वही करो, जो कर रहे हो

ऎ मानुष !

तुम और कुछ नहीं कर सकते,

इसलिए वही करो जो तुम कर रहे हो, अब तक करते रहो हो।

क्योंकि इसके बिना तुम्हारी कोई जिन्दगी नहीं, और तुम आसानी से मर भी नहीं सकते क्योंकि मौत भी कोई आसानी से आने वाली नहीं।

और आ भी गई तो वह सहज-स्वाभाविक नहीं होगी क्योंकि तुम्हारे करम ही ऎसे हैं कि आसान मौत नहीं हो सकती। फिर मर भी गए तो कौन सी अच्छी योनि तुम्हें प्राप्त होने वाली है।

तुम्हारी पूरी की पूरी जिन्दगी ही निकल रही है लक्ष्यहीन कर्म में। जिसे तुम लक्ष्य मानकर चल रहे हो वह तो तुम्हारे लिए सुविधा और मुफतिया सेवा का ही दूसरा नाम है।

तुम यदि किसी चरागाह में घुस गए हो तब भी मस्त होकर चरते रहो क्योंकि तुम्हारा स्वभाव ही हो गया है चरना और जुगाली करना। कभी तुम्हारे दाँतों और जीभ के बीच खान-पान का चर्वण होता है और कभी गुटखा, सुपारी, पान-तम्बाकू या और कुछ, जिसके जरिये तुम रोजाना तब तक चौपायों की तरह जुगाली करते रहो, जब तक नींद न आ जाये अथवा सदा-सदा के लिए आँखें बंद न हो जाएं या फिर मुँह कैंसर की चपेट में न आ जाए।

यों भी तुमने परिश्रम का खाना और पीना तो तभी से छोड़ दिया है जब से समझदार हो गए हो। और जमा करना भी तभी से जारी है।

मौत के वक्त शायद खूब सारा अपने साथ ले जाने का तुमने लाइसेंस ही पा लिया है। तुम तभी तक जिन्दा रह पाओगे जब तक कि सूअरों और श्वानों के दूध पीते बच्चों की तरह झुण्ड की शक्ल में उनके आगे-पीछे घूमते रहो, परिक्रमा और जयगान करते रहो।

थोड़ा और प्रतिष्ठित हो जाओ तो हाथी के साथ चलने वाली चतुर बाबाओं की जमात की तरह चलते रहो, मांग खाओ और आगे बढ़ते रहो। आखिर सब के सब हाथियों के बड़े-बड़े पेट हैं और उनके साथ चलने वाले गधे-घोड़े भी कोई बिना पेट के तो नहीं है।

हाथियों के नाम पर कमा खाने का शगल बहुत पुराना रहा है। पहले काले हाथी भी हुआ करते थे और सफेद हाथी भी। अब हाथी भी मौसम को देखकर अपना रंग बदलने लगे हैं।

हर कोई अपने आपको ऎरावत कहता और जताता है।  सफेद हाथियों के लिए हर तरह का रंग अपना लेना बहुत ही सरल और साध्य है। फिर जितने हाथी हैं उनसे बीस-तीस गुना वे लोग भी हैं जिनसे मिलकर बनती है जमात।

हाथियों और जमातों का पारस्परिक संबंध खत्म नहीं किया जा सकता। दोनों एक-दूसरे पर पल रहे हैं। मांगने में सारे भीखमंगों को भी पीछे छोड़ देने वाले हैं। हाथी भी सूण्ड उठाकर मांग लेते हैं, महावत भी, और साथ चलने वाले जमाती थी।

पूरी की पूरी श्रृंखला सिद्ध है। हाथी, महावत और साथ चलते रहकर हाथियों का गुणगान करने वाले भी। हाथी को गजानन बताते हुए पा लेता है और कोई गजराज बताकर इनके दुर्लभ होने का फायदा उठा लेता है।

आगे-आगे हाथी चलता रहता है और पीछे-पीछे चलने वाले जमाती लोग हस्तरेखाएं बाँचते हुए जमाने भर को लच्छेदार बातों से मोहित करते हुए आगे बढ़ते रहते हैं। हाथी भले न रहे हों, अब उनकी संख्या कम होती जा रही हो, किन्तु हस्तियों की विस्फोटक ढंग से बढ़ती संख्या को कोई नकार नहीं सकता।

हर कोई अपने आपको हस्ती मानता और मनवाता है तथा हमेशा हस्ती बनकर रहना चाहता है। हस्तियों का प्रसार देश के कोने-कोने तक होता जा रहा है। गली-कूंचों से लेकर जनपथ और राजपथों तक  हस्तियों का जबर्दस्त जमावड़ा है।

यही नहीं तो हर दिन कहीं न कहीं हस्तियों का गर्भधारण हो रहा है और प्रसूतियाँ भी। खूब सारे हैं जो कभी याचकों की तर्ज पर तो कभी तमाशबीनों की तरह हाथियों के आस-पास रहने, उनकी प्रशस्ति का गान करने, उनकी परिक्रमाएं करते रहने और हाथियों के महिमा मण्डन के लिए पूरी जिन्दगी खपा दिया करते हैं।

देश भर में बहुत सी भीड़ ऎसी है जो हस्तियों के इर्द-गिर्द बनी रहती है अथवा उनके आने पर जुट जाती है। इस भीड़ को भी हस्तियों के सामीप्य में गर्व का अनुभव होने लगा है इसलिए ये हस्तियों से  चिपकने को ही जीवन समझ चुके हैं और हस्तियों को ही भगवान मान चुके हैं।

खूब सारी भीड़ है जिसके पास ज्ञान-हुनर और अनुभव आदि कुछ नहीं है और ऎसे में इनके लिए जमाती बनकर हाथियों के सान्निध्य में रहने के सिवा कोई चारा नहीं है। ये हाथी इनके लिए आश्रयदाता, संरक्षक और मददगार के रूप में काम आते हैं।

कई हस्तियों को भीड़ ही सब कुछ लगती है। भीड़ न हो तो ये मर ही जाएं।  भीड़ इनके लिए विटामिन, प्रोटीन, न्यूट्रीन्स सब कुछ है। इसी तरह कई सारे बाड़ों में किसी न किसी तरह घुसपैठ कर चुके पिस्सुओं के लिए भी दूसरा कोई काम नहीं सुहाता।

मकड़ियों की तरह अपने ही नेटवर्क में उलझते हुए तरक्की के सफर की डींगें हाँकते रहो या फिर अंधेरे कोनों में बैठ कर षड़यंत्रों के ताने-बाने बुनते रहो। हर तरफ नाकारा भीड़ हम सभी के इर्द-गिर्द ऎसी ही मण्डरा रही है जिसे न घर-परिवार के लोग बर्दाश्त करते हैं, न समाज के, और न ही इनकी मातृभूमि या कर्मभूमि वाले लोग।

हर तरह से छंटेल छन-छन कर हस्तियों के पास जमा होकर ऎसी परिधियों का निर्माण कर डालते हैं कि हस्तियां भीतर से अपनी लोकप्रियता का भ्रम मानकर खुश होती हैं और बाहर से लगता है कि नाग पाशों में जकड़ती जा रही हों।

इस स्थिति में हम सभी लोग सोचने को विवश हैं कि आखिर इन लोगों का भाग्य कैसा होगा जो कि हस्तियों के नाम पर कमा खा रहे हैं,  अपनी चवन्नियां चला रहे हैं और पूरी दुनिया को चलाने के साथ ही ये उन हस्तियों को भी चलाते रहते हैं जिनके ये पिट्ठू या प्यादे अथवा सरल-सहज भाषा में कहेंं तो चमचे हुआ करते हैं।

इनके संबंधों को किसी उदाहरण से सिद्ध करना पड़े तो गाय-बगुला संबंधों के रूप में देखा जा सकता है अथवा कैंकड़ा जूँ की भूमिका में। इसलिए उन लोगों को वही करते रहना चाहिए जो कि वे कर रहे हैं, या करते रहते हैं।

जो लोग कोई सा काम-धंधा नहीं कर सकते, पान की गुमटी या ठेला तक नहीं चला सकते, दो मिनट भी जगारी-फावड़ा नहीं चला सकते, खुद के हाथ से पानी नहीं पी सकते, इन सभी तरह के परम दिव्यांगों को चाहिए कि वे जो कुछ कर रहे हैं, करते रहें अन्यथा भूखों मरने की नौबत आ सकती है।

यों भी लोग हस्तियों से शर्म, भय या उनके प्रति ज्ञात-अज्ञात श्रद्धा भाव की वजह से ही इन अनुचरों की फौज को घास डालते हैं। वरना इन्हें पूछे कौन? मौका मिले तो ……।

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