दैवीय गुण आएं तभी शक्ति उपासना सफल

दैवीय गुण आएं तभी शक्ति उपासना सफल

शक्ति तत्व का अर्थ अत्यन्त व्यापक और गहन अर्थों को समेटे हुए हैं। शक्ति उपासना से भी तात्पर्य केवल नवरात्रि का भजन-पूजन, कीर्तन-गरबा, देवी महिमा के भजनों, मंत्रों और स्तुतियों से भरी कैसेट्स, फिल्मी और दूसरे गाने, माईक और डीजे चलाने से ही नहीं है बल्कि शक्ति की उपासना तभी सार्थक है जबकि हमारे भीतर शक्ति तत्व का जागरण, संचरण और प्रसार हो तथा इसका लाभ न केवल हमें बल्कि दुनिया भर को प्राप्त हो।

हमारी शक्ति उपासना तभी सफल मानी जा सकती है कि जब यह जीवों और जगत के लिए उपयोगी साबित हो। इसके बिना इस उपासना का कोई मतलब नहीं।

शक्ति उपासना के नाम पर नवरात्रि में बहुत से लोग अपने-अपने ढंग से पूजा-पाठ, अनुष्ठान, होम इत्यादि करवाते रहते हैं और यह विश्वास करते हैं कि देवी मैया उन पर प्रसन्न होगी और इसका लाभ उन्हें प्राप्त होगा।

अधिकांश लोग अपनी मनोकामनाएं पूरी करने, अपने शत्रुओं पर विजय, अपनी ऎषणाओं की पूर्ति, धन-दौलत की प्राप्ति, संसाधनों और प्रतिष्ठा में अभिवृद्धि और स्वार्थ पूरे करने-कराने के लिए देवी उपासना को अपनाते हैं।

बहुत से लोग आज भी ऎसे हैं जिनके लिए शक्ति उपासना देवी मैया की कृपा प्राप्ति और साक्षात्कार, लोक कल्याण के लिए शक्तियां अर्जित करने और वैश्विक कल्याण की भावना प्रधान होती है। ऎसे लोग अपने स्वार्थ, कामनाओं और प्राप्तियों के लोभ से ऊपर उठकर निष्काम भाव से केवल देवी कृपा पाने के लिए शक्ति साधना का आश्रय लेते हैं।

उपासना चाहे कोई सी हो, इसका प्रतिफल तभी प्राप्त हो सकता है कि जब हमारा कर्म शुचिता भरा हो, लक्ष्य कल्याणकारी हो और नकारात्मकताओं से दूर हो। इस मामले में दक्षिणमार्गी और वाममार्गी, सात्विक और तामसिक दोनों प्रकार की साधनाओं का सहारा लिया जाता है।

सकाम और निष्काम भक्ति भी साधकों को अपने-अपने तरीके से फल प्रदान करती है। शक्ति उपासना और देवी मैया की भक्ति का सीधा सा मतलब यह है कि साधक में देवी के गुणों, कार्यों और लक्ष्यों को समझने, अनुकरण करने और इस परंपरा को आगे बढ़ाने की क्षमता होनी आवश्यक है।

देवी उपासना कोई सी हो, किसी भी प्रकार की हो, इसका फल प्राप्त होता ही है लेकिन जो लोग इस शक्ति का दुरुपयोग करते हैं उनकी शक्तियों का तेजी से क्षरण होने लगता है और इसका असर यह होता है कि इनके द्वारा की गई शक्ति साधना का जो भी फल  मिलता है वह कुछ दिनों बाद खत्म हो जाता है और फिर ये पुण्यहीन होकर जीने लगते हैं।

शक्ति उपासना के लिए पात्रता बहुत जरूरी है। पहले जमाने में शक्ति उपासक मायावी प्रपंच छोड़कर पूरी तरह शक्ति उपासना में डूब जाया करते थे  और उनका कोई सा कर्म ऎसा नहीं होता था कि जिसके कारण दूसरे लोगों तथा जमाने को परेशानी हो।

देवी पूजा अनुष्ठान करने वाले पण्डित भी अपने यजमानों की पात्रता देखते थे और तभी यह निश्चय करते थे कि किसका अनुष्ठान स्वीकारना है और किन्हें साफ-साफ इंकार कर देना है।

दुर्भाग्य से आजकल पैसा और प्रतिष्ठा प्रधान हो गया है इसलिए पण्डितों के सामने कोई पैमाना नहीं रहा। वे भी आजकल ऎसे-ऎसे धूर्त, मक्कार, शराबी, मांसाहारी, व्यभिचारी, रिश्वतखोर, भ्रष्ट, अन्यायी और शोषकों की पूजा करने में गर्व का अनुभव करते हैं जिनके कारण से समाज और परिवेश हैरान-परेशान रहता है।

देवी मैया ने असुरों के विनाश का काम किया था और उसी कारण उन्हें बार-बार अवतार लेना पड़ा था लेकिन आज के तथाकथित पण्डित और कर्मकाण्डी उन असुरों की शक्तियों को बढ़ाने के लिए देवी अनुष्ठान करने लगे हैं जिनके कारण सब त्रस्त हैं।

जिन असुरों और अपात्रों को शक्तिहीन करने, संहार करने की आवश्यकता है उन लोगों के लिए पूजा-पाठ और अनुष्ठान करने वाले लोभी पण्डितों के कारण समाज और देश समस्याओं और विपदाओं से घिरता जा रहा है।

पैसों, प्रतिष्ठा और महान लोगों के सान्निध्य-सामीप्य में गौरव और स्वर्गीय आनंद का अनुभव करने वाले इन मध्यस्थों के कारण नकारात्मक सोच वाले आसुरी वृत्ति के लोगों, बेईमानों और शोषकों की शक्तियाँ कम नहीं हो पा रही हैं।

समाज में हम चाहे कितनी ईमानदारी, नैतिक मूल्य, राष्ट्रीय चरित्र और सिद्धान्तों की बात क्यों न करते रहें, सकारात्मक सोच और कर्म को बढ़ावा क्यों न देते रहें, हमारे प्रयास हमेशा कमजोर साबित होते रहते हैं और सज्जनों तथा अच्छे लोगों को प्रताड़ित व शोषित होना पड़ता है।

शक्ति उपासना से हमारे भीतर ममत्व, स्नेह, दैवीय गुण, दया, करुणा, ईमानदारी, कर्म के प्रति निष्ठा, देशभक्ति, समभाव, सदाचार और मानवीय संवेदनशीलता न आ पाए तो यह समझ लें कि हम सब देवी उपासना के नाम पर नौटंकियां ही कर रहे हैं।

हालात इतने विषम हैं कि जिन असुरों और आसुरी वृत्तियों के लिए देवियों ने अवतार लिया, उन असुरों से भी अधिक खोटे कर्म, अत्याचार और दुराचार हम करने लगे हैं और बातें करते हैं देवी भक्ति की।

नवरात्रि के अनुष्ठानों के बाद भी यदि हमारे भीतर देवी के गुण और दिव्यता न आ पाए तो साफ-साफ समझ लेना चाहिए कि हम भी ढोंगी और पाखण्डी हैं और हमारे लिए पैसे लेकर पूजा-पाठ करने – कराने वाले  लोग भी हमारी तरह।

जगदम्बा के नाम पर ऎसा कुछ करें कि दुनिया और दुनिया के लोग हमारे उपकारों, सेवा और परोपकार को याद रखें और हमारी शक्ति उपासना को सफल मानते हुए हमारे प्रति श्रद्धा और आदर-सम्मान के भाव रखें।