दुष्टों को न दें आश्रय-प्रश्रय

जब से समाज में अच्छे-बुरे के मूल्यांकन की दृष्टि प्रदूषित हो गई है तभी से बुराइयों और बुरे लोगों को प्रोत्साहन, आदर-सम्मान और श्रद्धा प्राप्त होने लगी है। और लोग भी अपने निम्नतर स्वार्थों और दैहिक भोग-विलास तथा दिखावों के लिए लुच्चों-टुच्चों के आगे सर झुकाने लगे हैं, उन्हें रहनुमा और भगवान मानने और मनवाने लगे हैं। और इसी मनोवृत्ति का खामियाजा आज समाज भुगत रहा है जहाँ कि सच्चे, अच्छे सज्जनों को हाशिये पर धकेल दिया गया है और उनका स्थान ले लिया है गुण्डे-बदमाशों और लोफरों-उचक्कों ने।

समाज की दुर्दशाग्रस्त स्थिति यह है कि अच्छे को सार्वजनीन रूप से अच्छा कहने की उदारता नहीं है और बुरे को एकान्त में भी बुरा कह डालने का हमारा साहस नहीं है। सज्जन असंगठित हैं और दुर्जन संगठित। यही कारण है कि असामाजिकता, अपराध और भय का माहौल दिखने लगा है।

हममें से तकरीबन सारे लोग चिल्लपों मचाते हैं कि जमाना खराब होता जा रहा है, भय और असुरक्षा का माहौल देखा जा रहा है और अशान्ति तथा आशंकाओं से जनजीवन घिरता जा रहा है।  लेकिन हममें से किसी को सच कह पाने का साहस नहीं है कि आज जो कुछ दिख रहा है उसके लिए केवल और केवल हम लोग ही जिम्मेदार हैं जिनके नीच स्वार्थों और लोभ-लालच की वजह से आज माहौल खराब दिखने लगा है।

हम सारे लोग महात्मा गांधी के सत्य और अहिंसा की बात करते हैं लेकिन हममें से कितने लोग हैं जो सत्य और अहिंसा को जीवन में अपनाते हैं? इस प्रश्न पर हम सारे निरुत्तर हैं क्योंकि हम सब झूठे, दोषी और पापी हैं और हमारे भीतर असत्य, हिंसा और व्यभिचारी स्वभाव के पापों का स्थूल प्रकटीकरण हमारे सामने हो रहा है।  इसलिए औरों पर दोष मढ़ने की बजाय सबसे पहला कर्तव्य यही है कि हम अपने आपको देखें और निर्णय लें।

वर्तमान समय की सबसे बड़ी त्रासदी यही है कि सब कुछ ज्ञान और अनुभव लुटा दिए जाने के बाद पता चलता है कि जो कुछ हुआ वह गलत हुआ है। इस मामले में पछतावे के सिवा कोई दूसरा रास्ता शेष नहीं बचता।

अधिसंख्य लोग लेने ही लेने वाले हैं और ऎसे में लोग हर प्रकार के स्वाँग रचकर, झूठ और फरेब का मायाजाल अपना कर तथा हर तरह के गोरखधंधे और हथकण्डे अपनाकर भी वह सब कुछ हासिल कर लेना चाहते हैं जो कि सामान्य और स्वाभाविक तौर पर हासिल नहीं हो सकता।

अपने काम निकलवाने और स्वार्थ को पूरा करने के लिए लोग आज किसी भी हद तक जा सकते हैं। अपने मामूली कामों के लिए लोग दूसरों का चाहे जितना नुकसान कर देने की मानसिकता से भरे हुए हैं और इसी का नतीजा है कि आजकल आदमियों की इतनी बड़ी संख्या होने के बावजूद आदमी का आदमी पर भरोसा नहीं है।

हर तरफ विश्वासहीनता का माहौल है। आज का सबसे बड़ा यक्षप्रश्न यही है कि कि भरोसा करें तो आखिर किस पर। कई बार लगता है कि कोई भरोसेमंद रहा ही नहीं जिसे अपना माना जा सके। आदमी किधर भी जा सकता है, पाला बदल सकता है बशर्ते कि उसका कोई उल्लू सीधा हो रहा हो।

धर्म, नैतिकता, सदाचार और ईमानदारी जैसे शब्दों का कोई वजूद नहीं रहा। इन पर स्वार्थ भरी मानसिकता हावी है। मानवता पर चौतरफा हो रहे आत्मघाती हमलों को देख कर आभास यही होता है कि आखिर ऎसा क्या हो गया है कि मानवीय मूल्य कराहने लगे हैं और आदमी अपनी मनोवृत्ति बदलता जा रहा है, उसे पैसा दिखता है या भोगवादी संसाधन। और इन सबके लिए कोई मेहनत तक नहीं करनी पड़े तो कितना अच्छा।

बहुधा देखा यह जा रहा है कि लोग उन्हीं के पर कतरने और पहचान मिटा देने की कोशिश करते हैं जिनके सहारे वे किसी मुकाम को पा जाते हैं। एक निर्धारित ऊँचाई और तरक्की या लोकप्रियता की  मुख्य धारा का स्वाद चख लिए जाने के बाद आदमी अपने आपे से बाहर हो ही जाता है और ऎसा कुछ करना शुरू कर देता है जो किसी के लिए अच्छा नहीं होता। 

आदमी कितना ही अच्छा होने का दम भरे मगर किसी साँचे में ढल जाने और फ्रेम में फिट हो जाने के बाद उसके भीतर दंभ और बडप्पन का भाव अपने आप आ ही जाता है। कुछ ही लोग ऎसे होंगे जिनके लिए यह कहा जा सकता होगा कि पद, प्रतिष्ठा और वैभव पा जाने के बावजूद वे अहंकारमुक्त, सरल और सहज हैं अन्यथा अधिकांश लोग अपने आपको भगवान समझने लगते हैं और उसी के अनुरूप व्यवहार करते हुए यह समझते हैं कि पूरी दुनिया उनकी सेवा-चाकरी के लिए ही पैदा हुई है और इन लोगों से हर प्रकार की सेवा पाना उनका जन्मसिद्ध अधिकार है और सेवा पाकर वे औरों के प्रति उपकार ही कर रहे हैं।

इसी के साथ काफी लोग यह अनुभव भी करते हैं कि उनके बनाए, पढ़ाये और आगे बढ़ाए हुए लोग बाद में चलकर जाने किन दुर्गुणों में रम जाते हैं और भस्मासुर जैसा व्यवहार करने लग जाते हैंं।

इस प्रकार के कृतघ्न लोगों की तादाद आजकल सभी स्थानों पर बढ़ती ही जा रही है जो काम निकल जाने के बाद न किसी को इज्जत देते हैं और न ही  अहसान मानते हैंं।

यह बात घर परिवार, समाज और  क्षेत्र से लेकर हर तरफ सौ फीसदी सच्चाई के साथ लागू होती है। हर कृतघ्न इंसान की सोच ही इतनी बिगड़ जाती है कि कुछ कहा नहीं जा सकता। ये लोग हमेशा यही सोचते-समझते और कहते हैं कि लोगों ने जो कुछ किया वह उनका कत्र्तव्य था, इसमें क्या कुछ नया किया।

अपने कर्तव्य से जी चुराने वाले लोग आज दूसरों को कत्र्तव्य की दुहाई देते है। इससे बड़ा और घोर आश्चर्य इस कलियुग में और कुछ नहीं हो सकता।

प्रबुद्धजनों को अपनी जिन्दगी में इस बात का मलाल हमेशा सताए रखता है कि जिन लोगों को उन्होंने ज्ञान और हुनर दिया होता है वे ही उनके सामने हो जाते हैं। आदर-सम्मान की बात तो दूर की है, ये लोग परम शत्रुओं जैसा व्यवहार करने लगते हैं और सीधे शब्दों में कहा जाए तो आजकल भस्मासुरों की संख्या हर क्षेत्र में बढ़ती जा रही है जो उन्हीं को लील जाने को तैयार हैं जो उनके लिए मार्गदर्शक या संरक्षक की भूमिका में होते हैं।

सामाजिकता के साथ यह भयावह संकट का दौर है जिसमें कृतज्ञता के भाव पलायन करते जा रहे हैं और कृतघ्नता का माहौल पसरने लगता है।  इस स्थिति के लिए जिम्मेदार भी हम ही हैं जिन्होंने योग्यता और सभी प्रकार की पात्रता का कोई मानदण्ड अपनाए बिना उन लोगों को ज्ञान या हुनर दे डाला है जो उसके योग्य नहीं थे।

चाहे यह शिक्षा-दीक्षा किसी लोभ-लालच, प्रलोभन या मोह से ग्रस्त होकर ही क्यों न दी गई हो, गलती हमारी भी रही है कि हमने पात्रता का परीक्षण किए बगैर निष्कपट और उदात्त भाव से सब कुछ लुटा दिया।

आम तौर पर सज्जनों में यह कमी होती है कि वे दूसरों को भी अपनी तरह ही सज्जन, शालीन और उदार मानते हैं जबकि हकीकत में ऎसा नहीं होता। लोग हमारी सज्जनता को भुनाने के लिए खुद भी सज्जनता का लबादा ओढ़कर अभिनयी विनम्रता के साथ हमारे करीब आते हैं और दस्यु वृत्ति का इस्तेमाल कर वह सब कुछ हमसे छीन ले जाते हैं जो उन्हें अपेक्षित होता है।

हमारे भोलेपन और सज्जनता का हर प्रकार से इस्तेमाल कर डालने की कला में माहिर लोगों की आजकल कहीं कोई कमी नहीं है। हर सज्जन इंसान ऎसे सैकड़ों लोगों से घिरा हुआ है जो कुछ न कुछ पा जाने के लिए आतुर और उतावले हैं और मौके की तलाश में हैं। जहाँ मौका मिला, वहाँ डाका डाल दिया और वह भी सम्पूर्ण प्रेम, श्रद्धा और आत्मीयता जताकर।

अभिनय भी ऎसा जीवन्त कि इसकी हकीकत का पता लगे तब भी सालों बाद। इन सभी प्रकार के हालातों का एकमात्र हल यही है कि जो कुछ हुनर या ज्ञान किसी को दें, उससे पहले उसकी असलियत जान लें, यह देख लें कि जिसे दिया जा रहा है वह पात्र है भी या नहीं।

पात्रता का परीक्षण किए बगैर जहाँ जो कुछ होगा वह आत्मघाती ही होगा। शास्त्रों में अपात्रों को कुछ भी देने पर जबर्दस्त वर्जना लगाते हुए कहा गया है – अशिष्याय न देयम्। यो यदि मोहाद्दास्यति स पापियान भवति। अर्थात अयोग्य को न दें, यदि मोह से दे भी दिया तो पाप का भागी होना पड़ेगा।

और इस मामले में हम सभी का जिस्म पापों के भार से भरा पड़ा है। दूसरे सारे पापों का तो प्रायश्चित भी हो सकता है किन्तु हमारे इन पापों का कोई प्रायश्चित नहीं है क्योंकि हमारा यह पाप एक-दो जन्म तक ही जुड़ा हुआ नहीं रहने वाला। आने वाली कई सारी पीढ़ियों को हमारे पापों की सजा और नारकीय यंत्रणाएं भुगतनी पड़ेंगी।

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