न बने रहें कछुआछाप खुदगर्ज

न बने रहें कछुआछाप खुदगर्ज

हम चाहे कितने सजग, व्यस्त और मस्त रहने के लिए जतन करते रहें मगर हम तब तक हमारे ध्येय की प्राप्ति नहीं कर पाएंगे जब तक कि हमारा आस-पास का माहौल और परिवेश खूबसूरत न हो,  ताजगी और सुकून से भरा न हो।

परिवेश के अनुकूल होने की स्थिति में ही हम आनंद प्राप्त कर सकते हैं। चाहे वह आनंद भीतरी हो या बाहरी। बहुत से लोग अपने ही अपने में खोये रहते हैं और इन्हें देख कर लगता है कि ये धर्मशाला में मुफत में रहने, खाने-पीने और मौज उड़ाने वालों जैसे ही हैं।

हमारे पास समय तो खूब है किन्तु दिशा और दृष्टि दोनों का अभाव है।  इसलिए फालतू के दुनियावी प्रपंचों में टाईमपास करते रहते हैं जिसका न कोई औचित्य सामने आ पा रहा है और न ही उपलब्धि। आदमी उपन्यास की तरह जीवन जीने लग गया है जिसका कोई उपयोग नहीं।

आजकल इंसानों में सबसे बड़ी बुराई या महामारी यह देखी जा रही है कि उसे यह भान ही नहीं है कि उसे अपने घर, कर्मस्थल, ज्ञानकेन्द्र, अध्यात्म धाम और अपने परिसरों के लिए क्या कुछ करना है और क्या करना चाहिए।

कई बार पशु बुद्धि लोग बार-बार हाँकने पर बताए हुए कामों को कर डालते हैं लेकिन ये काम उनकी रोजमर्रा की आदत में कभी शुमार नहीं होते।

एक इंसान की पूरी जिन्दगी प्रशिक्षण कार्यशाला है और उसमें हरेक दिन कोई न कोई ज्ञान एवं अनुभव जुड़ता चला जाता है। और यही खजाना इंसान को परिपूर्णता देने के साथ ही उसे अन्यतम और सर्वश्रेष्ठ होने के भरपूर अवसर प्रदान करता है।

इसलिए इंसान का समग्र जीवन बहुआयामी कौशल से भरापूरा होना चाहिए न कि केवल दो-चार कामों में प्रावीण्य प्राप्ति होकर सर्वज्ञ समझ लेना।

आज का जमाना बहुउद्देश्यीय कर्मयोग और बहुआयामी हुनर चाहता है। वो जमाना बीत गया जब एक इंसान से एक-दो कामों की ही अपेक्षा की जाती थी।

अब हर क्षेत्र में ऎसे लोगों की मांग बढ़ने लगी है जो कि कई सारे विषयों और हुनरों में दक्ष हों। इस स्थिति को पाने के लिए मनुष्य का एकांगी होना सर्वाधिक घातक है।

व्यक्तित्व का पूर्ण विकास केवल शिक्षा या किसी हुनर से नहीं हो सकता बल्कि पूर्ण इंसान वही हो सकता है कि जिसे जीवन और जगत के बारे में सभी तरह का छोटे से छोटा और बड़े से बड़ा ज्ञान हो।

उसमें जीवन को अच्छी तरह से जीने के सारे व्यावहारिक गुण हों जिनका कि जिन्दगी में कभी भी उपयोग कर अपने काम निकाल सके, औरों के काम आ सके और ऎसा कुछ कर सके कि लोग उसे समाज और क्षेत्र के लिए उपयोगी मानें।

आजकल बहुसंख्य लोग

खासकर नई पीढ़ी व्यक्तित्व के सर्वांगीण विकास की दृष्टि से असफल  सिद्ध हो रही है। इस पीढ़ी के लोगों को सिवाय पढ़ाई-लिखाई और कमाई के कुछ नहीं आता। न साफ-सफाई से वास्ता है, न समय पर नहाने-धोने, न पेड़-पौधों से कोई सरोकार है, न आस-पास की किसी गतिविधि से।

हमारी परिवेशीय संवेदनाएं इतनी अधिक मर चुकी हैं कि हम खुदगर्जों और अव्वल दर्जे के स्वार्थी लोगों को अपने आप से ही मतलब है। हमारे आस-पास के लोग कितने अभावों और समस्याओं में जी रहे हैं, हमारे अपने और आस-पास की धरती पर पेड़-पौधे किस तरह सूखते या नष्ट होते जा रहे हैं, हमारे समीप आवागमनरत और रहने वाले पशु-पक्षी दाना-पानी के अभाव में दम तोड़ते चले जाएं, पर हमारी संवेदनाएं कभी जगती नहीं।

जो लोग परिवेशीय स्पन्दनों और हलचलों के प्रति संवेदनहीन होते हैं वे लोग अपने घर-परिवार और मित्रों तक के लिए खुदगर्ज के रूप में ही पेश आते हैं।

जब संवेदनाएं रही नहीं, हमारे भीतर दया-करुणा और जगत कल्याण के भाव रहे ही नहीं, तब यही सब होगा जो आजकल हम देख रहे हैं।

हमारे सामने पशु-पक्षी दाना-पानी के अभाव में मर रहे हैं, हमारे घरों के भीतर और आस-पास पसरे हुए हमें हरियाली का सुकून देने वाले पेड़-पौधे सूखकर असमय नष्ट हो रहे हैं, पानी के भण्डार खत्म हो रहे हैं, और ढेरों काम परिवेश में ऎसे हो रहे हैं कि जिनसे पर्यावरण को खतरा पैदा हो गया है, गंदगी, प्रदूषण और घातक बैक्टीरियाओं का प्रकोप है, फिर भी हम चुप रहते हैं।

कुछ कर पाने की इच्छा तक मर गई है हमारी। असल में हमारे भीतर मनुष्यता से जुड़ी जो भी संवेदनाएं थीं उनकी पूरी निर्ममता के साथ  अकाल मौत हो गई है और अब हम जो कुछ ढोंग-पाखण्ड और दिखावा करने लग गए हैं वह केवल और केवल इसलिए कि और लोग हमें कुछ न कहें, लोगों के सामने हमारी छवि बहुत बढ़िया बनी रहे।

हम कितने ही पैसे वाले हो जाएं, संसाधनों की भरपूर खेती हमारे अपने आँगन में होती रहे, लोग हमें लोकप्रिय कहकर सर पर बिठाये रखें और हमें आसमानी ऊँचाइयों पर होने का भ्रम पैदा करते रहें, यह सब हमें आत्म आनंद की प्राप्ति नहीं करा सकता यदि हम प्रकृति और परिवेश के प्रति उदासीन बने हुए हैं।

परिवेश से जुड़ी कोई सी धारा यदि विपरीत होगी तो उसका खामियाजा दूसरों के साथ-साथ हमें भी भुगतना पड़ेगा ही। इसलिए कछुआ छाप और कूप मण्डूकिया दायरों से ऊपर उठें और आस-पास के प्रति संवेदनशील रहें अन्यथा लाख कोशिशों के बावजूद न हम आत्म आनंद पा सकेंगे और न ही हमारा कोई लक्ष्य हमारे करीब आ पाएगा।