होली पर करें ये प्रयोग

होली कई प्रकार से हमारे जीवन के लिए लाभकारी है। जलती होली की सात या इससे अधिक विषम बार परिक्रमा करें। इससे आरोग्य, सुख-सम्पदा प्राप्त होती है।

अपने जीवन की सभी प्रकार की बुराइयों का स्मरण करें और एक-एक बुराई के लिए एक-एक परिक्रमा करते हुए कोई न कोई हवनीय वस्तु होलिकाग्नि में स्वाहा कर दें।  इससे बुराइयों से मुक्त हो जाएंगे अथवा मुक्ति की यात्रा आरंभ हो जाएगी।

अपनी जो-जो कामनाएं हैं उनमें से प्रत्येक का स्मरण करते हुए परिक्रमा करें और होलिकाग्नि में गुड़, मिश्री अथवा शक्कर स्वाहा करते रहें। 

अच्छा हो कि हम जलती होली की उतनी बार परिक्रमा करें जितनी अपनी आयु है। परिक्रमा करते हुए होलिकाग्नि में तिल स्वाहा करते जाएं। इससे अपने पापों का क्षय होता है। जलती होली की ईष्ट मंत्र का मन ही मन उच्चारण करते हुए यथाशक्ति परिक्रमा करें। इससे शरीर के भीतर का अग्नि तत्व संतुलित हो जाता है और कई सारी बीमारियों से मुक्ति मिलती है।

दाम्पत्य माधुर्य और सुख को प्रगाढ़ करने वाले दम्पत्ति सात परिक्रमा करें और हर बार पति-पत्नी अपने हाथ से होलिकाग्नि में गुड़ समर्पित करें।

राहु से पीड़ितजन नारियल गोले में गुड़ व अलसी का तेल भरकर अपने पर से सात बार उतार कर जलती होली में डाल दें।

ग्रह-नक्षत्र बाधाओं के निवारण के लिए उस ग्रह-नक्षत्र विशेष से संबंधित सामग्री परिक्रमा करते हुए ग्रह-नक्षत्र से संबंधित मंत्र को पढ़ते हुए नौ परिक्रमाएं करते हुए होलिकाग्नि में डालें।

बेवजह परेशान करने वाले लोगों के प्रभाव को समाप्त करने के लिए दुष्ट व्यक्ति के सात फोटो लें और उस पर उसका नाम लिखें, फिर फोटो पर सरसों रखकर फोटो को फोल्ड कर लें और काले धागे से बांध कर पुडियाएं बना लें।  होलिकाग्नि में परिक्रमा करते हुए उस व्यक्ति का नाम लेकर तथा मानसिक रूप से चेहरे का स्मरण कर एक-एक पुडिया डाल दें। इसके बाद हाथ-पाँव धोकर ही घर में प्रवेश करे।

यह भी कर सकते हैं कि दुष्ट इंसान के सात फोटो को सरसों की पोटली में बांध कर ठण्डी होली में डाल दें। अच्छा हो यदि नारियल गोले में फोटो व सरसों घुसेड़ दें और फिर इसमें थोड़ा सरसों का तेल डाल दें। अब इस गोले को ठण्डी होली में रख दें।

पर ध्यान रखें कि सज्जनों और सात्ति्वक लोगों पर यह प्रयोग न करें अन्यथा हानि उठानी पड़ सकती है। 

आरोग्य प्राप्ति के इच्छुक महामृत्युन्जय मंत्र/संजीवनी मंत्र से परिक्रमा करें। जिस किसी को जिसकी कामना है उससे संबंिधत मंत्र होलिकाग्नि की परिक्रमा करते हुए श्रद्धा और विश्वास के साथ स्मरण किया जाए तो उस मंत्र के जागरण में मदद मिलती है।

चर्बी और मोटापे से परेशान लोगों को चाहिए कि वे अग्नि के बीज मंत्र रं का स्मरण करते हुए होलिकाग्नि की विषम संख्या में परिक्रमा करें और अंत में यह भावना करें कि रं बीज  मंत्र के प्रभाव से होलिकाग्नि का अंश उनके शरीर में प्रवेश कर चर्बी को पिघलाने की शुरूआत कर चुका है।

होलिकाग्नि दूर से देखते हुए यं मंत्र से वायु को फेफड़ों में भरें, रं बीज मंत्र का जप करते हुए कुंभक करें और यह भावना करें कि चर्बी जलकर धूंआ बन रही है, फिर यं बीज मंत्र बोलते हुए वायु को दूसरे नाक से बाहर निकाल लें। यह क्रिया दो-बार कर लें। इसके बाद वं बीज मंत्र से तीन बार प्राणायाम कर लें। इससे शरीर सामान्य अवस्था में आ जाएगा। फिर जब भी कभी फुरसत मिले, इसी प्रकार प्राणायाम  करते रहें।

डायबिटिज से पीड़ित लोगों को चाहिए कि वे जलती होली की परिक्रमा करते हुए मिश्री, शक्कर या गुड़ स्वाहा करते जाएं।

जलती होली की साक्षी में या परिक्रमा करते हुए किसी भी मंत्र के जप किए जाएं तो उससे मंत्रसिद्धि होती है।

इससे शरीर पर अग्निधर्मा दिव्य कवच का निर्माण होता है जिससे साधक बाहरी तंत्र-मंत्र और अनपेक्षित गुप्त एवं प्रकट आक्रमणों से सुरक्षित रहता है।

इसलिए होली पर भोगी-विलासियों की तरह बने रहकर केवल मनोरंजन में ही रमे न रहें, होलिकाग्नि की साक्षी में अपने लिए कुछ अर्जित करने का प्रयास करें।

होली की अग्नि से शरीरस्थ चक्र और अधिक परिपुष्ट होते हैं, सभी प्रकार के वायरस और नकारात्मक तत्वों का ऊष्मा एवं अग्नि से संहार हो जाता है और जलती होली की साक्षी में मंत्र जप से हवन का पुण्य प्राप्त होता है।

होली पर दिव्य प्रयोग – औषधि अभिमंत्रित कर डालें

साल भर में जिस औषधि (गोली या चूर्ण) का हमारे शरीर के लिए अधिक उपयोग होता है वह एक-दो गोली या 10 ग्राम पावडर को होली की परिक्रमा करते हुए अग्नि में डाल दें। इससे उस औषधि का परमाण्वीय सूक्ष्मीकरण हो जाता है तथा वह व्योम में धूम्र के रूप में हमेशा सुरक्षित रहती है। फिर पृथ्वी लोक पर जब कभी जब कहीं अचानक उसकी आवश्यकता पड़ जाए, उसी मंत्र से उसका आवाहन करें जिस मंत्र से होली की अग्नि में स्वाहा किया था। इससे सूक्ष्म रूप में उस औषधि का प्रभाव शरीर को प्राप्त हो जाता है।

धुलेड़ी को अपनी राशि के स्वामी के अनुरूप रंग-गुलाल का प्रयोग करें तथा रंग खेलना आरंभ करने से पूर्व शिवलिंग अथवा श्रीकृष्ण मूर्ति अथवा अपने ईष्ट देव को पहले रंग लगाएं,  मन्दिर या घर के मुख्य द्वार के बाहर आजू-बाजू में देवी-देवताओं, गणों और पितरों के नाम से थोड़ा रंग बिखेर दें, उसके बाद ही घर से बाहर निकलें।

होली दहन के अगले दिन धुलेड़ी को प्रयोग में लाए जाने वाले रंग-गुलाल आदि में होली की राख मिला लें, इससे जिसे भी रंग-गुलाल लगाएंगे, उससे प्रेम-माधुर्य और सौहार्द बढ़ेता ही रहेगा।

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