कभी नगाड़े, कभी ढपोड़शंख

आजकल किसी भी कर्म का किसी भी प्रकार का आंशिक या पूर्ण सुकून कोई भी प्राप्त नहीं कर पा रहा है। कारण साफ है कि न कर्म में शुचिता रही है न वाणी में।

कर्म और वाणी सब में झूठ और फरेब का घालमेल हो गया है। आदमी करता क्या है और कहता क्या? आदमियों की तमाम प्रकार की किस्मों और पुरातन-नूतन मार्कों के बीच एक किस्म ढपोड़शंखों की है, जो न कुछ करते हैं, न किसी के काम आ सकते हैं।

इनका  एक ही काम है – लोगों को भ्रमित रखना, झाँसे देना और अपना टाईम मौज-मजे से पास करना। सामान्य जिन्दगी जीने वाला एक आम आदमी भोला और सच्चा होता है।

वह किसी के काम में टांग नहीं अड़ाता, अपनी चाल चुपचाप चलता रहता है और जो उससे बन पड़ता है उसे ही स्वीकारता और कहता है। लेकिन अभिजात्य वर्ग की देन बन चुके बहुत से लोग अपने आपको दिखाते भले ही माधुर्यपूर्ण, आत्मीय और सद्भावी, सहयोगी एवं सम्बलदायी हैं, लेकिन इनका चाल-चलन और चरित्र ठीक इसके उलट होता है।

खासकर बड़े और समर्थ कहे जाने वाले लोगों में यह अधिक देखा गया है। वे सभी को भरमाने की कला में इतने अधिक माहिर हो गए हैं कि यह इनके लिए जिन्दगी का वह अहम हिस्सा होकर रह गया है कि जिसे वे किसी दिन न अपना सकें तो बीमार होकर आईसीयू में ही चले जाएं।

बहुत से हैं जो लोगों को रोजाना भरमाते रहते हैं, कितनों को उल्लू बनाते रहते हैं। हर काम के लिए सहयोगी बनने और काम पूरे कर देने के झाँसे इतने अधिक देते रहते हैं कि लोग उल्लू बन जाया करते हैंं।

इनकी पूरी जिन्दगी बाहर से ऎसी दिखती है जैसे कि धरती के ये ही कल्पवृक्ष हों जो कि सभी की मनोकामनाएं निरपेक्ष भाव से पूर्ण कर दिया करते हैं और लोक प्रतिष्ठ ऎसे कि कोई इनकी झाँसेबाजी पर शक ही नहीं कर सके।

किसी का कोई काम नहीं करेंगे लेकिन डींगे ऎसी हाँकेंगे कि जैसे इनके बिना कोई पत्ता तक नहीं हिलता, कोई फाईल तक आगे नहीं सरक पाती। भ्रम इस कदर फैलाये रखते हैं कि ये फूँक मारते हैं तभी जंगलराज में कोई फाईल आगे सरकती है और परिणाम लेकर ही लौटती है।  और ये चाबुक न मारें तो नीम बेहोशी में होने का नाटक करते हुए ख्वाबों में खोये हुए घोड़े उठने का नाम न लें, चलने और दौड़ने की तो बात ही नहीं।

बड़े-बड़े और प्रतिष्ठित पदों पर बैठने वाले लोगों की यही दशा है। ढेर सारे ऎसे हैं जो चाहे कितने बड़े ओहदे पर बैठे हों, हाथी या घोड़ों की पालकी में बिराजमान रहा करते हों, सूरज से घबराकर सुपर एयरकण्डीशण्ड, विवाह मण्डप की तरह सजे-धजे कक्ष में खूबसूरत और महंगी व्हीलचेयर में धँसे और कृत्रिम  रोशनी में चमक-दमक दिखा रहे हों, मगर इन्हें कोई नहीं पूछता।

बावजूद इसके ये लोग चिल्ला-चिल्ला कर और झल्लाकर दर्शाते ऎसे हैं जैसे कि वे ही भाग्य विधाता हों और जो कुछ हो रहा है वह उन्हीं के रहमों करम पर हो रहा है।

अब तकरीबन तमाम प्रकार के गलियारों, बाड़ों और अजायबघरों में ढपोड़शंखों का बोलबाला है। जिस अनुपात में इनका वर्चस्व देखा जा रहा है उतनी ही प्रतिस्पर्धा भी।

लगता है जैसे कि सब तरफ ढपोड़शंखों की मैराथन दौड़ हो रही हो। ढपोड़शंखों में भी गलाकाट प्रतिस्पर्धा और ऊखाड़-पछाड़ का माहौल हर क्षण बना रहता है।

हर ढपोड़शंख चाहता है कि वही अपने भाग्य विधाता की निगाह में बना रहे और उसी की चलती रहे। लोग सच जानना और सुनना चाहते हैं और ये ढपोड़शंख हैं कि लोगों को झूठ बोल बोल कर, झाँसे में रखकर अपने उल्लू सीधे करने और उल्लू के पट्ठों की चापलुसी भरी मेजबानी में पारंगत हो गए हैं।

इन्हें लगता है कि इनकी जिन्दगी केवल अपने नम्बर बढ़ाते हुए राजसी वैभव और मुफतिया भोग-विलास पाने के लिए ही है और इसलिए ये दूसरे सभी लोगों को अपने सहकर्मी, आत्मीय, सहधर्मी और हमसफर नहीं मानकर अपने दास और नौकर-चाकर मान कर उनसे मनचाही सेवा लेने को अपना पहला धर्म मानने लगे हैं।

झूठन चाटते हुए झूठ बोलने और लोगों को भरमाते रहने की सत्रहवीं कला में इनका कोई मुकाबला नहीं। इन झूठे, धूर्त और मक्कार ढपोड़शंखों  को न ईश्वर से भय है, न न्याय, धर्म या नीति से।

मूल्यों, सिद्धान्तों और आदर्शों के संस्कार इन लोगों को शायद पीढ़ियों से नहीं मिले, तभी तो ये स्वच्छन्द, स्वेच्छाचारी और उन्मुक्त होकर छलांगें लगाते हुए औरों को उखाड़ने और पछाड़ने के तमाम हथकण्डों और करतबों में माहिर हैं।

ढपोड़शंखों का जबर्दस्त जमावड़ा और उन्हीं के चर्चों की बदौलत हो रहा नगाड़ा नाद शंखासुर की याद दिलाता हुआ कह रहा है कि अब एक नहीं असंख्य शंखासुर हो गए हैं और इनके सामने टिक पाना किसी के बस में नहीं।

हर ढपोड़शंख नगाड़े की तरह गूंजने लगा है और उसके साथ ही साथ दूसरे छोटे-बड़े शंखासुरी खोल भी यही करने लगे हैं। लोग बेचारे कितने अधिक भोले और भ्रमित हैं जो कि उन ढपोड़शंखों की बातों में आ जाते हैं जो खुद के सिवा किसी दूसरे का न अच्छा कर सकते हैं न भला ही।