जाते हैं तब उनकी वजह से नकारात्मकता का प्रभाव बढ़ने लगता है और इसका असर यह होता है कि वे स्थान दूषित-प्रदूषित हो जाते हैं और फिर वहाँ कोई भी कर्म श्रेयस्कर नहीं हो पाता बल्कि हर प्रकार का कर्म प्रतिष्ठा हानि करने लगता है और जो भी अच्छे लोग वहाँ रहते हैं वे अपने आपको दुःखी और फंसा हुआ महसूस करते हैं। आजकल इस प्रकार की स्थितियां खूब देखने में आ रही हैं।

इसी प्रकार अपना कक्ष अर्थात कर्मकक्ष अपने कद के अनुरूप विस्तार वाला होना चाहिए। यदि हमारा कद बड़ा है, प्रभाव व्यापक है तो हमारे लिए बड़ा कक्ष होना जरूरी है। यदि हमारा कक्ष बड़ा नहीं होगा तब हमारे आभामण्डल का टकराव दीवारों से होने लगता है और यह हमें नुकसान पहुंचाता है। इसलिए वैश्विक चिन्तन और व्यापक कर्मक्षेत्री लोगों को चाहिए कि वे अपने लिए बड़ा कक्ष रखें। जबकि छोटे कद वाले, कामचोर और निकम्मे लोगों के लिए संकीर्ण परिधियों वाला कर्म कक्ष होना चाहिए अन्यथा उन्हें नुकसान होगा।

स्थान, कक्ष और धरती का प्रभाव हर किसी पर पड़ता है। इसलिए इन कारकों के बारे में विशेष जाँच-पड़ताल कर लेने के बाद ही कर्म की धाराओं को तय करने की आवश्यकता है।

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