यहाँ होते हैं भगवान परशुराम के दिव्य दर्शन . . .

भगवान श्री विष्णु के षष्ठम् अवतार के रूप में पूज्य एवं चिरंजीवी भगवान परशुरामजी का सदियों पुराना मन्दिर राजस्थान के बांसवाड़ा जिला मुख्यालय से कुछ दूरी पर दक्षिण दिशा में लीमथान गांव में हैं।

इसमें भगवान परशुराम की भव्य धवलवर्ण युक्त ओज-तेज से परिपूर्ण मूर्ति है जिसके दर्शन मात्र से अवर्णनीय ओजस्वी धाराओं के संचरण का अनुभव होता है। प्राचीनकाल में इस समूचे क्षेत्र के परशुराम तीर्थ के रूप में जाना जाता रहा है।

यह मन्दिर भले ही जंगल में खेतों के बीच अवस्थित है किन्तु पुराने जमाने से परशुराम मन्दिर दूर-दूर तक प्रसिद्ध रहा है। मन्दिर के सामने ही भगवान श्रीकृष्ण का मन्दिर भी है जिसमें बाँसुरीवादनरत भगवान श्रीकृष्ण की श्याम वर्ण की पुरानी मूर्ति ऊँचे अधिष्ठान पर स्थापित है।

यों तो हर वर्ष परशुराम मन्दिर पर यहां जन्मोत्सव सहित विशेष आयोजन होते हैं किन्तु वर्ष में अनेक अवसरों पर इस एकान्त और शांत किन्तु उन्मुक्त प्रकृति के बीच अवस्थित परशुराम धाम पर भक्तों का आवागमन बना रहता है।

लीमथान गांव के भक्तों ने हाल के वर्षों में इस धाम के विकास व उद्धार का बीड़ा उठाया और मन्दिर को नवीन स्वरूप देते हुए सेवा-पूजा का जिम्मा संभाले हुए हैं। इनमें श्री शैलेन्द्र प्रभात शर्मा एवं उनके परिवार की भूमिका अग्रणी है।

 श्री परशुराम मन्दिर और आस-पास का समूचा क्षेत्र दिव्य अनुभूतियों से भरा है। साधकों को यहाँ दिव्य दर्शन होते रहते हैं। मुझे भी अपने आध्यात्मिक गुरु ब्रह्मर्षि ब्रह्मलीन पं. महादेव शुक्ल जी के साथ पिछले बरसों में परशुराम मन्दिर जाने के अवसर कई बार मिले। कई बार परशुराम जयन्ती के दिन भी और सामान्य दिनों में भी। एकाध बार शुभ्र परिधान में दीर्घकाय दिव्य विभूति के खेतों में परिभ्रमण की झलक मिली।

इस बारे में ब्रह्मर्षि पं. महादेव शुक्ल जी को भी बताया । उन्होंने भी स्वीकार किया कि इस क्षेत्र में अनेक दिव्य विभूतियां सूक्ष्म रूप में उपस्थित हैं और भक्तों को दर्शन देती हैं। स्वयं पं. शुक्ल जी का कहना था कि उन्होंने कई सारे एकान्तिक और गोपनीय तांत्रिक-मांत्रिक अनुष्ठान यहां रहकर किए हैं और इस दौरान सिद्धों व स्वयं भगवान परशुराम की अनुभूति का आनंद पाया है।

सच्चे भक्तों को यहाँ भगवान परशुरामजी की मौजूदगी की दिव्य अनुभूतियां तो होती ही हैं, इस मन्दिर में जो भी मन्नत ली जाती है वह भगवान परशुरामजी की कृपा से अवश्य पूरी होती है।

साधना के लिए यह स्थान नितान्त एकान्त और प्राकृतिक वातावरण से भरा है। आवश्यकता है कि इस मन्दिर के विस्तृत परिसर को सुव्यवस्थित करते हुए मन्दिर क्षेत्र का विकास किया जाए। इसके लिए परशुराम भक्तों को मात्र एक ही दिन परशुराम जयन्ती पर आकर रस्म अदायगी की औपचारिकता को छोड़कर साल भर इस धाम के विकास के लिए प्रयासरत रहने की आवश्यकता है।

आईये आज परशुराम जयन्ती पर हम सभी भक्त उनके धाम के विकास में भागीदारी निभाने का संकल्प लें। भगवान परशुराम किसी एक वर्ण के नहीं बल्कि ब्रह्माण्डनायक हैं और इसलिए सभी की जिम्मेदारी है कि इस दिशा में संकल्पित होकर काम करें।

जय परशुराम।

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