धर्मक्षेत्रे – वागड़ में श्रावण मास की खण्डित पूर्णाहुति

धर्मक्षेत्रे – वागड़ में श्रावण मास की खण्डित पूर्णाहुति

वागड़ अंचल में अमान्त पद्धति के अनुसार श्रावण मास 21 अगस्त, सोमवार को समाप्त होगा। जो लोग श्रावण मास के व्रत करते हैं उनके लिए व्रत का उद्यापन कुछ स्थानों पर अमावास्या को ही हो जाता है।

पूरे माह व्रत रखकर व्रत के अंतिम दिन अमावास्या को ही पूर्णाहुति कर दिए जाने के बाद भोजन-प्रसाद ग्रहण कर लिया जाता है। इससे माह की खण्डित पूर्णाहुति होती है।

धर्मशास्त्रीय नियमों के अनुसार पूरे माह व्रत रखकर माह की समाप्ति के अगले दिन पूर्णाहुति होनी चाहिए।

लेकिन ऎसा नहीं कर अमावास्या को ही पूर्णाहुति व उद्यापन के रूप में सामूहिक भोजन कर लिया जाता है।

इस तरह श्रावण माह के व्रत में अंतिम दिन व्रत टूट जाता है। इससे खण्डित पूर्णाहुति होती है। होना यह चाहिए कि प्रतिपदा से अमावास्या तक व्रत के नियमों का पूरा-पूरा पालन करें और अमावास्या के अगले दिन प्रतिपदा को उद्यापन करें।

तभी पूरे माह व्रत करने का फल प्राप्त हो सकता है। पण्डितों की ओर से भक्तों को सही मार्गदर्शन नहीं मिल पाने के कारण ऎसा होता रहा है। पण्डितों का फर्ज है कि समाज को धर्मशास्त्रों के बारे में सही-सही ज्ञान दें।

इसी प्रकार अधिक मास में व्रती महिलाओं द्वारा इसकी पूर्णाहुति माह समाप्त होने के आठ-दस दिन पूर्व से व्रत का उद्यापन शुरू हो जाता है।

यह व्रत पूरे माह भर हो भी नहीं पाता कि इससे पूर्व ही व्रत का उद्यापन होने लगता है। इस तरह अधिक मास के सारे व्रत भी आधे-अधूरे ही होते रहे हैं।

नियम यह है कि जितने दिन का व्रत है उतने दिन पूर्ण होने के अगले दिन व्रत का उद्यापन हो सकता है। जैसे एकादशी का पारणा दूसरे दिन होता है न कि एकादशी की देर रात को।

इसी प्रकार जो भी व्रत जितनी निर्धारित अवधि के लिए होते हैं उतने दिन पूर्ण हो जाने के उपरान्त अगले दिन ही व्रत का उद्यापन हो सकता है।

लेकिन वागड़ अंचल में सब उल्टा-पुल्टा चलने लगा है।

जैसे कि वागड़ में श्रावण मास 21 अगस्त सोमवार को पूर्ण होगा और इसका उद्यापन अगले दिन 22 अगस्त को होना चाहिए। पर ऎसा नहीं होता।

श्रावण मास की पूर्णाहुति व उद्यापन 21 अगस्त अमावास्या को ही हो जाएगा।  इस बारे में धर्मसंगत व्यवहार जरूरी है।