निवृत्तों को कराएं अपराधबोध का अहसास

बुजुर्गों, ज्ञानियों और अनुभवियों का सम्मान करना, उन्हें यथोचित आदर-सम्मान और श्रद्धा निवेदित करना हमारी परंपरा में रहा है और ऎसा करना भी चाहिए। यह हमारा सामाजिक फर्ज है।

आज भी हम अपने बुजुर्गों के प्रति श्रद्धा और सम्मान के भाव दर्शाने में गौरव का अनुभव करते हैं। यही स्थिति समाज के उन लोगों की है जो समाज-जीवन और कर्मधाराओं से जुड़े विभिन्न क्षेत्रों में दीर्घकालीन सेवाओं के उपरान्त सेवानिवृत्त होते हैं और इनके बारे में आम धारणा यही रहती है कि ये समाज और क्षेत्र से लेकर देश की अमूल्य धरोहरें हैं जिनका कोई मोल नहीं आंका जा सकता।

जो लोग अपने सेवाकाल मेंं सदाशयी, परोपकारी, कर्तव्यनिष्ठ, सेवाभावी और ईमानदार रहे हैं उनके प्रति सच्चे मन से आदर-सम्मान और श्रद्धा का भाव रखें लेकिन जिन लोगों का सेवाकाल स्टन्ट, कामचोरी, चापलूसी, भ्रष्टाचार, विघ्नसंतोषी व्यवहार, छिद्रान्वेषण, कुत्ताफजीती और विवादों से घिरा रहा है, जिन्होंने पूरे सेवाकाल में पराये माल को हड़पने और अपना घर भरने का काम किया हो, बेवजह लोगों को तंग किया हो, अपने पद का जी भर कर दुरुपयोग किया हो, ऎसे लोगों के प्रति आदर-सम्मान और श्रद्धा के भाव रखना देश के साथ गद्दारी है क्योंकि इन्हीं नुगरों के कारण प्रगति की राह में स्पीड ब्रेकरों का जंजाल बिखरा रहा, जिनके कारण से तरक्की पर आँच आयी और सज्जनों व जरूरतमन्दों को पिछड़ना पड़ा।

ऎसे खूब सारे लोग हैं जिनकी सेवानिवृत्ति के लिए भी लोग प्रतीक्षा करते हैं अथवा उनको धरती से जल्दी उठाने के लिए भी लोग भगवान से करुण भाव में भरकर प्रार्थना करते हैं। लोगों का साफ मानना यही रहता है कि जितने दिन ये रहेंगे उतना समाज और देश का नुकसान है और यह भरपायी वर्षों तक नहीं की जा सकती। सेवानिवृत्ति से आशय उन सभी लोगों से है जो पांच साला या साठ साला सभी प्रकार की सेवाओं या समाज सेवा से जुड़े रहे हैं।

इन दुर्जन व दुःशासनी लोगों के लिए बददुआओं के भण्डार रोजाना भरते जाते हैं और इनके बारे में समझदार और जानकार लोग हमेशा बुरा ही बुरा कहते रहकर कोसते रहते हैं। कई तो इनके माता-पिता को कोसते हैं और कई इनकी वंश परंपरा को। खूब सारे लोग उन्हें कोसते है। जो उन्हें इन बाड़ों और गलियारों में लेकर आए हैं अथवा रख गए हैं।

समाज का दुर्भाग्य ही कहा जाना चाहिए कि हम अच्छे लोगों की उतनी प्रशंसा नहीं करते जितनी भ्रष्ट, निकम्मे, लम्पट, नशेड़ी, हिंसक और दुष्ट लोगों की। इसमें हमारा पक्का वाला स्वार्थ छिपा हुआ है। हम उनकी ही तारीफ करने के आदी हो गए हैं जिनसे हमें कोई न कोई लाभ होता हो, चाहे वे कितने की कुटिल, खल और कामी ही क्यों न हों।

हमने कभी समाज का हित नहीं देखा, राष्ट्र के हिताहित के बारे में नहीं सोचा। हमने हमेशा अपने बारे में ही सोचा और वही किया जो खुदगर्ज और मौकापरस्त बिकाऊ लोग किया करते हैं। हमारे सामने अब केवल एक ही पैमाना रह गया है। जो हमारे स्वार्थों को पूरा करे, हमारे अपराधों पर परदा डालता हुआ अभयदान दे, हमारे सभी प्रकार के मनमाने कुकर्मों को संरक्षण प्रदान करे, वह हमारा, बाकी सारी दुनिया हमारी दुश्मन।

विभिन्न प्रकार की सेवाओं से मुक्त हो चुके निवृत्तों की भी बहुत बड़ी संख्या है जिनमें ईमानदार, नैष्ठिक कर्तव्यपरायण और समाज के प्रति समर्पित सेवाएं देने वाले भी हैं और वे लोग भी हैं जिन्हें समाज का शोषक, स्वार्थी, संग्रही, निरंकुश अधिनायकवादी, सामन्ती, बेवजह प्रताड़ित करने वाले, शक्तियों का जमकर दुरुपयोग करने वाले भ्रष्ट, रिश्वतखोर और कमीशनबाज माना जाता रहा है।

खूब सारे ऎसे भी रहे हैं जिनके बारे में कहा जाता है कि इनका कोई काम खुद की तनख्वाह या पारिश्रमिक से नहीं होता, हर मामले में परायों पर ही निर्भर रहे हैं। इनका बस चलता तो ताजिन्दगी इन मुफतिया भोग-विलास में ही रमे रहते।

खूब सारे ऎसे भी हैं जिनके बारे में कहा जाता है कि इन लोगों को अपने लिए कफन भी चाहिए तो यही इच्छा रहती है कि इसका इंतजाम भी कहीं ओर से हो जाए। और तो और उत्तर क्रिया से लेकर बरसी तक के खर्च का इंतजाम भी कहीं ओर से हो जाए तो इनकी आत्मा को शान्ति प्राप्त हो सकती है।

इन लोगों को रिटायरमेंट के बाद कोई ऎसा बन्दा नहीं मिलता जो इनके सामने इनकी असलियत का बखान करे। आम तौर पर यह माना जाता है कि जो मर गया उसके बारे में बुरा नहीं कहते। लेकिन यह बात हमने सेवानिवृत्तों पर भी लागू कर दी है और मूल रोना ही इसी बात का है।  जो लोग साठ साला या पांच साला सेवाओं से निवृत्त हो गए हैं उनमें जो अच्छे रहे हैं उन्हें सभी के सामने सराहेें, अच्छा कहें और उनकी शिक्षाओं तथा कर्मयोग का अनुकरण जरूर करें।

लेकिन जो लोग सेवाओं में रहते हुए अक्खड, सडू, चिड़चिड़े, भ्रष्ट, झूठे, दगाबाज, भरमाने वाले, आश्वासनवादी, रिश्वतखोर, पराये माल को हड़पने वाले, तनाव देने वाले, तंग करने वाले, चापलूस, शिकायती, आसुरी वृत्ति वाले, कामचोर और नालायक रहे हैं, उन्हें भी सार्वजनिक तौर पर उनके और जनता के सामने साफ-साफ बताएं कि वे कैसे रहे हैं, खुलकर बताएं कि ये लोग कैसे नालायक रहे हैं और उनके कारण से किन-किन को दुःख, शोक और अवसाद भोगने पड़े हैं, किस तरह इन लोगों ने रिश्वतखोरी और भ्रष्टाचार से काम बिगाड़े हैं।

इन लोगों को यह भी बताएं कि उनके कारण से समाज और देश को कितना नुकसान पहुंचा है, संस्थान की छवि कितनी खराब हुई है और सज्जनों तथा कर्तव्यनिष्ठ ईमानदार लोगों के साथ कितना कुठाराघात हुआ है।

हम सब यदि भय और पक्षपात, लाभ या हानि के गणित से ऊपर उठकर खुले आम इनके सामने ही इनमें विद्यमान परम्परागत विलक्षण गुणों का सार्वजनीन वर्णन करने लग जाएं तो इनका बुढ़ापा ही खराब हो जाए और आत्मचिन्तन के लिए विवश हो जाएं।

इससे भले ही इस जन्म मेंं ये पक्के हो चुके अधम पापी सुधर न पाएं लेकिन प्रायश्चित और पश्चाताप की अग्नि में जलते हुए अगले जनम के लिए कुछ सीख जरूर मिल सकती है। इसका एक बहुत बड़ा फायदा यह भी होगा कि दूसरे सारे उन लोगों को भी अक्ल आएगी जो आज भी किसी न किसी बाड़े या गलियारे में खुले साण्डों, भालुओं, लालमुँहे बन्दरों या बिगडैल भैंसों की तरह धींगामस्ती कर रहे हैं।

जिस दिन हम जो कुछ हो रहा है उसे स्वीकार कर लेने की दुर्बलता से ऊपर उठकर खुले आम सच को सच कहना, बुरे को बुरा कहना शुरू कर देंगे उस दिन से पूरा माहौल ही बदल जाएगा। जो इंसान अपराध करता है उसके भीतर अपराधबोध जगाते हुए उसे सार्वजनीन रूप से तिरस्कृत करना और कराना जरूरी है तभी सामाजिक व्यवस्था का पैमाना ठीक-ठाक प्रभाव दिखा सकता है।

बुरे को अपने स्वार्थ के कारण अच्छा कहना, पूजनीय और आदरणीय मानना और अच्छों को उपेक्षित या पीड़ित करते रहना ही हमारी सारी समस्याओं का मूल कारण है। अपने आपकी भूमिका को सुधारें, पारदर्शी बनाएं और मुखर होकर सत्य का साथ दें, सत्याग्रही बनें, सत्य संभाषण भी करें। सत्य की अभिव्यक्ति यदि हमारा युगधर्म बन गई तो धर्म युग का निर्माण अपने आप होता चला जाएगा।

1 thought on “निवृत्तों को कराएं अपराधबोध का अहसास

  1. रिटायर लोगों को दिखाएं आईना …
    बात कुछ अटपटी लग सकती है लेकिन है यह समाज और देश के हित में।
    रिटायरमेंट पा चुके खूब सारे लोग सेवाओं में रहते हुए कठोर परिश्रमी, ईमानदार, सहज-सरल सेवाभावी और परोपकारी स्वभाव के रहे हैं लेकिन बहुत से ऎसे भी हैं जो भ्रष्ट, रिश्वतखोर, दंभी होकर बेवजह औरों का बिगाड़ा करने वाले, सज्जनों, कर्मनिष्ठों और ईमानदारों के खिलाफ झूठी और तंग करने वाली कार्यवाही करने वाले, अपने संस्थानों की साख पर बट्टा लगाकर कबाड़ा करने वाले या महा कामचोर भी रहे हैं और उनके कारण से यह अनुभूत होता है कि निष्ठावान लोगों, ईमानदार कर्मियों और सज्जनों का खूब अहित हुआ।
    जो अच्छे रहे हैं, उन्हें सराहें लेकिन जो अपने सेवाकाल में पैसों के दास, मुफत के खाने-पीने के शौकीन, बुरे और भ्रष्ट रहे हैं उन्हें जहाँ मौका मिले, बिना किसी भय या हिचक के सार्वजनिक तौर पर तिरस्कृत करें, उनकी हरकतों और कारनामों के बारे में उन्हें सुनाते हुए सभी के सामने उनकी रावणकहानी कहें और उन्हें बताएं कि किस तरह उनके कारण से अच्छे लोगों, समाज और देश को नुकसान पहुँचा है। इनके बारे में जहां अवसर हो वहां लिखें और दस्तावेजीकरण भी करें ताकि आने वाली पीढ़ियां यह जान सकें कि पहले वाले ये लोग कितने खुदगर्ज, नुगरे और नालायक रहे हैं।
    उन्हें यह भी बताएं कि वे यदि धरती पर पैदा ही नहीं होते तो आज देश कहीं और मुकाम पर होता।
    वो जमाना चला गया जब अच्छा ही अच्छा कहते हुए हम सर्वप्रिय और सकारात्मक छवि वाले होने का भ्रम पाल लिया करते थे। हमारे इसी दोहरे और स्वार्थी चरित्र के कारण समाज और देश में वेलोग निरंकुश होकर स्वेच्छाचारी व पूज्य होते गए, जिन्हें तिरस्कृत और बहिष्कृत किया जाना चाहिए था।
    अब सच को सच कहने और बुरे को दुष्ट कहने का स्वभाव अपनाना ही सम सामयिक लोक धर्म है। लेकिन यह साहस वही कर सकता है जो खुद सच्चा और अच्छा हो।
    (उन सभी सेवानिवृत्तों के प्रति क्षमायाचना सहित, जिन्हें लगता है कि उनका जन्म ही मौज-मस्ती और संग्रह तथा शोषण करने के लिए हुआ है। अच्छा हो ये लोग आत्मचिन्तन करें और प्रायश्चित्त को अपनाएं ताकि शेष जीवन सुखी हो सके और अगला जनम सुधर सके।)

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