अब नहीं रहा कुत्तों का कोई धर्म

कुत्तों का अपना कोई धर्म नहीं होता। पहले जमाने में कुत्ते चोर-डकैत देखकर भूंकते थे, हिफाजत करते थे, स्वामीभक्त हुआ करते थे। जब से झूठे, लफ्फाज, बेईमानों, भ्रष्टाचारियों, रिश्वतखोरों, कमीशनबाजों और हरामखोरों की झूठन खाने लगे हैं तब से कुत्तों के बचे-खुचे गुण भी खत्म हो गए हैं। अब तमाम किस्म के कुत्तों के लिए झूठन और खुरचन खाने और बचा-खुचा घूंट लिए जाने की ऎसी घातक बीमारी लग गई है कि ये कुत्ते झूठ और झूठन के पर्याय होने लगे हैं। इनका कोई एक स्वामी नहीं रहा। जो स्वादिष्ट झूठन खिलाता है उसी के हो जाते हैं, उसी की महिमा भौंकते रहते हैं। फिर कोई दूसरा इनसे अच्छी और बेहतर झूठन खिलाने और मुफत का पिलाने वाला मिल जाए, तो उसके हो जाते हैं। इनके स्वामी बदलते रहते हैं और ताजिन्दगी ये कुत्ते वैश्याओं की तरह व्यवहार करते हुए अन्त में सड़-गल कर मर जाया करते हैं। आजकल हर तरफ ऎसे कुत्तों की भरमार है जो किसी के नहीं हुए हैं। कुत्तों का अपना कोई सिद्धान्त नहीं रहा। जो इनके आश्रयदाता और मुफतिया खान-पान वाले मिल जाते हैं उन्हीं की डुगडुगी बजाते हुए भौंकते रहते हैं।  लगता है कि जैसे अब कुत्तों का कोई धरम नहीं रहा। सारे के सारे कुत्ते विधर्मी होकर धर्म से लोहा ले रहे हैं।