बरकत चाहें तो पेड़-पौधे लगाएँ

खुशहाली और सुकून हर कोई चाहता है। यह सुकून पिण्ड से ब्रह्माण्ड तक के सभी प्रकार के कारकों को प्रभावित करता है और इनसे प्रभावित भी होता है।

पंचतत्वों से रचित सृष्टि का हर तत्व परिपूर्णता पाने पर चरम आनंद और उपयोगिता दोनों को बरकरार रखता है और इसका शाश्वत असर दीर्घकाल तक बना रह सकता है।

प्रकृति का जितना अधिक सान्निध्य बना रहता है उतना वह सृष्टि के हर तत्व को ताजगी से भरा रखती है।  इसी प्रकृति का बहुत बड़ा हिस्सा है हरियाली। इसके बिना जीवन और जगत की आशा नहीं की जा सकती।

यह हरियाली ही है जिसके कारण से जन जीवन और परिवेश सुखद आनंद की अनुभूति भीतर तक कराता है और शरीर का अंग-प्रत्यंग तक मदमस्त हो उठता है।

हरियाली हम सभी चाहते हैं लेकिन हरियाली के लिए कितना कुछ कर पा रहे हैं, हरियाली के संरक्षण और संवर्धन के लिए कितना कुछ कर पाए हैं, यह हम सभी के सामने वह यक्ष प्रश्न है जिसका जवाब दे पाने की हिम्मत हमारे में नहीं है।

कारण यह कि हमने अपने स्तर पर ऎसा कुछ किया ही नहीं, जो कि हम अवगत करा सकें। हरियाली, पानी, पहाड़, मैदान और आसमान देखना सभी के मन को भाता है लेकिन जहां इनके लिए कुछ करने की बात आती है वहाँ हम औरों के सामने देखने लगते हैं।

हरियाली को छिन्न-भिन्न करने वाले भी किसी और लोक के प्राणी नहीं है बल्कि हम ही लोग हैं जो प्राकृतिक संतुलन के साथ कुठाराघात कर रहे हैं। हर साल पानी खूब बरसता है लेकिन इस पानी से जितनी हरियाली का विस्तार होना चाहिए उतना दिख नहीं पाता।

हर जीव यह महसूस तो करता है कि पेड़-पौधे और हरियाली जरूरी है लेकिन इसके लिए खुद की ओर से कोई कुछ कर नहीं पा रहा। इस बार प्रकृति भी मेहरबान है और पानी भी बरस रहा है।

अब तक हम नहीं कर पाए हैं इसका एकमात्र प्रायश्चित यही है कि इस बार अधिक से अधिक पेड़ लगाकर बीती आयु के सारे कलंक को धो डालें और अपनी भागीदारी निभाएं ताकि आने वाली पीढ़ियां हमें कोसती न रहें।

अपनी जितनी आयु है उतने पौधे लगाकर जो परवरिश करता है वह पुराने सारे पापों से मुक्त हो सकता है। हमारे ग्रह-नक्षत्रों के अनिष्ट और नकारात्मक शक्तियों को यदि हम समाप्त करना चाहते हैं तब पेड़-पौधे लगाने और उनकी परवरिश करने से अधिक सहज, सरल और कारगर उपाय और कुछ है ही नहीं।

ज्योतिषीय दूसरे सारे उपाय समय साध्य हैं लेकिन पौधारोपण और पौध सिंचन के उपाय तत्काल फल देने लगते हैं और इनका कोई मुकाबला नहींं। सेहत से लेकर समृद्धि पाने तक यह जरूरी है कि हम पेड़-पौधे लगाएं, उनकी पूजा-परिक्रमा को महत्व दें, प्रकृति पूजा को सर्वोपरि मानें और उन सभी कामों को त्यागें जो प्रकृति के शोषण से किसी न किसी प्रकार से जुड़े हुए हैं।

प्रकृति से हम जितना पा रहे हैं उसका पांच फीसदी भी हम ऋण नहीं चुका पा रहे हैं। हर इंसान पर प्रकृति के कर्ज का भार निरन्तर बढ़ता ही जा रहा है और यही कारण है कि प्रकृति हम पर कुपित हो रही है।

अभी जो कुछ दिख रहा है वह केवल झाँकी ही है, हम अभी भी नहीं सुधरे तो आने वाला समय इतना भयावह होगा कि हम कल्पना भी नहीं कर पाएंगे।

आईये, इस बार पेड़ लगाएं, खाली पड़ी जमीन पर बीज डालें और वह सब करें जिससे प्रकृति को खुश किया जा सकता है। दो-तीन माह का यही समय शेष है, फिर यह मौका हाथ नहीं आने वाला। और अगली बारिश तक के दिनों का क्या भरोसा। दिल के अरमान दिल में रखकर ही कहीं राम नाम सत्य न हो जाए।

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