न करें कल की प्रतीक्षा
OLYMPUS DIGITAL CAMERA

न करें कल की प्रतीक्षा

समय न किसी का सगा होता है, न शत्रु। हम ही हैं जो समय को पहचान नहीं पाते और इसकी बेकद्री करते रहते हैं।  जो समय की कद्र नहीं करता, समय भी उसकी परवाह नहीं करता।

यह  समय ही है जो अच्छे-अच्छे आलसियों और प्रमादियों को समय से पहले ही ठिकाने लगा देता है और हालत इतनी अधिक खराब हो जाया करती है कि चाहे कितना ही समय अच्छा चल रहा हो, इनके लिए हर समय बुरा ही बुरा बना रहता है।

समय उसी का होता है जो समय को पहचानता और सम्मान करता है। समय को पहचानने वाले लोग बहुत कम हुआ करते हैं लेकिन समय की उपेक्षा करने वाले लोगों की भरमार सब जगह है। समय हमेशा अपनी गति से चलता रहता है और जो उस गति के साथ अपनी गति का मेल कर देता है उसे समय भरपूर सम्बल, प्रोत्साहन और खुशहाली देता रहता है।

समय का मोल पहचानने के सिवा दुनिया में और कोई दूसरा धन है ही नहीं। समय ही सबसे बड़ा धन है जो सभी प्रकार के ऎश्वर्य प्रदान करने में समर्थ है।  बहुत से लोग समय को कोसते रहते हैं  और कुढ़ते रहते हैं कि समय उनके पक्ष का नहीं है, समय खराब चल रहा है, ग्रह-गोचर ठीक नहीं है आदि-आदि।

यह सब कहने की बातें हैं। जो लोग आलसी, कामचोर और कामटालू बने रहते हैं उनके लिए शैशव से लेकर मरने तक का कोई सा समय ठीक नहीं हो सकता बल्कि हर पल उन्हें यही लगेगा कि समय खराब है।

खुद कितने खराब हैं यह कहने और स्वीकारने में इन्हें संकोच होता है। आजकल उन लोगों की भीड़ बढ़ती जा रही है जिनसे कोई मेहनत नहीं होती, आज का काम कल पर टालते हुए इन लोगों को बरसों निकल जाते हैं और असमय बुढ़ापा घेर लेता है लेकिन समय पर काम पूरा करने की अक्ल तब भी नहीं आती।

इनका कल या परसों कभी नहीं आता। इनके मरने के बाद इनके लिए जरूर कहा जा सकता है कि कल या परसों स्वर्ग सिधार गए। दुनिया में वह हर इंसान असफल, असन्तोषी और उद्विग्न रहेगा ही जो कि अपने रोजमर्रा के कामों को आज नहीं कर कल-परसों पर टालता रहता है।

ये लोग भले ही कामों से जी चुराकर टाईमपास करने और मुफ्त की कमाई खाने की गहरी आदत बना लें लेकिन इनकी जिन्दगी को न सफल कहा जा सकता है न सुखी। आजकल कर्म करने की बजाय कल पर टालने और दूसरों पर थोंप देने की स्थितियाँ हावी हो रही हैं।

यही कारण है कि कोई भी इंसान सुखी, स्वस्थ-मस्त और संतोषी महसूस नहीं कर पा रहा। हर दिन आदमी के लिए नया दिन होता है और जब दिन पूरा होता है, शयन की तैयारी का समय आता है तब यदि आत्मचिन्तन करते हुए हमें यह सुकून मिल जाए कि आज का काम हमने आज ही कर लिया है और जितना मेहनताना हम पा रहे हैं उतना काम करने का संतोष है, तभी इंसान को निद्रादेवी अपनी गोद में स्थान देकर पूरी निश्चिन्तता के साथ सुलाती है।

ऎसा सुकून व संतोष प्राप्त नहीं होने की स्थिति में हमें न नींद आ सकती है न सुखकारी स्वप्नों का आनंद। खूब सारे ऎसे कामचोर और कामटालू लोग हैं जिन्हें तरह-तरह की गोलियां लेनी पड़ती हैं तब जाकर नींद आ पाती है अन्यथा रात भर बिस्तर पर करवट बदलते रहते हुए दर्द भर हाथ-पांव इधर-उधर पटकते रहते हैं।

खूब सारे लोगों के घरवाले इस कारण से परेशान हैं कि जो लोग दिन में काम नहीं करते, उन लोगों के घण्टों बैठे रहकर जड़ता पा जाने के कारण हाथ-पांव दबाए बिना चैन नहीं पड़ता। जो लोग अपने निर्धारित कामों को रोज नहीं निपटा पाते, वे अपने संस्थानों की साख को बट्टा लगाते हैं, व्यवस्था और तंत्र की विश्वसनीयता खतरे में डालते हैं और समाज तथा देश का पैसा खाने के बावजूद समाज और देश के लिए किसी काम के नहीं होते।

लगता है कि जैसे ये लोग भिखारियों की तरह आते हैं, हाथ पसार कर मांगते हुए तफरी करते रहते हैं और किसी न किसी तरह का नशा करते हुए अधमरे या मरे हुए इंसान या जानवर की तरह कहीं खटिया में गिर जाया करते हैं।

कर्मयोग के प्रति लापरवाही का ही आलम यह है कि इससे आत्मतोष खण्डित होता जा रहा है और इसका सीधा सा प्रभाव इन निकम्मों और झाँसेबाजों के चेहरे-मोहरे और बॉडी लैंग्वेज पर पड़ रहा है।

लगता है कि जैसे मलीन मुख और बेड़ौल देह को लिए ये लोग मायूसी और शोक के सागर में ऎसे डूबे हुए हैं कि कई जन्मों से इन्हें कोई बाहर नहीं निकाल सका है।

जो जितना काम अटकाएगा, जितना हराम का खाएगा, वह जल्दी ऊपर जाएगा या जब तक बिना मेहनत का खाया एक-एक पैसा फूटकर बाहर नहीं निकलेगा, तब तक यमराज लेने नहीं आएगा।

अब हिसाब-किताब इसी जन्म में होने लगा है। सभी कामचोरों, आलसियों और प्रमादियों के जीवन का यही सत्य है जो उनके उत्तरार्ध में सार्वजनीन होने लगता है।

समाज और राष्ट्र के लिए वे लोग शत्रु हैं जो समय पर काम नहीं करते, टालते हैं और तंत्र की छवि खराब करते हैं। पृथ्वी पर इन्हीं लोगों का भार सबसे ज्यादा बढ़ रहा है और सारी आपदाओं के मूल में ये ही लोग हैं।