धरती चाहती है अपना श्रृंगार …

धरती चाहती है अपना श्रृंगार …

हमारे हाथ से रोपा गया पौधा यदि सुरक्षित पल्लवित हो जाए, तभी समझें हम पुण्यशाली हैं। अन्यथा साहस के साथ यह मान लें कि हम पापी ही हैं।

जो लोग गप्पे लगा सकते हैं वे पेड़ कभी नहीं लगा सकते क्योंकि गप्पे हाँकने वाले मायावी दुनिया को लक्ष्य मानते हैं और पेड़ लगाने में रुचि रखने वाले प्रकृतिस्थ, प्रकृति और पर्यावरणप्रेमी।

पर्यावरण और वृक्षारोपण पर दस मिनट भाषण झाड़ने से अच्छा है उस समय का सदुपयोग करते हुए 10 पेड़ लगाना।

क्यों न पर्यावरण दिवस की पूर्व संध्या पर हम संकल्प लें कि न मंच होगा, न स्वागत-सत्कार, न भाषणबाजी, जो आएगा वो पूरे समय पेड़  लगाएगा और जितने समय कार्यक्रम चलेगा पूरा का पूरा पौधारोपण के नाम समर्पित रहेगा।

बरसों से हम भाषण सुनते-सुनाते आ रहे हैं। अब तो छोड़ों इन चोंचलों को। जमीनी हकीकत को धारण करने की जरूरत है।

भाषणों की खाद से पेड़ न पनपते हैं न बड़े होते हैं। इस सत्य को हम कब समझेंगे?