यों करें अपनों का परीक्षण

संसार यात्रा में खूब सारे लोग होते हैं जिनके बारे में हमें यह भ्रम बना रहता है कि वे हमारे आत्मीय और शुभचिन्तक हैं तथा जरूरत पड़ने पर बिना बताए वे हमारी मदद के लिए तैयार रहेंगे।

तकरीबन हर इंसान को अपने आस-पास घूमने और रहने वाले, ऊपर वालों और मातहतों, सहकर्मियों और सम्पर्कितों, नाते-रिश्तेदारों, समानधर्मा कार्य क्षेत्रों में साथ काम करने वालों, मित्रों और परिचितों पर पक्का भरोसा होता ही है कि ये जरूरत के वक्त हमारे काम आएंगे, प्रोत्साहन देंगे, संरक्षण प्रदान कर अभयदान देंगे और हरसंभव सहयोग-सहकार में कोई कमी नहीं छोड़ेंगे।

जब तक इन लोगों से कोई काम न पड़े, तब तक इनकी असलियत हम समझ नहीं पाते हैं लेकिन जैसे ही कहीं कोई स्वार्थ टकरा जाए, गलियां निकालकर काम निकलवाना हो अथवा उन कामों में हमारे सहयोग की आवश्यकता हो जिसे हमारी आत्मा स्वीकार नहीं करती हो या फिर इनके किसी काम के लिए कोई गलत-सलत रास्ता अपनाने की विवशता हो।

उस समय ये अपना सारा धर्म, नैतिकता, सिद्धान्त और राष्ट्रीय चरित्र भूल जाते हैं और और इनके लिए संबंधों या परिचय का एक मात्र आधार रह जाता है काम निकलवाना, स्वार्थपूर्ति और गलत रास्तों को अपनाने का दबाव।

जब कभी किसी अनुचित काम की अति हो जाए, तब इनके लिए न कोई सबंध का मूल्य है, न हमारे पद-कद और सिद्धान्तों का महत्व।  इस समय इनका एकसूत्री लक्ष्य यही होता है कि येन-केन-प्रकारेण इनका सेाचा हुआ काम हो जाए, स्वार्थ की र्पूर्ति हो जाए चाहे इसके लिए बाद में कभी हमारी बलि ही क्यों न चढ़ जाए, अथवा बरसों तक नकारात्मक कार्यवाही का दण्ड ही क्यों न भोगते रहना पड़े।

ऎसी खूब सारी भीड़ हमारे आस-पास बनी रहती है चाहे हमारा कर्म क्षेत्र कोई सा क्यों न हो। अक्सरहाँ ऎसे लोग तब तक चुप्पी साधे रहते हैं जब तक कि इनका कोई काम न हो। यह वह काल होता है कि सारे के सारे ऎसे शातिर बुद्धिजीवी या अनुचरी वाले मूर्ख तटस्थ बने रहते हैं।

हम चाहे कितने ही संकट में क्यों न हो, नुगरों और नालायकों से संघर्ष ही क्यों न कर रहे हों, इन लोगों को कोई फर्क नहीं पड़ता।  इस मामले में हमारे आत्मीय और करीब माने जाने वाले लोग किसी काम के नहीं होते। न ये दुष्टों से हमारी रक्षा कर सकते हैं न दुष्टों को कुछ कह पाने की हिम्मत।

कारण स्पष्ट है कि इन्हें न अच्छे काम से मतलब है, न अच्छे इंसानों से। इनके लिए इनकी मातृभूमि की सेवा और उद्धार का भी कोई मूल्य नहीं। केवल और केवल दोहन से लेकर हरसंभव शोषण ही इनके जीवन का ध्येय बना रहता है। इस मामले में इनकी मातृभूति इन्हें हमेशा शापित करती रहती है।

इन्हें केवल और केवल वे ही लोग चाहिएं जो इनके उल्टे-सीधे कामों को करते रहें, झूठन और खुरचन चाटते रहें और बची-खुची झूठन इन्हें भी चटवाते रहें। जहाँ इनके अपने स्वार्थ होते हैं वहाँ इनके लिए कोई अपना नहीं है सिवाय अपने कामों के।

जिन्दगी भर इनकी यही अपेक्षा रहती है कि ये चतुराई से सामने वालों को उल्लू बनाते रहें कि हम तुम्हारे अपने हैं, तुम्हारे लिए हैं, लेकिन जब मौका आता है तब पलायन कर जाते हैं। इनके लिए अवैध और नियमों के विरूद्ध काम करो तो अपने, और थोड़ा सा इन्कार कर लो तो फिर देखो इनके तेवर।

हममें से अधिकांश लोग पूरी की पूरी जिन्दगी ही ऎसे लोगों को पहचान नहीं पाते और इसी भ्रम में जीते रहते हैं कि ये हमारे अपने हैं और कभी काम आएंगे या कि साथ देंगे। जबकि हकीकत यही है कि ये अपने स्वार्थ के सिवा किसी के नहीं। 

आत्मीयता, तारीफ, श्रद्धा और प्रेम की लच्छेदार बातों के आदी इन लोगों की असलियत तब सामने आती है जब इनकी स्वार्थ पूर्ति में बाधा आ पड़े है और कोई सा ऎसा काम रुक जाए, जिन्हें करना सज्जनों के लिए जायज नहीं होता। तब देखियें इनका रौद्र रूप, वाणी प्रदूषण और प्रतिक्रिया प्रवाह को।

जीवन भर भ्रमों में जीने से अच्छा है कि कुछ-कुछ समय के अन्तराल के बाद इन लोगों को परखने का उपक्रम कीजियें, कोई सा काम जानबूझकर अटका दीजियें, किसी स्वार्थ पूर्ति में बाधक बन जाईयें, किसी अनुचित मांग को पूरी करने से साफ इंकार कर दीजियें, फिर देखियें इन लोगों का असली स्वरूप, जो कि बरसों से अपने आपको हमारे आत्मीय और स्वजन बताते रहे हैं।

अपने कहे जाने वाले लोगों के असली चरित्र को परखने के लिए इससे बड़ा और कोई उपाय नहीं है। कुछ-कुछ वर्षों में कोई न कोई नकली बहाना बनाकर यह अभिनव करते रहें, अपने आप अहसास हो जाएगा कि कौन अपना और कौन पराया है। कौन ढोंगी और कौन दिल से चाहता है।

आजकल पूरी दुनिया में लोग दोहरे-तिहरे चरित्रों में जी रहे हैं, मुखौटा कल्चर को अपना चुके हैं,  भीतर-बाहर जमीन-आसमान का अन्तर रखने लग गए हैं। ऎसे में कुछ-कुछ समय में चिकोटियां भरने का अभिनव करते रहें, सभी की असयित सामने आ जाएगी और यही हमारे लिए जीवन का वह सचबसे बड़ा परीक्षण होगा कि ये लोग कितने हमारे हैं और कितने स्वार्थ के।

अधिकांश संबंधों का आधार लेन-देन का गणित और स्वाथपूर्ति के समीकरण हो गए हैं ऎसे में बच के रहें उन लोगों से जो अपने आपको हमारा सहयोगी, संरक्षक और शुभचिन्तक बताते रहे हैं और हम भोले-भाले लोग उनकी झूठी बातों में आकर अपने आपको भ्रमित करते हुए उस दिशा में जा रहे हैं जहाँ जाकर सुख-सुकून और आत्मीयता के सारे शब्द और व्यवहार असमय मृत हो जाते हैं और फिर हमारे पास पछतावे व कुण्ठा के सिवा कुछ नहीं बचता।

हम सभी को चाहिए कि आस-पास रहने और मण्डराने वाले लोगों का समय-समय पर किसी न किसी अप्रिय बात को कह देकर अथवा कोई सा काम कुछ दिन के लिए अटका कर परीक्षण करें कि कौन है अपना – कौन पराया।

1 thought on “यों करें अपनों का परीक्षण

  1. अपनों को पहचानने का अनूठा प्रयोग –
    काटते रहें चिकोटियाँ समय-समय पर …
    जिनको हम अपना आत्मीय और मददगार मानते हैं उनमें से अधिकांश लोग हमारे होते ही नहीं।
    जब तक कोई काम या मांग न आ पड़े, तब तक हमारे अपने होने का भ्रम फैलाते रहेंगे। ये लोग अपने स्वार्थ की वजह से हमसे जुड़े रहते हैं।
    इन लोगों को परखने के लिए परीक्षणों का इस्तेमाल करें।
    कुछ-कुछ माह और साल के अन्तराल में अभिनय करते हुए ऎसा कुछ कह डालियें कि इनको मिर्ची लग जाए या फिर कोई सा काम जानबूझकर कुछ दिन के लिए अटका दीजियें। फिर देखियें इनकी असलियत मुँह बोलने लगेगी और ये अपना पाला छोड़कर शत्रुओं के पाले में कूद पड़ेंगे। इनका न कोई चरित्र है, न सिद्धान्त।
    परीक्षण करें और सायास दूरी बनाते जाएं, यही हमारे कल्याण का सुलभ और सहज मार्ग है।
    ये मेरा आजमाया हुआ नुस्खा है। आप भी आजमाईयें।

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