Dr. Deepak Acharya

रिटायरमेंट की प्रतीक्षा न करें

भविष्य की कल्पनाओं का ताना-बाना बुनने और ख्वाबों का संसार रचने में हमसे आगे कोई नहीं है। हम सभी उसी मिट्टी के बने हैं जिसमें ही वह तासीर समायी है कि भविष्य की लकीरों को खींचते हुए हम वर्तमान को अच्छे से गुजारने के गुर सीख गए हैं वहीं भावी सुकूनों के स्वप्न देखना भी हमें अच्छी तरह आता है और भाता भी। इससे हम वर्तमान में कर्म करने के बोझ से अपना बचाव भी कर लिया करते हैं और सब कुछ भविष्य पर टाल देकर कुछ हल्कापन भी महसूस कर लेते हैं।

बात उन लोगों की है जो किसी सरकारी, अद्र्ध सरकारी और गैर सरकारी नौकरियों और काम-धंधों में लगे हुए हैं। इनमें से अधिकांश लोगों ने अपने जीवन को एक निश्चित समयावधि की फ्रेम में फिट कर लिया होता है जहाँ से इंच भर भी बाहर सरकना या हिलना-डुलना इन्हें अच्छा नहीं लगता।

ये लोग इसी फ्रेम के चारोें ओर चक्कर काटते रहते हैं। थके-हारे और माँदे-बेचारे होने पर कभी कोनों पर दुबक कर बैठ जाते हैं तो कभी थोड़ी-बहुत परायी ताकत आ जाने पर चतुर्दिक दौड़ लगाने लगते हैं।

इन नौकरीपेशा और नौकरशाह लोगों में से अधिकांश के मन में कई सारे ऎसे काम होते हैं जो वे करना तो चाहते हैं लेकिन इसके लिए उन्हें अपने रोजमर्रा के रूटीन कामों और बंधे-बंधाये ढर्रे से मुक्ति चाहिए होती है।

इसीलिये वे रोजाना खूब सोचते-विचारते हैं, इष्ट मित्रों और घरवालों से चर्चा भी करते हैं और अन्ततः बात वहीं आकर अटक जाती है कि रिटायरमेंट के बाद देखेंगे, तब ये ही तो काम करेंगे, जो आज सोच रहे हैं।

जो लोग अपने जीवन के स्वप्नों और कल्पनाओं को रिटायरमेंट के बाद पूरा करने की सोचते हैं, उनमें से नब्बे फीसदी लोग ऎसा नहीं कर पाते। रिटायरमेंट की अवस्था तक पहुंचते-पहुंचते इनकी सोच और कल्पनाओं का दायरा तो विराट होता चला जाता है किन्तु कर्म करने की क्षमताओं को धारण करने वाला शरीर उत्तरोत्तर क्षीण होने लगता है। और कई बार परिस्थितियां भी अनायास  प्रतिकूल होने लगती हैं।

तब शरीर और मन-मस्तिष्क में अजीब सा असंतुलन पैदा हो जाता है। ऎसे में रिटायरमेंट के बाद भी ये लोग कुछ खास नहीं कर पाते हैं और अन्ततः अधूरी आशाओं और आकांक्षाओं के साथ वहीं पहुंच जाते हैं जहाँ से आये होते हैं।

जो लोग जीवन में सद्कर्म या किसी महान उद्देश्य को पाना चाहते हैं और इसके लिए रिटायरमेंट की प्रतीक्षा करते हैं, उनमें से दो-चार फीसदी लोगों को छोड़ दिया जाए तो शेष सभी लोग रिटायरमेंट के बाद कुछ नहीं कर पाते हैं। अथवा कुछ कर पाने की उनकी मानसिक और शारीरिक स्थिति नहीं होती। इनमें से काफी लोग ऎसे होते हैं जिनका मन होता है कि कुछ करें लेकिन शरीर साथ नहीं देता।

हमारे अपने क्षेत्र में या आस-पास ऎसे बहुतेरे रिटायर्ड महानुभाव हैं जिन्होंने अपनी नौकरीपेशा जिन्दगी में रिटायरमेंट के बाद की नई जिन्दगी जीने के कई सपने बुने थे लेकिन उनमें से एक भी कार्य अब नहीं कर पा रहे हैं। सिवाय डेरों पर भीड़ की तरह जमा होने और पुराने जमाने में पनघट पर पानी भरने आयी महिलाओं की घर-गृहस्थी की चर्चाओं की तरह पारस्परिक समूह बनाकर संवाद करते रहने और टाईमपास जिन्दगी जीने के सिवा उनमें कुछ करने का ज़ज़्बा ही शेष नहीं रह गया है।

वरना इन लोगों के पास ज्ञान और अनुभवों की कोई कमी नहीं है। इस मामले में इनसे बड़ा कोई बौद्धिक टैंक कोई और हो ही नहीं सकता। लेकिन बुजुर्गियत की अवस्था ही कुछ ऎसी होती है कि कुछ नया कर पाने का साहस रिटायरमेंट होते ही कुछ दिन में पलायन कर जाता है और पूरा जीवन यथास्थितिवादी और आरामतलब हो जाता है जहाँ आगे कुछ भी करने की सारी इच्छाएं यौवन पर आते-आते ही मर जाया करती हैंं।

रिटायरमेंट से पहले और बाद की स्थितियों में जमीन-आसमान का अंतर आ जाता है। जो स्वप्न रिटायर होने से पहले आदमी बुनता है, रिटायर हो जाने के बाद वे तकरीबन सारे नेपथ्य में चले जाते हैं।

शरीर की स्थिति कमजोरी के साथ ही कई बीमारियों का घर हो जाती है, थकान ज्यादा सताने लगती है। कई बार रिटायर आदमी भला-चंगा भी हो तो घर वाले उसे इतना परेशान कर देते हैं कि बेचारा कुछ भी नहीं कर पाता, और जैसे-तैसे जिन्दगी की गाड़ी आगे बढ़ते रहने का इंतजार करता रहता है।

कइयों के साथ उनके जीवन संगी-संगिनी ऎसे होते हैं जो चाहते हुए भी आगे नहीं बढ़ने देते और भरा-पूरा परिवार होने के बावजूद कितने सारे गृह कलहों या घरेलू कामों में फाँद देते हैं। कइयों की जिन्दगी बरबाद कर डालने में उनके सहधर्मियों और सहकर्मियों का भी भरा-पूरा योगदान रहता है।

रिटायरमेंट के बाद कुछ कर लेने का स्वप्न देखने वालों में से कई तो रिटायर होने से पहले या कुछ माहों बाद ही भगवान को प्यारे हो जाते हैं, कई दूसरी नौकरियों या धंधों को अपनी प्राथमिकता बना कर फिर उन्हीं कामों में लग जाते हैं जो बरसों से करते आ रहे होते हैं।

बहुत सारे लोग रिटायरमेंट को मृत्यु के परिक्रमा स्थल मेंं प्रवेश मानकर आत्महीनता के दौर में जीने को नियति मान लेते हैं। बहुत थोड़े लोग ही ऎसे होते हैं जो पूरे जीवट के साथ सामाजिक सेवा के उन कार्यों में भागीदार हो जाते हैं जिनके लिए वे रिटायर होते समय अपना मानस बना चुके होते हैं। खूब सारे महानुभाव रिटायर होने के बाद भी स्वार्थ और ऎषणाओं की अंधी दौड़ में कोल्हू के बैल की तरह फंसे रहते हैं और बुढ़ापे तक को खराब करते रहते हैं।

जो भी लोग कहीं रमे हुए हैं उन्हें चाहिए कि समाज की सेवा या रचनात्मक कर्म में जुटने का काम करने के लिए रिटायर होने का  इंतजार न करें बल्कि किसी भी तरह समय निकाल कर धीरे-धीरे अपनी समाजोन्मुखी एवं लोकचेतना गतिविधियों का सूत्रपात करना आरंभ कर दें ताकि रिटायर होने के बाद वे स्वच्छन्द और मुक्त होकर इन्हें और अधिक व्यापकता के साथ संचालित कर सकें।

जो लोग इंतजार करते रहते हैं उन्हें यह भी अच्छी तरह समझ लेना चाहिए कि एक तरफ जहाँ वे रिटायरमेंट के बाद नया काम शुरू करने के लिए नये आकाश का निर्माण करते हैं और इसके लिए रिटायर होने की प्रतीक्षा करते हैं, वहीं दूसरी ओर मौत भी मुक्त होकर कभी भी हमला कर सकती है। और कुछ नहीं तो कभी दिमाग अपना काम करना छोड़ देता है और कभी अपने शरीर के अंग। ऎसे में वानप्रस्थाश्रम और संन्यायाश्रम का कोई औचित्य नहीं रह जाता।

खूब सारे हैं जिनके बारे में कहा जाता है कि पहले तो अच्छे थे लेकिन रिटायर होने के बाद सठिया या पगला गए हैं और अब किसी काम के नहीं रहे। और कुछ के बारे में आम धारणा है कि इन्हें पैसों, प्रतिष्ठा और सम्मान का इतना अधिक लोभ-मोह है कि लगता ही नहीं ये मरते दम तक कभी रिटायर होंगे।

ऎसे में हम सभी के लिए अच्छा यही होगा कि कल के कामों को आज ही शुरू करने की आदत डालें और अच्छे कामों के लिए रिटायरमेंट की प्रतीक्षा न करें। रिटायरमेंट जीवन प्रवाह का मोड़ है, स्पीड़ब्रेकर या बेरियर नहीं।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *