आकर्षित न  हों, खुद में जगाएँ आकर्षण
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आकर्षित न हों, खुद में जगाएँ आकर्षण

सृष्टि का हर जीवन्त तत्व एक-दूसरे को आकर्षित करता रहा है। यह शाश्वत स्वभाव है। स्वजातीय वस्तुओं, व्यक्तियों, विचारों और तरंगों के बीच सहज, स्वाभाविक और सनातन आकर्षण भाव रहता है चाहे उनके गुणधर्म, स्वभाव और प्रकृति के कितने ही प्रकार क्यों न हों।

दुनिया के अधिकांश कर्म और व्यवहार आकर्षण पैदा  करने के लिए होते हैं। प्रकृति भी समानधर्मा और समानकर्मा ध्रुवों के मध्य कर्षण-आकर्षण की शक्ति का प्रभाव दिखाती है और उसी के अनुरूप सृष्टि के कई सारे प्रवाह समानान्तर दिशा और दशाओं में चलते रहते हैं।

अपने आपको आकर्षक दिखाना और आकर्षक बने रहने के लिए लाख-लाख जतन करना हमारा स्वभाव भी है और कई बार यह मजबूरी भी हो जाती है। दुनिया भर में आकर्षण का अपना अलग ही मनोविज्ञान है जिसके अनुसार आमतौर पर उसे ही आकर्षक बनने की तमन्ना होती है जो सहज स्वाभाविक और प्राकृतिक रूप से आकर्षक न हो।

अन्यथा प्रकृति और इसके पंच तत्वों से बना शरीर अपने आप में मौलिक आकर्षण लिए होता है लेकिन संयमहीनता, अप्राकृतिक या प्रकृतिविरूद्ध खान-पान, स्वभाव और व्यवहार के कारण मौलिक आकर्षण की प्रतिष्ठा को बनाए रखने वाले स्रोत अवरूद्ध हो जाते हैं और इस कारण से आकर्षण खोने लगता है।

यह जरूरी नहीं कि दुनिया में जो लोग या वस्तुएं आकर्षक दिखती हों, वे वास्तव में आकर्षक हों ही। क्योंकि आजकल कृत्रिमता और आडम्बर का जमाना है इसलिए जो कुछ आकर्षण दिखाई देता है वह मिथ्या आभासित होता है और इसके लिए कारक तत्व शरीर या मन-मस्तिष्क और स्वभाव नहीं होकर बाहरी विजातीय द्रव्य हुआ करते हैं।

इस वजह से इसे मौलिक और सनातन आकर्षण की संज्ञा नहीं दी जा सकती। आकर्षण होना और इसे पैदा करने में जमीन-आसमान का अन्तर है और इन दोनों में कहीं कोई समानता नहीं है। इंसान का आकर्षण उसके चित्त की स्थिति पर निर्भर करता है।

जिसका हृदय जितना अधिक निर्मल होगा, स्वभाव जितना अधिक पारदर्शी होगा, मस्तिष्क जितना स्वच्छ होगा, उतना ही इंसान का व्यक्तित्व आकर्षक होगा। ऎसे इंसान को आकर्षण जगाने के लिए बाहरी साधनों और लोगों की कोई आवश्यकता नहीं होती क्योंकि जो कुछ ओज-तेज, चुस्ती-स्फूर्ति उसमें होती है वह उसकी अपनी और भीतरी शक्ति से प्रस्फुटित होती है इसलिए यह अजस्र स्रोत हमेशा खुला रहता है और प्रवाह बना रहता है।

दुनिया भर में सब तरफ चकाचौंध, भौतिक माया और आकर्षणों का अम्बार लगा हुआ है। इनकी ओर भागने वाले लोग अन्ततोगत्वा यह स्वीकार कर ही लेते हैं यह आकर्षण केवल दिखाऊ है और वास्तविकता से कोसों दूर है।

जैसे कि बालों की सफेदी और बुढ़ापे को ढकने के लिए लोग खिजाब-डाई और मेहन्दी को प्रयोग करते हैं लेकिन घर वाले और हेयर ड्रैसर्स को अच्छी तरह पता होता है कि आखिर सच क्या है और कितना छिपाया जा रहा है।

और ऊपर से इस सच को छिपाने के लिए बार-बार कृत्रिमता का सहारा लिया जाता है सो अलग। हर कोई आजकल डुप्लीकेट हुआ जा रहा है। हम वाकई जो हैं उसे न तो जताना चाहते हैं और न ही इस सत्य के प्रकटीकरण का हममें कोई साहब बचा हुआ है।

हम सारे लोग झूठ की बुनियाद पर जिन्दा हैं और पग-पग पर कृत्रिमता और आडम्बरों का खेल खेलने लगे हैं। वर्तमान का आकर्षण सत्य से परे और झूठ के करीब है, हम लोग अब अभिनय करने लगे हैं और अभिनय के जरिये औराेंं को आकर्षित करने और लुभाने के लिए नाना प्रकार के हथकण्डों का सहारा ले रहे हैं।

हम सभी लोग एक-दूसरे को आकर्षित करने के लिए भ्रमों के संसार में जी रहे हैं और नित नए भ्रम पैदा करते रहते हैं। अधिकांश लोग हकीकत से वाकिफ नहीं होते इसलिए आकर्षित होकर कहीं न कहीं खींचे चले जाते हैं और जब सत्य का भान होता है तब पछताने के सिवा हमारे पास कुछ बचता ही नहीं।

हमारी स्थिति पुष्पगंध की आसक्ति में लिप्त उस भौंरे की तरह हो जाती है जो कि सूर्यास्त में कमल दल बन्द हो जाने पर भीतर ही फंस कर रह जाता है, बाहर निकलने का कोई रास्ता नज़र नहीं आता और आखिरकार बेवक्त दम तोड़ देता है। जो कीट-पतंगे अग्नि शिखाओं की ओर आकर्षित होते हैं उन्हें तो आखिर जलकर मरना ही मरना है।

आकर्षण का यही मनोविज्ञान है कि जो लोग औरों के प्रति आकर्षित होते हैं, उन्हें पाने का लक्ष्य लेकर चलते हैं वे हमेशा नुकसान में रहा करते हैं। बात चाहे स्त्री-पुरुष के प्रति परस्पर आकर्षण की हो अथवा किसी भी प्रकार के जीवों की स्वार्थ या वासनापूर्ण खिंचाव की, आखिर क्षति उसी को होती है जो किसी और पर आसक्त होकर उसकी ओर आकर्षित होने लगता है।

आकर्षित होने की बजाय हमें चाहिए कि अपने आप में ऎसा आकर्षण जगाएं कि पूरी दुनिया हमारी ओर आकर्षित हो।  इसके लिए अपनी मेधा-प्रज्ञा, ज्ञान-अनुभवों का उपयोग करें या फिर साधना अथवा अपने नैष्ठिक कर्मयोग को ईमानदारी से पूरा करते हुए उसी के प्रति समर्पित रहें।

इससे अपने आप आकर्षण जगेगा और इस शुचिता पूर्ण आकर्षण का फायदा यह होगा कि हमारी तरफ वे ही लोग आकर्षित होने लगेंगे जो कि हमारे लिए हितकारी हैं और जिनसे अनायास संबंध स्थापित हो जाने पर हमें जिन्दगी भर के लिए आत्मीय लाभ और आनंद की प्राप्ति होती रहती है।

इस सत्य को स्वीकार करें और दूसरों की ओर आकर्षित होने तथा समय बरबाद करने की बजाय खुद में आकर्षण जगाएं। अपना स्व आकर्षण ही अमर कीर्ति और कालजयी यश की प्राप्ति कराता है।