न हाथ पसारे, न पाँव फैलाएं

हर कोई चाहता है कि उसका पूरा जीवन बिना किसी बाधा के चलता रहे और हर प्रकार का सुकून मिलता रहे। लेकिन लोगों को हमेशा अपनी जिंदगी से यह शिकायत बनी रहती है कि उनके लिए जीवन भर समस्याओं का आवागमन बना रहता है जिसकी वजह से वे हमेशा तनावों में रहते हैं और इनकी वजह से दूसरे लोग भी तनाव में रहते हैं।

तनावों और समस्याओं का प्रभाव ही ऎसा है कि कोई व्यक्ति निर्जन कंदराओं में रहे या संसार के बीच, हर तरफ इन्हें देखा जा सकता है। माना जाता है कि वर्तमान में कोई-कोई ही बिरले होंगे जो तनावों और समस्याओं से मुक्त रहते होंगे, वरना आजकल आदमी की जिंदगी का अधिकांश भाग तनावों और परेशानियों के दौर से गुजरता है। कोई तनाव में रहता है, कोई तनाव देता है।

आमतौर पर हमारी पूरी जिंदगी में जो-जो समस्याएं या बाधाएं आती हैं उनमें से अधिकतर के लिए कोई और नहीं, बल्कि हम खुद ही जिम्मेदार होते हैं। हालांकि हम इस बात को स्वीकारने का माद्दा कभी नहीं जुटा पाते, मगर है यह सौ फीसदी सत्य।

हमारी समस्याओं, परेशानियों और तनावों की शुरूआत ही तब होती है जब हम अपनी प्रतिभाओं, अपनी खाल और औकात से ज्यादा बढ़-चढ़ कर कुछ करने के लिए उतावले होने लगते हैं। हमें अपने बारे में हमेशा यह भ्रम बना रहता है कि लोग हमें पसंद करते हैं, हम अपने फील्ड में सर्वाधिक लोकप्रिय हैं या लोग हमारी बातों को हृदय से मानते हैं या फिर हमारे कहने में हैं। लेकिन यह हमारा भ्रम ही रहता है जो न कभी सच्चाई पा सकता है, न सच माना जा सकता है।

आजकल हमारी सारी परेशानियों की जड़ यही है कि हम अपने आपको इतना ज्यादा अतिव्याप्त और महान समझने लगते हैं कि हमें दूसरे सारे लोग बौने दिखाई देते हैं। यह वह संक्रमण काल होता है कि जब हम ढपोड़शंख की तरह बजने और परिभ्रमण करने लगते हैं और अपने आप को इतना अधिक ऊँचा मान लेते हैं जहाँ से नीचे उतरना खुद हमारे बस में भी नहीं होता।

जो लोग अपनी औकात जानते हैं वे अपने ही काम-धंधों और रचनात्मक प्रवृत्तियों का एक निश्चित दायरा बना लिया करते हैं और पूरी मस्ती के साथ उसी में रमते हुए आनंद का अनुभव करते रहते हैं। इस आनंद को कोई परिमाण में नहीं नाप सकता बल्कि अनिर्वचनीय और शाश्वत होता है।

इसके ठीक विपरीत हमारे आस-पास खूब सारे लोग ऎसे हैं जो कि अपने आप में हैं कुछ नहीं, लेकिन दिखाएंगे ऎसे कि दुनिया भर में उनके मुकाबले कोई मेधावी-प्रतिभाशाली, प्रज्ञावान और समर्थ और कोई है ही नहीं।

ऎसे लोग अपने दायरों से बाहर निकल कर कभी अलग-अलग बाड़ों में घुसपैठ कर रौब जमाने की कोशिश करते हैं, कभी राजपथों में दिन-रात फेरी लगाने वालों की तरह भ्रमण करते हुए अनचाहे ही अपनी मौजूदगी का भान कराते रहते हैं, और कभी हाईवे से होकर पूरे जंगल को अपना चरागाह मान लेने का भ्रम पाल लिया करते हैं।

ये लोग बाहरी सहारों से अपने आपको हर गलियारों में प्रतिष्ठित करने के लिए हर प्रकार की जायज-नाजायज सीढ़ियों, वल्लरियों और खंभों का इस्तेमाल करते हुए उन सभी तरह के लोगों से चिपके रहा करते हैं जिनसे कि इन्हें आगे बढ़ने में सहायता मिलने की उम्मीदें हुआ करती हैं।

अपनी क्षमताओं से अधिक की कामना रखते हुए सब प्रकार के धंधों में रमे हुए लोगों को अपनी इच्छापूर्ति के लिए जाने-अनजाने भांति-भांति के समझौते करने पड़ते हैं, स्वाभिमान को गिरवी रखकर चलना पड़ता है, अपने आपको सारी हदें पार कर समर्पित हो जाने को विवश होना पड़ता है और वो सब भी करना पड़ता है जो सामने वाले हमसे उम्मीद करते हैं।

अपने दायरों को भुलाकर जो लोग ऎषणाओं के सागर में महास्नान को उतावले होने के लिए डेल्टा के घुमावदार भँवर में आ जाते हैं वे अपने आप अपनी परेशानियों के जनक हो जाते हैं और यहीं से उनकी समस्याओं, पीड़ाओं और तनावों की यात्रा भी अपने उत्कर्ष को पाने लग जाती है।

जो लोग परेशानियां होने या दूसरे लोगों से परेशान होने की बातें किया करते हैं उन लोगों को एक बार अपने आपको देखना चाहिए कि वे खुद किस दिशा में बढ़ते जा रहे हैं, अपनी मानसिकता कैसी होती जा रही है, कहीं अपनी खाल से बाहर तो नहीं निकल आएं हैं या फिर लोग हमारी और अंगुली उठाते हैं, उसका कोई तो कारण होगा।

इन सारे यक्ष प्रश्नों का जवाब ही हमारी सारी समस्याओं से मुक्ति दिलाने वाला हो सकता है। पर यह भी तभी जब हम ईमानदारी से अपने बारे में सोचें, अपने व्यवहार और लोक धारणाओं का चिंतन करें। जो लोग अपनी औकात में रहना छोड़ देते हैं वे जीवन भर तनाव झेलते भी हैं तथा दूसरे लोगों को तनाव देने में माहिर भी हो जाते हैं।

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