यों करें पापों का प्रायश्चित

यों करें पापों का प्रायश्चित

कलिकाल में पाप से कोई नहीं बच सकता। पग-पग पर पापियों, पातकियों और पाप का माहौल इतना अधिक पसरा हुआ है कि कोई कितना ही बचने की कोशिश करे, पाप के घेरे में आ ही जाता है।

हम खुद कितने ही पवित्र और पुण्यशाली क्यों न हों, पाप से बचना असंभव तो नहीं किन्तु मुश्किल जरूर है। सब तरफ कलियुग की छाया और माया का प्रभाव लगातार पसरता और घनीभूत होता जा रहा है।

पाप को स्पष्ट रूप से कई प्रकार से परिभाषित किया जा सकता है। एक पाप वह है जो सायास किया जाता है। इसमें कर्ता को यह अच्छी तरह पता होता है कि वह जो कर रहा है, वह सब कुछ पाप की श्रेणी में आता है। इस तरह के पाप वह जानबूझकर कर किया करता है और अपने पापों की गठरी का आकार और भार दिनों-दिन बढ़ाता रहता है।

दूसरी तरफ वे कर्म हैं जिनके बारे में कर्ता को यह पता नहीं है कि वह जो कर रहा है वह पाप की श्रेणी में आता है और वह पाप पर पाप किए जाता है। तीसरी श्रेणी में वे लोग आते हैं जो पाप करना नहीं चाहते, हिंसा, पाप और दूसरों को दुःख देने की सोच भी नहीं सकते किन्तु इनके स्वभाव, व्यवहार और अन्य गतिविधियों में अक्सर ऎसे कर्म हो जाते हैं जो इनको भी पता नहीं होते। यानि की अनजाने में अदृश्य और गुप्त पाप इसी श्रेणी में आते हैं।

सायास, अनायास और अज्ञानतावश किए जाने वाले समस्त पापों का फल जीवात्मा को भुगतना पड़ता है। अज्ञानतावश और अनायास हो जाने वाले पापों के कुफल को सामान्य प्रायश्चित या ईमानदारी के साथ स्वीकारोक्ति कर लिए जाने पर नष्ट किया जा सकता है किन्तु जो पाप जानबूझकर अर्थात सायास किए जाते हैं उनका फल कर्ता को पाप के परिमाण और परिणाम के अनुरूप भोगना ही पड़ता है, इससे छुटकारा नहीं हो सकता।

आमतौर पर इंसान को अपने द्वारा किए गए पुण्य और अच्छे कर्म का स्मरण नहीं होता क्योंकि अधिकांश सेवा और परोपकार के कर्म, धर्म-कर्म हम लोग दिखावे के लिए करते हैं अथवा प्रचार की भूख शान्त करने। और खूब सारे पुण्य कर्म हम करते तो हैं किन्तु सौ लोगों को जताते भी रहते हैं इससे इनका अंकन न तो हमारी आत्मा में हो पाता है और न ही पुण्य में परिवर्तन। जो कुछ करते हैं वह वहीं का वहीं रह जाता है, हमारे पास कुछ नहीं रहता।

जबकि दूसरी ओर हम अपने पूरे जीवन में जो भी पाप कर्म करते हैं, चाहे वे सायास हों अथवा अनायास, सूक्ष्म हों या बड़े, आज किए हों अथवा बीत समय में, सब कुछ हूबहू हमारी आत्मा के पटल पर पूरा का पूरा अंकित होता है और उसकी स्मृति हमारे दिमाग से मिटती नहीं, और इनका शरीर पर प्रभाव पड़ता है वो अलग।

दिल-दिमाग और शरीर इन तीनों स्तर के अलावा आत्मा में इसकी पूर्ण रिकार्डिंग भी रहती है। हम जो भी पाप कर्म करते हैं उनमें से अधिकांश अकेले ही करते हैं और एकान्त में।

कई सारे पाप कर्म हम अपनी ही तरह के पापकर्म में प्रवृत्त उन लोगों की भागीदारी में करते हैं जो कि पापों में समान रूप से भागीदार होते हैं अथवा एक-दूसरे के पापों के बारे में सब कुछ जानते हैं। हमे अपने पापों को छिपाने के लिए हमेशा चौकन्ना रहना पड़ता है यहां तक कि नींद में भी हम पाप के बारे में न बड़बड़ा दें, इसकी भी चिन्ता हमेशा सताये रखती है।

पाप कर्म को छिपाने के लिए दूसरी तरह के पापों और झूठ का सहारा लेना पड़ता है, हमेशा अपने पाप कर्मों को याद रखते हुए उन्हेंं छिपाए रखने के लिए सतर्कतापूर्वक गंभीर प्रयासों की जरूरत पड़ती है। इस तरह हमारे जेहन से पाप कर्म पीछा नहीं छुड़ा पाते हैं और हर क्षण स्मृति पटल पर छाए रहते हुए हमारे भीतर अपराध बोध और आत्महीनता के भावों का ज्वार उमड़ाते रहते हैं।

पाप चाहे किसी भी प्रकार के हों, इनकी स्मृति हमारे जीवन में निराशा और हीनता का संचार करती रहती है और हमेशा हमें अपने किए हुए कर्मों का बोध बना रहता है। इंसान की जिन्दगी का यही एक काला प़क्ष है जिसे न वह अभिव्यक्त कर सकता है न मिटाकर राहत पा सकता है।

बहुत से लोग जिन्दगी भर इसी कारण दुःखी और हताश रहते हैं कि उनसे चाहे-अनचाहे पाप तो हो जाते हैं किन्तु वे इन्हें चाहकर भी भुला नहीं पाते हैं। इस वजह से उनकी जिन्दगी का सुख-चैन छीन जाता है और वर्तमान अभिशप्त हो जाता है। जो अपने पापों का सार्वजनीन प्रकटीकरण कर देता है वह पापों से शीघ्र मुक्त हो सकता है, इसलिए जो पाप किए हों, उन्हें लोगों को बताते रहें। इनका जितना अधिक प्रचार होगा, प्रतिष्ठा को भले ही क्षणिक खतरा हो, किन्तु पापों का क्षरण होता रहता है।

कई लोग अपने पापों को ही याद करते हुए देह त्याग देते हैंं। पापों के बोझ से दुःखी लगभग सभी लोगों को यह इच्छा रहती है कि उनसे जो पाप कर्म हो गए हैं उनका प्रायश्चित कैसे करें, किस तरह अपने पापों के फल से मुक्ति पाएं और किस प्रकार पापमुक्त जीवन पा लें।

पापों के प्रायश्चित के बारे में यह शाश्वत सत्य है कि जिस किसी इंसान को अपने द्वारा किए गए गलत कर्म के बारे में अन्तर्मन से यह भान हो जाए कि उसने जो कुछ किया, वह गलत था और उसे पाप लगेगा ही।

अपने कर्म के पापकर्म होने का बोध होना ही अपने आप में इस बात को इंगित करता है कि ईश्वर उसे माफ करने को तैयार है बशर्ते कि वह अपने पापों को पूरी तरह स्वीकार कर ले, और शेष जीवन के लिए ईश्वर के समक्ष अथवा अपने ईष्ट देवता या माँ-बाप के समक्ष यह संकल्प ग्रहण कर ले कि इस पाप को कभी दोहराएगा नहीं।

ऎसा प्रण करने मात्र से उसका प्रायश्चित हो जाता है लेकिन उसे यह ध्यान में रखना होगा कि दुबारा पाप कर्म न होने पाए। इसी प्रकार जानबूझकर किए गए पाप कर्म को भी यदि ईश्वर या ईष्ट देवता अथवा अपने माता-पिता के समक्ष खुलकर पूर्णरूप से स्वीकार कर लिया जाए और किसी भी रूप में नहीं दोहराने का संकल्प ग्रहण कर लिया जाए तो भगवान उस पाप के लिए जो फल निर्धारित है उसे तो नष्ट नहीं कर सकता है किन्तु पाप के फल का भोगकाल आने के समय अतिरिक्त ऊर्जा और सहनशीलता तथा सहज भाव से पाप का फल भोगने के लिए जरूरी कारकों की व्यवस्था कर देता है।

परमात्मा इतना दयालु है कि एक बार उसकी शरणागति प्राप्त कर लेने के उपरान्त वह भक्त का पूरा ध्यान रखता है और उसका उद्धार कर देता है। जो पाप कर्म हो गए, उनके बारे  में चिन्ता का पूरी तरह परित्याग करें, और पक्का प्रण ले लें कि न वैसा पाप दोहराएंगे, न ही किसी और के पापकर्म में सहयोग करेंगे।

इसके साथ ही पापियों का संग, उनके साथ खान-पान और सभी प्रकार का व्यवहार त्यागना भी अनिवार्य है। जो हो गया उसे भक्ति, ध्यान और साधना का आश्रय पाकर चित्त और दिमाग से एकदम बाहर निकाल लें और सेवा, परोपकार व पुण्य कार्य में शेष जीवन को लगा लें।

इससे अपने आप पुण्य में अभिवृद्धि होगी और पाप का प्रायश्चित भी हो जाएगा। भगवान वेद व्यास की इस उक्ति को भी जीवन भर याद रखें – अष्टादश पुराणेषु व्यासस्य वचनद्वय, परोपकाराय पुण्याय पापाय परपीड़िनम्॥