दिव्य रहस्योद्घाटन पहली बार –  ग्रहण काल के अनुभूत प्रयोग

दिव्य रहस्योद्घाटन पहली बार – ग्रहण काल के अनुभूत प्रयोग

ग्रहणकाल अपने आप में कई विलक्षणओं से भरा हुआ होता है। इसमें जो कुछ किया जाता है उसका सीधा संबंध संबंधित उपास्य देव या देवी से हो जाता है।

इसमें साधक और उपास्य देव के बीच के सारे अवरोध समाप्त हो जाते हैं। इसलिए कम समय में हजार गुना फल की प्राप्ति होती है और सिद्धि मिलना आसान रहता है।

ग्रहण काल में परंपरागत साधना पद्धतियों का प्रयोग तो होता ही रहता है लेकिन दैवीय कृपा से ऎसे कुछ नुस्खे प्राप्त हुए हैं जिनका प्रयोग करने से अचूक सफलता प्राप्त हो सकती है और वह भी चमत्कारिक अहसास के साथ। जगत में पहली बार पराम्बा की कृपा से इनका प्राकट्य हो पा रहा है।

आजमायें और लाभ लें। सभी नवाचारी प्रयोग स्वयं अनुभूत हैं और इनका प्रत्यक्ष लाभ देखा गया है।

 

ग्रहण काल में अपना पूरा नाम भी 31 या 51 बार उच्चारित कर लें। इससे यह सिद्ध हो जाएगा। फिर जब कभी  आत्महीनता या अनमनापन लगे, अपने ही नाम को दस-पन्द्रह बार उच्चारित कर लें, इससे आत्मबल में अप्रत्याशित अभिवृद्धि होगी और मन स्वस्थ हो जाएगा।

हमारे संबोधन वाक्य या शब्द अर्थात प्रणाम, नमस्कार, जय हो, राम-राम, जय महाराज, जय गुरुदेव, जय भगवान, हरि ॐ  आदि में से सर्वाधिक प्रचलित अभिवादन वाक्य को ग्रहण काल में 31 बार दोहरा लें।  इससे यह अभिवादन शब्द सिद्ध हो जाएगा। और फिर जब-जब भी इसका उच्चारण होगा, सामने वाले पर अचूक प्रभाव छोड़ेगा।

ग्रहण काल में सफेद कागज पर अपने नाम का उच्चारण करते हुए लाल स्याही से 108 बार हस्ताक्षर कर लें। इससे हस्ताक्षर सिद्ध हो जाएंगे। फिर जहां कहीं हस्ताक्षर करेंगे, उसका बेहतरीन व आशा से अधिक फल प्राप्त होगा।

महिलाएं अपने माथे पर जो बिन्दियां लगाती हैं उन्हें तथा बालों में लगाए जाने वाले तेल को ‘ ॐ क्लीं नमः’ मंत्र से अभिमंत्रित कर लें। इससे मनमोहक आकर्षण प्राप्त होता है।  एक थाली में कुंकुम लेकर अंगुलियां चलाते हुए कुंकुम  को भी इससे अभिमंत्रित कर लें। रोजाना जब भी घर से बाहर निकलें, इस कुंकुम का तिलक लगाकर निकलें। इससे जगत वशीकरण और मोहन होता है और जो देखेगा वह अभिभूत हो उठेगा।

इस कुंकुम को और अधिक प्रभावी बनाना चाहें तो रूद्राभिषेक के चतुर्थ अध्याय में ‘‘ॐ जदद्य….’’ वाले अथवा दुर्गा सप्तशती में वर्णित मंत्र ‘‘ॐ ज्ञानिनामपिचेतांसि ….’’ वाले मंत्र से अभिमंत्रित करें।

ग्रहण काल में महामृत्युंजय, शिव पंचाक्षरी मंत्र अथवा ॐ हौं जूं सः सः जूं हौं ॐ के थोड़े जप भी कर लें। जब भी दवाई लें इस मंत्र से अभिमंत्रित कर ही लें। इससे आरोग्य प्राप्ति जल्दी होती है।

ग्रहण काल में विद्या-बुद्धि और कवित्व शक्ति प्राप्त करने के इच्छुकों को चाहिए कि वे ‘ॐ ऎं नमः’, ‘नारायण-नारायण’, सरस्वती के कोई से मंत्र का जाप कर लें। फिर रोजाना इसका अभ्यास बनाए रखें। परीक्षा के दिनों में घर से निकलते समय नारायण नारायण का मन ही मन स्मरण करते हुए परीक्षा देने पहुंचें। इससे परीक्षा में आशातीत सफलता प्राप्त होती है।

मेधा-प्रज्ञा और कवित्व शक्ति पाने तथा वाणी का प्रभाव बढ़ाने के इच्छुकों को चाहिए कि वे निम्न मंत्र के पन्द्रह-बीस बार जप कर लें। जब भी सवेरे जगें तब सबसे पहले तीन बार इस मंत्र को उच्चारित कर लें –

ॐ मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वती समाः।

यत् क्रौञ्चमिथुनादेकमवधीः काममोहितम्॥

ग्रहण काल में वह सब कुछ सिद्ध हो जाता है जो हम चाहते हैं। चाहे वह कोई सी क्रिया, मंत्र, तंत्र, यंत्र आदि कुछ भी क्यों न हो। इसलिए ग्रहण की महिमा को समझें तथा अपने, कुटुम्ब, समाज, क्षेत्र तथा देश के उत्थान में सहभागी बनने का यत्न करें। दैवीय ऊर्जा प्राप्ति से जीवन विकास क्रम को गति देने का यह सर्वश्रेष्ठ काल है।

One comment

  1. Anshumaan Chaudhary

    Please post more authentic sadhna.

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