कुत्ते हो गए हैं बदहवास और बदतमीज

कुत्ते हो गए हैं बदहवास और बदतमीज

जरूरी हो चला है कुत्ता मुक्त भारत

 

कलियुग में तमाम किस्मों के लोग हमारे साथ और आस-पास मौजूद हैं। कई हमारे बाड़ों और गलियारों में हैं तो कई मोहल्लों और कॉलोनियों में। हर गांव-कस्बा और शहर-महानगर तक अब हर मौसम में उपलब्ध हो जाने वाली सब्जियों की तरह अजीबोगरीब और विचित्र लोगों का अस्तित्व विद्यमान है।

इनके कर्मों और हरकतों को भाँपने और जानने के लिए न तो अब फेस रीडिंग की जरूरत है, न इनके जीवन व्यवहार को परखने की। इनकी बॉडी लैंग्वेज और करतूतों से ही यह भाँपा जा सकता है कि कौन कैसा है।

हो सकता है कि कुछ प्रतिशत लोग ऎसे हों जिनके दोहरे-तिहरे चरित्र और मुखौटा लगाकर जीने की आदत के मारे उन्हें पहचानने में थोड़ी कठिनाई हो किन्तु इनके हाव-भाव और उद्विग्नता से ओत-प्रोत, अशान्त और अतृप्त हलचलों और तड़पन को देखकर अच्छी तरह महसूसा जा सकता है कि वे किस मानसिकता में जी रहे हैं।

इन इंसानों के भीतर तमाम जात के जानवरों की छवि देखी जा सकती है। खासतौर पर गिद्ध, श्वान, लोमड़ और बन्दर-भालुओं से लेकर पैंथरों की हरकतों को इनमें अनुभव किया जा सकता है। रोजमर्रा की जिन्दगी में इन्हें कई-कई जानवरों की तरह व्यवहार करते हुए देखा जा सकता है।

 

गिद्धों की तरह पैनी निगाह रखते हुए ये कुत्तों और कुतियाओं की तरह काट खाने, लोमड़ों और लोमड़ियों की तरह चालाकी और धूर्तता का प्रयोग करते हुए किसी को भरमाने की दक्षता सम्पन्न और मौका पड़ने पर किसी के भी सामने हाथ पसारते और किसी के भी पाँवों में पड़ कर गिड़गिड़ाते हुए दया और कृपा की भीख मांगने और लाभ का मौका देखकर बंदर-भालुओं की तरह नाच-गान दिखाते हुए औरों का मनोरंजन करने में इनका कोई मुकाबला नहीं।

इनका धर्म, सत्य, न्याय, नीति, मानवता और संवेदनशीलता से कोई सरोकार नहीं रहता। सार्वजनिक स्थलों की झूठन मिल जाए तो आदर सहित इसे आतिथ्य मानकर चटखारे लेकर खाते हुए उसका जयगान करते रहेंगे जिसकी झूठी रोटी या हड्डी का टुकड़ा मुँह में लेकर चूस रहे होते हैं।

इनके लिए स्वामीभक्ति और वफादारी कोई स्थायी एजेण्डा नहीं होता, बल्कि जैसा देस वैसा भेस अपनाते हुए उसी की जय-जयकार बोलते रहेंगे जिसके टुकड़ों पर पलेंगे।  टुकड़े खत्म हुए नहीं कि ली अपनी राह। इनके भाग्य से टुकड़े फेंकने वाले लोग भी बहुतायत में हर कहीं मिल जाया करते हैं।

शेर का सिंहासन खाली देखकर उस पर कब्जा जमाते हुए ये लोग अपनी सारी मर्यादाओं को तिलांजलि देते हुए वो सब कुछ कर गुजरते हैं जो कि इनके बस में होता है। क्या कुत्ते और क्या कुतियाएं। सभी को लगता है कि जैसे उनके ही दिन आ गए हैं। खूब सारे कुत्तों और कुतियाओं की जमातें किसी न किसी की सरपरस्ती में गली-मोहल्लों और बाड़ों-गलियारों में शेर बनी हुई बदहवासी में जी रही हैं और बदतमीजी का भरपूर दिग्दर्शन कराने लगी हैं।

सभ्यता, संस्कृति और संस्कारों के जरिये परमवैभव की बातें हवा होने लगी हैं और हर तरफ जबर्दस्त धुंध और कोहरा रोशनी को भी लील रहा है और मानवता को भी। कितने सारे कुत्ते हैं जो कुत्ताछाप आदमियों के जयगान में रमे हुए हैं और ढेरों कुतियाएं हैं जो अपनी पूँछ को चँवर की तरह हिला-डुला कर स्वामीभक्ति दर्शाती हुई एयरकण्डीशण्ड का सुख दे रही हैं।

कोई पूँछ से अपने आकाओं को सहला रहा है और कोई पूँछ का फ्रीस्टाईल इस्तेमाल कर गुदगुदाने और रिलेक्स करने में लगा है। कोई पूँछ को ब्रश की तरह इस्तेमाल कर आकाओं की डाई करता हुआ उन्हें जवान और खूबसूरत दिखाने में फेर में उलझा हुआ है।

भौंकने वालों की भी कोई कमी नहीं है और लम्बी सी जीभ लपलपा कर चाटते हुए चाटने-चटवाने का मजा देने वालों की भी कमी नहीं। पहले जानवरों के डर से आदमी को साथ रखा करते थे। अब आदमी जात समझदार हो गई है तो उसके डर से कुत्ते रखने लगे हैं। हर बड़े आदमी को कुत्ता चाहिए। और वह भी शानदार, जानदार और मजेदार। बाजार में आजकल हर किस्म के कुत्ते और कुतियाएं मौजूद हैं।  देसी भी हैं और विदेशी भी। और संकर नस्ल की तो भरमार ही है। मुफतिया कुत्तों की भी कोई कमी नहीं है। आजकल तो कुत्ता पालना सबसे आसान हो गया है।

किसी न किसी के टुकड़ों पर पलने वाले कुत्ते भी अपने आपको पालतु होने का बोध करते हुए गर्व के मारे फूले नहीं समा रहे। बहुत सारे लोग भी हैं जो अपने आपको किसी न किसी का मानते हैं और यह जताते हुए गौरव का अनुभव करते हैं। आदमी भी जिन्दगी भर इसी गफलत में रहता है कि कौन अपना है और कौन परायों का। इस भ्रमपूर्ण स्थिति का लाभ उठाने में कुत्तों से अधिक माहिर व चतुर और कोई नहीं हो सकता।

कुत्तों की घुसपैठ सब जगह है। जो जितना अधिक पुचकारने और पूँछ हिलाने-डुलाने में माहिर है, वह उतनी ही तेजी से किसी के भी घर-आँगन से लेकर किचन-बेडरूम और अन्तःपुर तक पैठ बना सकता है। इनके लिए न आयु सीमा का कोई बंधन है, न ऊँच-नीच या छोटे-बड़े का। जहाँ जिसका मन मिल जाए, गुदगुदी का मजा आ जाए, वह अपना।

हर तरफ कुत्तों और कुतियाओं की मौज है। किसी को भी अकारण डराने-घमकाने के लिए भौंकने से लेकर लपकने-काटने तक का आमृत्यु लाईसेंस आजकल के कुत्तों और कुतियाओं को मिला हुआ है। पहले कुत्ते चोर-डकैतों और संदिग्धों को देखकर भौंकते और पीछे लपकने का काम करते थे।

इंसानों की झूठन और हराम का खा खाकर अब कुत्तों का स्वभाव विपरीत हो गया है। अब कुत्ते सच्चे और अच्छे लोगों, सज्जनों और ईमानदारों के पीछे पड़े रहते हैं और उन्हें तंग करने, तनाव देने का काम जिन्दगी भर करते रहते हैं।

कुत्तों के लिए अब ईमान-धरम नाम की कोई चीज नहीं रही। जहाँ इन कुत्तों को दैहिक सुख और उन्मुक्त आनंद मिलता है, मुफतिया भोग-विलास प्राप्त होता रहता है, वीआईपी और वीवीआईपी कल्चर मिलता रहता है, वहाँ जमे रहकर ये श्वान सम्प्रदाय का विस्तार करते रहते हैं।

इंसानों को कुत्ताछाप बनाने के लिए धर्म परिवर्तन के लिए यदि कोई दोषी हैं तो ये कुत्ते ही हैं जिन्होंने इंसानों की योनि परिवर्तन कर श्वान का रूप दे डाला है। तभी तो जब भी कोई बेवजह गुर्राता, भौंकता, काटने दौड़ता और लपकता है, कुछ पाने के लिए मचलता हुआ झपटता है तब लगता है कि आदमी जात है कि कुत्ते की जात।

एक बार कोई कुत्ता हो गया तो फिर जिन्दगी भर वैसा ही बना रहता हुआ अपने पूर्वजों को लजाता रहता है। कुत्ते अपनी मौत के शाश्वत सत्य से बेखबर होकर उन्मुक्त धींगामस्ती, शोर और आतंक फैलाने में मस्त हैं। इन्हें यह पता ही नहीं है कि कुत्तों की मौत किस तरह हुआ करती है।

अब तो भैरव भगवान ने भी कुत्तों का साथ छोड़ दिया है। जहाँ कहीं कुत्तों और कुतियाओं का आतंक पसर रहा हो, वहाँ झूठन का समुचित प्रबन्धन इनके लिए करें या फिर मुखर होकर डण्डादेव के अनुष्ठान का सहारा ले। इसके बगैर ये कुतों की जात नहीं मानने वाली।

कुत्तों और कुतियाओं की दाढ़ में खून लग गया है और पूरी की पूरी जिस्म मुफतिया गुदगुदी पाने की आदी हो चली है। पूँछ को मूँछ मान बैठी इस जात को ठिकाने लगाने के लिए अब और अधिक इन्तजार न करें, भगवान ने अपने हाथों में ताकत दी है, तेज आवाज से धमकाने के लिए मुँह दिया है और डण्डे चलाने का हुनर भी। आईये, नया जमाना लाएं, समाज और देश को कमजात और हरामी कुत्तों से मुक्ति दिलाएं।

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