चिढ़ाती है दिवाली

दिवाली की व्यापक चकाचौंध, मुद्राओं का बरसाती बाढ़-प्रवाह, चेहरों से लेकर घर-प्रतिष्ठानों का अनुपम सौंदर्य निखार, जात-जात के आधुनिक संसाधनों, आरामतलबी देने वाली मशीनों और बाजारों की सजावट, सोने-चाँदी के गहनों और मुद्राओं के साथ लक्ष्मी पूजा, कानफोडू आतिशबाजी कर दूर से मजा लेने वाले अति उत्साही लोगों का ज्वार और गुलजार बाजारों की रोशनी के बीच हिलोरें लेता जनप्रवाह।

हैप्पी दिवाली कह डालने का भेड़चालिया सिलसिला। महंगे और कम दिनों की आयु रखने वाले काडर््स, मिठाई, मुद्राओं और तरह-तरह के आकर्षक पैक में सजे उपहारों का आदान-प्रदान, साल भर में दो-चार बार की तरह ही ऊपरी मुस्कान के साथ बधाइयों और शुभकामनाओं का इज़हार, किसम-किसम के संदेशों और छायाचित्रों से लेकर वीडियो क्लिप्स तक के साथ सोशल मीडिया पर हैप्पी दीवाली का जोर-शोर, ब्यूटी पॉर्लरों से निखर कर बाहर आता सौंदर्य-प्रतिमाओं का उमड़ता रेला, और बहुत कुछ जो हमें दीखता है दीपावली पर।

दो-चार दिन की महा तड़क-भड़क और फिर सब कुछ पहले जैसा। कुछ बरस पहले तक जो उल्लास, उत्साह और उमंग का वेग तन-मन में देखने को मिलता था वह अब हमारे भीतर से निकल कर सजे-धजे बाजारों में अंधी दौड़ लगाने लगा है।

दीवाली का जो उल्लास हर भारतवासी के मन में होना चाहिए, वह कहीं नज़र नहीं आता। कस्बों, नगरों और महानगरों तक ही सिमट कर रह गया है दीवाली का उल्लास। इन्हीं शहरी इलाकों में रोशनी के दरिया फूटते नज़र आते हैं।  रंगबिरंगी रोशनी को देखकर कुछ क्षणों के लिए मन को बहलाने का ठीक समय है।

हर तरफ तेज रोशनी और आतिशबाजी के धमाकों के बीच लक्ष्मी मैया को रिझाने के सारे जतन हो रहे हैं। सम्पूर्ण भारतभूमि को सामने रखकर देखें तो दीवाली अब प्रभावशालियों, बाहुबलियों, पूंजीपतियों, कारोबारियों के घर-आँगन और शहरी इलाकों तक कैद होकर रह गई है।

दीपावली को अमीरों ने नज़रबंद ही कर लिया है। चंद शहरों में रोशनी का दरिया उमड़ा कर, बाजारों को दुल्हन की तरह सजा कर, व्यवसायिक प्रतिष्ठानों को सुहागराती परिवेशीय सौंदर्य से भर देने से लेकर जो कुछ किया जा रहा है, उसे देख यही लगता है कि सब तरफ पैसों की भूख और पॉवर की प्यास सुरसा और कुंभकर्णों को पछाड़ने लगी है।

ठेठ दूरदराज के गांवों में आज भी अंधेरा पसरा हुआ है। पढ़ने के लिए बच्चों के पास बिजली नहीं है, रातों में रोशनी के लिए लोग तरस रहे हैं और हम चकाचौंध पसरा कर लक्ष्मी को अपने आंगन में कैद करने को उतावले हैं।  उधर प्यास के मारे लोग परेशान हैं और हम शहरों में रंगीन फव्वारे चला कर स्मार्ट होने के दम भर रहे हैंं।

गरीब के घर में दीया नहीं जल पाता और हम रोशनी में नहाते हुए अपने आपको गौरवान्वित महसूस कर रहे हैं। दो वक्त का खाना नसीब नहीं हो रहा है और हम पकवानों और नमकीन के हजारों उत्पादों का रस पा रहे हैं।

अभावों की काली साया ने दूरदराज तक अपने पंजे फैला रखे हैं और यहाँ हम आकर्षक पैकिंग में भर-भर उन लोगों को मिठाइयों और मेवे पहुंचा रहे हैं जिन लोगों के लिए प्रकृति ने ही यह सब खाने पर रोक लगा रखी है।

आम जीवन में कठिनाइयों का अहसास करने वाले करोड़ों लोग हमारे बीच हैं लेकिन हम उन लोगों को गिफ्ट दे रहे हैं जिनके पास पहले से ही अनाप-शनाप सम्पत्ति और आधुनिक संसाधनों की भरमार है।

इन सभी प्रकार से बढ़ती जा रही अमीर और गरीब के बीच की खाई के रहते हुए हम यह आशा कैसे कर सकते हैं कि लक्ष्मी मैया हम पर प्रसन्न होंगी। इन विषमताओं के भँवर में फंसे हालातों के बीच लगता है कि हम सभी लोग अपने वैयक्तिक और परिवेशीय वैभव का प्रदर्शन करते हुए अभावग्रस्तों, विपन्नों और समस्याओं से घिरे हुए उन लोगों को चिढ़ा रहे हैं जिनके सामने अपनी सामान्य जिन्दगी चलाने का संकट हमेशा बना रहता है।

उन सभी लोगों को भी अनुभव होता है कि दीपावली का उल्लास चंद लोगों ने अपने यहां कैद कर रखा है वरना अब तक तो क्या शहर और क्या गांव, सब तरफ का अंधेरा छंट गया होता। गरीबों का दारिद्रय खत्म हो गया होता और अमीरी-गरीबी के बीच का यह समन्दर कब से ही पट गया होता।

मगर यह सब हो नहीं पाया। अमीर और अधिक अमीर होते जा रहे हैं और गरीब बेचारे वहीं के वहीं टिके हुए जिन्दगी को जैसे-तैसे ढोने को विवश हैं। दीवाली के बारे में सच्ची बातें जाननी हों तो उन गरीबों की टोह लें, जिन्हें लगता है कि यह दुनिया उनके लिए बनी ही नहीं है या शायद गलत युग में पैदा हो गए हैं।

लक्ष्मी मैया की कृपा पूरे क्षेत्र पर बरसती है। लक्ष्मी जहाँ आती हैं वहाँ मीलों तक समृद्धि देकर जाती है इसलिए इस भ्रम में न रहें कि अपनी दुकान, घर, प्रतिष्ठान, मोहल्ला, गलियां और शहर चकाचौंध कर देंगे तो वे हमारे यहां ही आएंगी और ठहर जाएंगी।

जब तक अपने पूरे इलाके में कोई भी अभावग्रस्त, पीड़ित और जरूरतमन्द विद्यमान रहेगा तब तक लक्ष्मी के आगमन की कल्पना भी नहीं की जा सकती। जो कुछ पा रहे हैं, अहंकार के मारे फूल कर कुप्पा हो रहे हैं वह केवल अलक्ष्मी ही है और इसे अपने पास बनाए रखने का कोई लाभ नहीं है क्योंकि यह चाहे कितनी प्रचुर मात्रा में हो, वैभवशाली होने मात्र का तमगा हमें दे सकती है और कुछ नहीं।

असली लक्ष्मी केवल सोना-चाँदी या सांसारिक वैभव पा लेना मात्र नहीं है, यह तो उसका एक अंश मात्र है। असली लक्ष्मी तन-मन और धन से लेकर परिवेश तक को समृद्ध बना डालती है और यह जिसके पास होती है वह इंसान हमेशा स्वस्थ, मदमस्त, परम संतोषी और आनंद से भरा होता है।

असल में देखा जाए तो लक्ष्मी के बजाय सभी के पास अलक्ष्मी ही है तभी तो इनकी भूख कम नहीं हो पायी है, चित्त उद्विग्न बना रहता है, संतोष का नाम नहीं है, पाने ही पाने को हर क्षण उतावले बने हुए हैं और संग्रह के साथ शोषण, अमानवीयता, संवेदनहीनता और अनुदार्य होने के अभिशापों से इतने त्रस्त हैं कि चेहरे की मुस्कान गायब है, मलीनता, मायूसी, भय  और असुरक्षा के साये में जीने को विवश हैं और हरदम लगता है कि जैसे किसी गंभीर बीमारी या आशंकाओं के चिन्तन में खोए हुए हैं।

लक्ष्मी तब तक नहीं आने वाली जब तक सर्वत्र समत्व की प्रतिष्ठा नहीं हो पाती, अभाव दूर नहीं हो पाते। और इसके लिए जरूरी है कि हम गरीबों के जीवन में उजियारा भरने के लिए ईमानदार और समर्पित कोशिश करें।

दीपावली के उल्लास को अपनी कैद से बाहर निकाल कर उन टापरों और दूरवर्ती पर्वतीय एवं सीमान्त अंचलों तक पहुंचाएं जहां के लोग अभावों से मुक्ति पाने के लिए हमसे आशाएं संजोए बैठे हैं।

सभी को दीपावली एवं नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं …..