कामचोरों की ढाल है बहानेबाजी

अक्सर लोगों को कहते हुए सुना जाता है – खूब काम है, काम का पार नहीं है, ओवर बर्डन है, इतना काम है कि मरने तक की फुर्सत नहीं है, हम पर ही है सारा काम, स्टाफ ही काफी कम है, हमें ही करना पड़ता है, सभी का काम हमारे मत्थे ही है, दूसरे लोग कुछ नहीं करते, कितना काम करें, मर जाएं क्या … आदी-आदी।

काम-धंधे वाले तकरीबन सभी स्थलों पर इन जुमलों के सहारे जिन्दगी काटने वाले बहुत सारे लोग हैं जिनके जीवन में इन वाक्यों का हजारों-लाखों बार इस्तेमाल होता  रहा है। 

खूब काम है, खूब काम है, कहने वाले लोगों की कहीं कोई कमी नहीं। और अब तो ऎसे लोगों में निरन्तर बढ़ोतरी होती जा रही है। जब से लोगों को यह मालूम चल गया है कि इन जुमलों का इस्तेमाल कर मस्ती के साथ जिया जा सकता है, लोगों की सहानुभूति प्राप्त की जा सकती है और अपने आपको सारे कामों से बरी रखा जा सकता है, तब से तो इस प्रजाति के लोगों की बाढ़ ही आ गई लगती है।

यह कहना कुछ हद तक सही भी हो सकता है कि कई स्थानों पर लोग कम हैं और काम ज्यादा। लेकिन अधिकांश मामलों में ऎसा नहीं होता। बहुत सारे बाड़ों में काम करने वाले लोगों की यह पक्की और स्थायी मानसिकता ही हो गई है कि जितने कामों को दूर रखा जा सके, अपने मत्थे मण्डने से बचा जा सके, खो किया जाकर दूसरों के पाले में डाला जा सके, उन कामों को चतुराई से दूसरी ओर खिसका दो, और खुद मस्त एवं मुक्त रहो।

जो लोग खूब काम होने की बात कहते हैं, अपने आपको महान कर्मयोगी और समर्पित होने का स्वाँग रचते हैं उन लोगों की हकीकत जाननी हो तो उनसे यह विनम्र अनुरोध करें कि वे अपने बारे में पूरी ईमानदारी से हिसाब लगाएं। इन कामचोरों को पता है कि बहुत सारे लोग उन्हीं की तरह हैं जो बिना किसी काम-काज के खूब पा रहे हैं और ऎश कर रहे हैं। ऊपर से मुफ्त की सेवाओं और सुविधाओं की मलाई चाट रहे हैं सो अलग।

अब तो कामचोरों की संख्या इतनी अधिक बढ़ गई है कि तमाम बाड़ों में काम करने वालों की गणना पर ध्यान दिया जाता है, बहुसंख्यक होते जा रहे कामचोरों पर नहीं।

इस बात का मूल्यांकन करें कि अपने निर्धारित घण्टों में से कितना समय रोजी-रोटी दाता के नाम देते हैं, कितने समय अपनी सीट पर रहते हैं, जितना काम करते हैं, उसकी रोजाना शाम को सूची तैयार करें और अपनी उपलब्धियों की रोजाना डायरी संधारित करें।

ऎसा हो गया तो इन खूब काम है यह कहने और खूब काम करने का दम भरने वालों की अपने आप कलई खुल जाएगी। बहुत सारे लोग अपने कर्तव्य स्थलों पर निर्धारित कामों की बजाय मटरगश्ती करते हैं, समय पर आते नहीं, समय से पहले भाग जाते हैं, अपने कामों को दरकिनार रख कर कर्मयोग के समय में निजी कामों में तफरी करते रहते हैं, चाय-काफी की चुस्कियों और ब्रेड-पकौड़ों के रसास्वादन में रमे रहते हैं, गप्पों और दुनिया भर की चर्चाओं के सूप का आनंद लेते हैं।

और कोई सा काम आ पड़े या अपने रोजमर्रा के काम ही करने हों तो ये कल, परसों, नरसों और आगे से आगे टालते रहेंगे और इसी तरह माह भर निकाल लेंगे। स्वस्थ और निरपेक्ष मूल्यांकन किया जाए तो इन लोगों को अपने रोजमर्रा के कामों का हिसाब लगाने के बाद शर्म ही आने लगेगी, और इसके मारे सिर नीचा झुकाने की नौबत भी आएगी ही आएगी।

निर्धारित कामों को करने में मौत आती है और जहाँ कुछ प्राप्ति की आशा हो, लाभ मिल रहा हो तब ये कोई बहाना नहीं करते बल्कि समय से पहले और बाद में भी काम में जुटे रहते हैं। और तो और छुट्टी के दिन भी घण्टों तक भिड़े रहें यदि ये पक्के तौर पर आश्वस्त हो जाएं कि काम के बाद कुछ अच्छा और अतिरिक्त फल प्राप्त होने वाला है।

खूब काम है, खूब काम है का राग अलापने वाले बहुसंख्य लोग निकम्मे होते हैं और ऎसे लोग अपने नाकारापन को ढंकने के लिए ही कामों का बोझ होने का बहाना बनाते रहते हैं और रोजमर्रा के कामों से बचने के लिए ऎसे बहाने बनाते रहते हैं। इस किस्म के लोग काम नहीं करने के बावजूद अपने आपको सर्वाधिक एवं सर्वश्रेष्ठ कर्मयोगी के रूप में स्थापित-प्रतिष्ठित करने के लिए ही इस रामबाण बहाने का सहारा लेते हैं।

अपने आस-पास विराजमान जो-जो लोग खूब काम होने के बहाने बनाते हैं उनके रोजमर्रा के कामों की सूची बनाएं और उनका मूल्यांकन करें, अपने आप सब कुछ साफ हो जाएगा, कलई खुल जाएगी।

1 thought on “कामचोरों की ढाल है बहानेबाजी

  1. कामचोरी और आरामतलबी सिखा देती है बहाने
    हर कामचोर बहानेबाज होता है। उसके तरकश में बहानों से भरे ऎसे-ऎसे तीर होते हैं कि पता ही नहीं चलता कि यह सत्य है या कि कोई बहाना। इतना तो तय है कि जो इंसान बहाने बनाता है वह अपने आप में झूठा और कामचोर जरूर होगा। इस बात पर विश्वास न हो तो, परख लें। अपने आस-पास बहानेबाजों और कामचोरों की भारी भीड़ बनी ही रहती है जो हमेशा कहीं न कहीं मटरगश्ती या अलाप करती ही रहती है। – Dr. Deepak Acharya

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