स्वर्णकाल है ग्रहण,   लाभ लें, सिद्धि पाएँ

स्वर्णकाल है ग्रहण, लाभ लें, सिद्धि पाएँ

ग्रहण कोई सामान्य खगोलीय घटना नहीं है बल्कि पिण्ड से लेकर ब्रह्माण्ड तक में महापरिवर्तन लाने वाली वह स्थिति है जिसमें सृष्टि और संहार के बीज पैदा होते हैं और समय पाकर जिनका अंकुरण होता है और इसके बाद प्राकट्य व दिग्दर्शन।

इंसान के जीवन के लिए ग्रहण वह घटना है जिसका उसके अंग-प्रत्यंग और हर अवयव पर असर पड़ता है। प्रकृति, पिण्ड और परिवेश के सूक्ष्म से लेकर स्थूल सभी प्रकार के तत्व ग्रहण से प्रभावित होते हैं।

ग्रह-नक्षत्रों से लेकर सभी प्रकार के जीवन्त और जड़ पिण्ड तक पर इनका असर पड़ता है। ग्रहण काल के ज्योतिषीय और धार्मिक प्रभावों को एक तरफ रखकर हम साधना पक्ष से विचार करें तो ग्रहण ऎसा समय होता है जब इसमें पिण्ड की किसी भी हरकत का प्रभाव ब्रह्माण्ड में और ब्रह्माण्ड की किसी भी हलचल का प्रभाव पिण्ड मेंं देखा और अनुभव किया जा सकता है।

यह वह समय है जब पिण्ड और ब्रह्माण्ड के बीच का संबंध सातत्य अपने चरम यौवन पर रहता है और संकल्प-विकल्प की तरंगों का व्यापार निरापद और निर्बाध रूप से संचरित होता है। चाहे सूर्यग्रहण हो या चन्द्र ग्रहण, दोनों का साधना की दृष्टि से बड़ा ही महत्व है।

तंत्र-मंत्र और यंत्र सिद्धि इस दौरान पूरी तरह फलीभूत होती है क्योंकि इस समय उपासक और उपास्य के बीच कोई अवरोध नहीं होता। उपासक जो कुछ उपासना करता है वह सीधे उपास्य देव या देवी तक पूरी की पूरी मात्रा में पहुंचता है।

इस काल में जो कुछ साधा जाता है वह अगले ग्रहण तक अक्षत और अक्षय बना रहता है और यही कारण है कि ग्रहण काल को सिद्धि प्राप्ति का सर्वोत्तम काल माना गया है। केवल मंत्र सिद्धि की बात करें तो मंत्र कोई सा हो इसके सिद्धि करने के लिए उपयुक्त समय की आवश्यकता होती है और ग्रहण से बढ़कर और कोई समय हो ही नहीं सकता।

मंत्र सिद्धि के लिए सबसे पहले मंत्र को जगाना पड़ता है और इसके लिए मंत्र का पुरश्चरण अनिवार्य है। मंत्र कोई सा हो, वह तभी जगता है कि जब उसके जितने अक्षर हैं उतने लाख जप किए जाएं और फिर उसका दशांश हवन, उसका दशांश तर्पण, उसका दशांश मार्जन और इसका दशांश ब्रह्मभोज होना जरूरी है।

यह सब न किया जा सके तो मंत्र के कुल जप करने के बाद इसका दसवाँ हिस्सा मंत्र फिर जप लें। इससे हवन, तर्पण, मार्जन और भोज आदि की जरूरत नहीं होती। पुरश्चरण हो जाने पर वह मंत्र जग जाता है।

इसलिए साधना से पहले अपने ईष्ट मंत्र के अक्षरों की गिनती कर लें। जितने अक्षर हैं उतने लाख मंत्रों के जप कर लेने पर ही मंत्र सिद्ध हो पाता है अन्यथा वह मंत्र कभी सिद्ध नहीं होता, सिद्धि देना तो दूर की बात है।

एक बार कोई सा मंत्र सिद्ध हो जाने के बाद दूसरे सारे मंत्र सहज स्वाभाविक रूप से कम संख्या में जप करने से ही सिद्ध हो जाते हैं और अपना प्रभाव दिखलाते रहते हैं। मंत्र सिद्धि का असर होने पर मूलाधार से लेकर सहस्रार चक्र तक सुषुम्ना मार्ग की सारी बाधाएं दूर हो जाती हैं और इसके बाद मंत्रों का शरीर और परिवेश पर प्रभाव दिखना आरंभ हो जाता है। गायत्री मंत्र 24 अक्षरों का, महामृत्युंजय मंत्र 52 अक्षरों का है और इसी प्रकार खूब सारे मंत्र हैं जिनके अक्षरों की संख्या न्यूनाधिक है।

मंत्र सिद्धि और शारीरिक-मानसिक शुचिता एक  बार प्राप्त हो जाने के बाद सुषुम्ना मार्ग खाली हो जाता है और मूलाधार से लेकर सहस्रार चक्र तक किसी प्रकार का कोई अवरोध नहीं रहता।  यही कारण है कि समझदार साधक लोग अपने जीवन में सिद्धि और आनंद प्राप्त करने के लिए एक बार कोई सा छोटा मंत्र प्राप्त कर उसी का पुरश्चरण कर डालते हैं।

जैसे कि प्रणव मंत्र ॐ। इसका सवा लाख जप कर देने से यह सिद्ध हो जाता है। एक बार कोई सा मंत्र सिद्ध हो जाए तो शेष सारे मंत्र बहुत ही मामूली संख्या में जपने मात्र से सिद्ध हो जाते हैं।  इसी प्रकार राम मंत्र सवा दो लाख कर देने से यह सिद्ध हो जाता है।

आम लोक जीवन में तब तक शांति, आनंद और सुकून पसरा हुआ रहता रहा जब तक कि राम-राम का अभिवादन व्यापक स्तर पर जारी रहा। आज इसमें कमी आयी है जबकि असली बात यह है कि राम-राम केवल अभिवादन या संबोधन का प्रकार ही नहीं है बल्कि जीवन निर्वाह के लिए सिद्धि मंत्र है।

ग्रहण काल में जिस किसी छोटे-बड़े मंत्र के जप कर लिए जाएं, उसके पुरश्चरण का लाभ मिल जाता है। जैसे कि कोई गायत्री मंत्र कर ले तो उसे 24 लाख जप की ताकत प्राप्त हो जाएगी, महामृत्युंजय मंत्र जप ले तो उसे 52 लाख के बराबर जप की ऊर्जा प्राप्त हो जाएगी।

इस तरह ग्रहण काल अपने जीवन का वह स्वर्णिम काल है जिसके माध्यम से हम कम समय में इतनी अधिक मंत्र शक्ति और सिद्धि प्राप्त कर लिया करते हैं।

ग्रहण काल को व्यर्थ न जाने दें अन्यथा पछतावे के सिवा कुछ नहीं रहने वाला। बहुत से लोग ग्रहण की उपेक्षा करते हैं और ऎसे लोग जिंदगी भर दरिद्री और दुःखी रहते हैं। आमतौर पर लोग भगवान की उपासना, साधना और भक्ति से लेकर मंत्रों और सिद्धियों पर शंका करते हैं कि इनका कोई प्रभाव नज़र नहीं आता।

इसके बाद ये लोग मंत्रों और भगवान की शक्तियों पर शंका करने लगते हैं। इन मूर्ख और नासमझ लोगों को कौन यह समझाए कि हम जो रोजाना जो साधना करते हैं, जिन मंत्रों और स्तुतियों आदि का पाठ करते हैं उन सभी की कम से कम एक बार ग्रहण में पुनरावृत्ति होनी जरूरी है अन्यथा ये मंत्र-तंत्र, स्तुतियां, जप आदि सब कुछ निष्प्रभावी ही रहते हैं।

फिर साल भर चाहे कुछ किया जाए उसका कोई प्रभाव नहीं पड़ता। हमारी साधनाओं और भक्ति की असफलता का यही एकमात्र कारण है। अपने जीवन की समस्याओं, इच्छाओं आदि की प्राथमिकता निर्धारित करें और उसी के अनुरूप मंत्रों का जप ग्रहण में करें। इससे कार्यसिद्धि में त्वरित और आशातीत सफलता प्राप्त होगी, इसमें कोई संदेह नहीं।

ग्रहणकाल के महत्व को जानें तथा इस समय का भरपूर उपयोग करें। लौकिक और अलौकिक लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए ग्रहण स्वर्णकाल से भी बढ़कर है। ग्रहण के सारे नियमों का पालन करते हुए अपने जीवन को नई और सुनहरी दशा और दिशा प्रदान करें।